सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया है, जिसमें टेलीफोन विभाग के एक पूर्व कैशियर को बरी किए जाने के आदेश को पलटते हुए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 की धारा 409 के तहत दोषी ठहराया गया था। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष आरोपी को संपत्ति सौंपे जाने (एंट्रस्टमेंट) और उसके बेईमान इरादे (डिसऑनेस्ट इंटेंशन) के बुनियादी तत्वों को साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। शीर्ष अदालत ने दोहराया कि केवल दूसरा दृष्टिकोण संभव होने के आधार पर अपीलीय अदालत बरी किए जाने के फैसले को नहीं पलट सकती। इसके साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि बरी का फैसला पलटने के बाद मुजरिम को सजा के सवाल पर सुने बिना सीधे दंडित नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता रामकृष्ण प्रह्लाद डोंगरेदिवे औरंगाबाद स्थित टेलीफोन विभाग में कैशियर-कम-काउंटर क्लर्क के पद पर कार्यरत थे। अभियोजन का आरोप था कि 1 जुलाई 1993 से 9 अक्टूबर 1993 के बीच उन्होंने ग्राहकों से 8,73,737 रुपये के टेलीफोन बिल वसूले थे। इनमें से 3,88,035 रुपये सरकारी खाते में देरी से जमा किए गए, जिसे अस्थायी विश्वासघात माना गया, जबकि 4,75,702 रुपये सौंपे जाने के बावजूद सरकारी खाते में जमा ही नहीं किए गए।
सहायक लेखा अधिकारी की शिकायत पर 11 अक्टूबर 1993 को आईपीसी की धारा 409, 477 और 420 के तहत मामला दर्ज किया गया और बाद में धारा 409 के तहत आरोप तय किए गए। अपीलकर्ता ने खुद को निर्दोष बताते हुए मुकदमे का सामना किया। दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 313 के तहत दर्ज बयान में उन्होंने कहा कि उन पर झूठा मुकदमा दर्ज किया गया है और वसूली गई पूरी राशि लेखा अधिकारी को सौंप दी गई थी।
मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, औरंगाबाद ने 20 फरवरी 2002 को अपीलकर्ता को बरी कर दिया था। अदालत ने पाया था कि अभियोजन के सबूत अस्पष्ट थे, महत्वपूर्ण रजिस्टरों को पेश नहीं किया गया और सीआरपीसी की धारा 100(7) के तहत तलाशी व जब्ती की अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं का पालन नहीं हुआ। हालांकि, राज्य सरकार की अपील पर बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने 12 अक्टूबर 2017 को बरी का फैसला पलटते हुए डोंगरेदिवे को धारा 409 के तहत दोषी ठहराया और एक वर्ष के कठोर कारावास के साथ 5,000 रुपये जुर्माने की सजा सुनाई। इसके बाद अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता बी.एच. मारलापल्ले और सुधांशु एस. चौधरी ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने बरी के आदेश में हस्तक्षेप से जुड़े स्थापित कानूनी सिद्धांतों की अनदेखी की। चेल्लूर मनक्कल नारायण इत्तिरावि नंबूदरी बनाम त्रावणकोर-कोचीन राज्य मामले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि महज दूसरा नजरिया मुमकिन होने के आधार पर किसी को बरी करने का फैसला नहीं पलटा जा सकता। उन्होंने आर. वेंकटकृष्णन बनाम सीबीआई का संदर्भ देते हुए कहा कि धारा 409 के मुख्य आधार—संपत्ति का सौंपा जाना और बेईमान इरादा—साबित ही नहीं हुए। वकीलों ने यह भी रेखांकित किया कि अदालत के आदेश के बावजूद अभियोजन ने कैश हैंडओवर रजिस्टर और स्टॉक रजिस्टर पेश नहीं किए, जिस पर प्रतिकूल निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए था। साथ ही, हाईकोर्ट ने बेगुनाही साबित करने का भार गलत तरीके से आरोपी पर डाल दिया।
