डिजिटल अरेस्ट ठगी मामला: बॉम्बे हाईकोर्ट ने खारिज की आरोपी की अग्रिम जमानत, कहा- सिंडिकेट की जांच के लिए हिरासत में पूछताछ जरूरी

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक डॉक्टर से हुई 7.17 करोड़ रुपये की कथित ‘डिजिटल अरेस्ट’ धोखाधड़ी के मामले में आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है। मामले में ठगी की कुल रकम में से 4.03 करोड़ रुपये सीधे आरोपी के बैंक खाते में ट्रांसफर किए गए थे। जस्टिस आर. एम. जोशी की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि साइबर ठगी के इस पूरे नेटवर्क की तह तक जाने और असली मास्टरमाइंड की पहचान करने के लिए आरोपी से हिरासत में पूछताछ करना बेहद जरूरी है।

हाईकोर्ट ने 5 अक्टूबर को पारित अपने आदेश में कहा कि देश भर में डिजिटल अरेस्ट और साइबर आर्थिक अपराधों के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अदालत ने रेखांकित किया कि ऐसे संगठित अपराधों में ठगी की रकम को कई अलग-अलग बैंक खातों में घुमाया जाता है, ताकि जांच एजेंसियों के लिए पैसों के लेन-देन (मनी ट्रेल) की कड़ियां जोड़ना असंभव हो जाए।

खाताधारकों के मनगढ़ंत बहानों को स्वीकार नहीं किया जा सकता: हाईकोर्ट

अदालत ने सख्त लहजे में टिप्पणी की कि जिन व्यक्तियों के खातों में अपराध की काली कमाई जमा होती है, यदि उनके बाद में गढ़े गए या बेतुके बहानों को स्वीकार किया जाने लगा, तो इससे ऐसे साइबर अपराधों को सीधे तौर पर बढ़ावा मिलेगा।

हाईकोर्ट ने पाया कि जिस खाते में 4.03 करोड़ रुपये जैसी भारी-भरकम राशि ट्रांसफर हुई थी, वह मूल रूप से आरोपी द्वारा ही संचालित किया जा रहा था। इन तथ्यों को देखते हुए अदालत ने आरोपी को गिरफ्तारी से कोई भी अंतरिम राहत या सुरक्षा देने से साफ इनकार कर दिया।

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आरोपी की दलील: डोनेशन के नाम पर मांगा था खाता, मोबाइल हुआ था हैक

आरोपी की तरफ से पेश वकील पी. आर. दुबे ने अदालत में दावा किया कि उनका मुवक्किल इस अपराध का शिकार हुआ है, न कि इसमें साझेदार। बचाव पक्ष के मुताबिक, आरोपी एक चैरिटेबल संस्था चलाता है और विनीत श्रीवास्तव नाम के एक व्यक्ति ने संस्था को 20 लाख रुपये का दान देने की पेशकश की थी।

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वकील ने दलील दी कि दान की रकम प्राप्त करने के उद्देश्य से ही बैंक खाते का विवरण साझा किया गया था। बचाव पक्ष का दावा था कि 8 अक्टूबर को आरोपी का मोबाइल फोन हैक हो गया और उसी दिन उसके खाते में 4.03 करोड़ रुपये जमा हुए तथा तुरंत निकाल भी लिए गए।

अभियोजन का पक्ष: एक दिन में इतनी बड़ी रकम निकालना व्यावहारिक रूप से नामुमकिन

अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए सहायक लोक अभियोजक आर. पी. गौर ने अदालत को बताया कि बैंकिंग नियमों के तहत प्रतिदिन निकासी की तय सीमा और लेन-देन की निर्धारित संख्या के कारण एक ही दिन में 4.03 करोड़ रुपये की निकासी होना व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है।

अभियोजन पक्ष ने रिकॉर्ड पर साक्ष्य पेश करते हुए कहा कि अपराध में आरोपी की संलिप्तता के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं। इसके अलावा आरोपी ने संबंधित पुलिस थाने द्वारा जारी नोटिस का जवाब न देकर असहयोगात्मक आचरण भी दिखाया। अभियोजन ने यह भी रेखांकित किया कि कानपुर की एक सक्षम अदालत पहले ही इस अपराध का संज्ञान ले चुकी है और आरोपी की ऐसी ही दलील को पूर्व में खारिज कर चुकी है।

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फोन हैकिंग के दावे में कोई दम नहीं: अदालत

हाईकोर्ट ने आरोपी के मोबाइल हैक होने के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई भी दस्तावेजी या तकनीकी साक्ष्य मौजूद नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी का फोन वास्तव में हैक हुआ था।

अदालत ने जोर देकर कहा कि बिना किसी ठोस आधार के ऐसे दावों को स्वीकार करने से डिजिटल धोखाधड़ी के मामलों की निष्पक्ष और प्रभावी जांच पूरी तरह बाधित हो जाएगी।

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