दूसरी तरफ, महाराष्ट्र राज्य के वकील श्रीरंग बी. वर्मा ने हाईकोर्ट के फैसले का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि 8,73,737 रुपये सौंपे जाने का तथ्य सिद्ध था और प्रदर्श 7 से 9 के दस्तावेजों तथा हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट से यह साबित होता है कि सरकारी धन देरी से जमा किया गया और एक हिस्सा जमा ही नहीं हुआ। उन्होंने तर्क दिया कि अपीलकर्ता का आचरण बेईमान इरादे को दर्शाता है और अभियोजन ने अपना मामला संदेह से परे साबित कर दिया था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
फैसला लिखते हुए जस्टिस चंदुरकर ने बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ अपीलीय समीक्षा के दायरे को रेखांकित किया। चेल्लूर मनक्कल नारायण इत्तिरावि नंबूदरी बनाम त्रावणकोर-कोचीन राज्य मामले का उल्लेख करते हुए पीठ ने कहा:
“इसमें कोई विवाद नहीं हो सकता कि हाईकोर्ट को बरी किए जाने के आदेश के खिलाफ अपील की सुनवाई करते हुए भी रिकॉर्ड पर मौजूद पूरे सबूतों की समीक्षा करने और इस निष्कर्ष पर पहुंचने का पूरा अधिकार था कि बरी करने का आदेश रद्द किया जाना चाहिए। लेकिन जैसा कि प्रिवी काउंसिल ने ‘शिवस्वरूप बनाम सम्राट’ मामले में स्पष्ट किया था, इन शक्तियों का प्रयोग करते समय हाईकोर्ट को निम्नलिखित बातों पर उचित विचार और महत्व देना चाहिए: (1) गवाहों की विश्वसनीयता के संबंध में ट्रायल कोर्ट का दृष्टिकोण; (2) अभियुक्त के पक्ष में निर्दोष होने की उपधारणा, जो ट्रायल में बरी होने के बाद किसी भी तरह कमजोर नहीं होती; (3) अभियुक्त को किसी भी संदेह का लाभ पाने का अधिकार; और (4) उस न्यायाधीश द्वारा निकाले गए तथ्यात्मक निष्कर्षों में बदलाव करने में अपीलीय अदालत की सतर्कता और संकोच, जिसने गवाहों को प्रत्यक्ष रूप से देखा था।”
संपत्ति सौंपने (एंट्रस्टमेंट) को साबित करने में विफलता
आईपीसी की धारा 405 और 409 के तहत अमानत में खयानत के तत्वों का विश्लेषण करते हुए पीठ ने स्पष्ट किया कि बेईमान इरादा इसका एक अनिवार्य अंग है। अदालत ने आर. वेंकटकृष्णन बनाम सीबीआई का हवाला देते हुए कहा कि मात्र विश्वास का हनन तब तक अपराध नहीं बनता जब तक उसके पीछे बेईमान इरादा न हो।
नकदी सौंपे जाने के पहलू पर अदालत ने पहले जांच अधिकारी (पीडब्ल्यू-12) के बयानों की समीक्षा की। जांच अधिकारी ने जिरह में स्वीकार किया था कि शिकायतकर्ता ने मूल कैशबुक, दैनिक रजिस्टर, रफ कैशबुक, बैलेंस शीट या ऑडिट रिपोर्ट जांच के दौरान उपलब्ध नहीं कराई। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की:
“आईओ द्वारा मूल कैशबुक, ऑडिट रिपोर्ट और ग्राहकों से राशि की वसूली से संबंधित अन्य प्रासंगिक दस्तावेज पेश करने को कहे जाने के बावजूद, शिकायतकर्ता (पीडब्ल्यू-1) और टेलीफोन विभाग के अन्य अधिकारियों द्वारा इन्हें पेश नहीं किया गया। ये दस्तावेज ही अपीलकर्ता को संपत्ति सौंपने का आधार थे। ऐसे में इन महत्वपूर्ण दस्तावेजों के अभाव में यह मानना मुश्किल होगा कि वास्तव में अपीलकर्ता को नकदी सौंपी गई थी, जो विश्वासघात का अपराध साबित करने के लिए बुनियादी तत्वों में से एक है।”
पीठ ने कहा कि ट्रायल कोर्ट द्वारा साक्ष्य अधिनियम की धारा 114(जी) के तहत अभियोजन के खिलाफ प्रतिकूल निष्कर्ष निकालना पूरी तरह उचित था, क्योंकि उसने अपने कब्जे में मौजूद रिकॉर्ड को दबाया। इसके विपरीत हाईकोर्ट ने इस विफलता को नजरअंदाज किया और यह मान लिया कि रिकॉर्ड पेश करना अपीलकर्ता की जिम्मेदारी थी।
दस्तावेजी जब्ती पर गहरा संदेह
अभियोजन ने अपीलकर्ता के घर से प्रदर्श-86 के तहत 46 दस्तावेज जब्त करने का दावा किया था। सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि जब्ती के दोनों स्वतंत्र पंच गवाह (पीडब्ल्यू-6 और पीडब्ल्यू-7) मुकर गए और उन्होंने गवाही दी कि उनके हस्ताक्षर पुलिस स्टेशन में लिए गए थे। इसके अलावा, जांच अधिकारी ने जब्ती पंचनामे पर अपीलकर्ता के हस्ताक्षर नहीं लिए, अपने हस्ताक्षर के नीचे तारीख नहीं डाली और सीआरपीसी की धारा 100(7) के तहत जब्त सामान की सूची भी आरोपी को नहीं दी।
अदालत ने सुंदर सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और पंजाब राज्य बनाम बलबीर सिंह का उल्लेख करते हुए माना कि प्रक्रियात्मक चूकें अपने आप में जब्ती को अवैध नहीं बनातीं, लेकिन जब उन्हें अन्य कमियों के साथ देखा जाए, तो वे पूरे मामले को संदिग्ध बना देती हैं:
“ऐसी स्थिति में, बिना किसी अतिरिक्त साक्ष्य या पुष्टि के, केवल जांच अधिकारी के बयान के आधार पर जब्ती को विधिवत साबित नहीं माना जा सकता। जांच अधिकारी द्वारा इसका कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया कि अपीलकर्ता के घर से जब्त की गई वस्तुओं की सूची उसे क्यों नहीं सौंपी गई। इसलिए हमारा मानना है कि हाईकोर्ट ने इन वस्तुओं की जब्ती पर भरोसा करके और यह मानकर गलती की कि यह अपीलकर्ता के खिलाफ एक आपत्तिजनक परिस्थिति थी, जिसका उसने कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।”
अदालत ने यह भी जोड़ा कि प्रदर्श-9, जो जमा और बकाया राशियों की 10 पन्नों की कंप्यूटर सूची थी, उस पर न तो अपीलकर्ता के हस्ताक्षर थे और न ही उसकी लिखावट, जिससे उसका संबंध साबित हो सके।
बरी का फैसला पलटने के बाद सजा पर सुनवाई न करने की खामी
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में एक बड़ी प्रक्रियात्मक खामी की ओर भी इशारा किया। हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को बरी से सीधे दोषी ठहराते हुए उसी समय सजा सुना दी, जबकि उसे सजा के परिमाण पर अपनी बात रखने का मौका नहीं दिया गया। मुकेश कुमार यादव बनाम राज्य (यूटी अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह), कुमार एक्सपोर्ट्स बनाम शर्मा कारपेट्स और सूर्यमूर्ति बनाम गोविंदस्वामी के फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने रेखांकित किया:
“उपरोक्त चर्चा से यह स्पष्ट है कि जो अदालत किसी आरोपी को पहली बार दोषी ठहराती है, उसे सजा के प्रश्न पर आरोपी की सुनवाई करनी होगी। यदि यह ट्रायल कोर्ट है तो सीआरपीसी की धारा 235(2) लागू होगी। यदि अपीलीय अदालत बरी करने के फैसले को पलटकर आरोपी को पहली बार दोषी ठहरा रही है, तो अपीलीय अदालत को सजा के प्रश्न पर दोषी को सुनना होगा। अपीलीय अदालत केवल सजा सुनाने के उद्देश्य से मामले को निचली अदालत में नहीं भेज सकती। यह सीआरपीसी की धारा 386(ए) और इस अदालत के पूर्व निर्णयों के विपरीत होगा।”
आरोपी पर सबूत का भार डालना कानूनन गलत
शीर्ष अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता द्वारा जब्ती दस्तावेजों का स्पष्टीकरण न दे पाने को जरूरत से ज्यादा तवज्जो दी। रवींद्र कुमार डे बनाम उड़ीसा राज्य का उल्लेख करते हुए पीठ ने आपराधिक कानून के तीन आधारभूत सिद्धांतों को दोहराया:
“आपराधिक न्यायशास्त्र के तीन बुनियादी सिद्धांत सुस्थापित हैं:
(1) मामले को उचित संदेह से परे साबित करने का भार पूरी तरह से अभियोजन पक्ष पर होता है और वह अपने मामले को साबित करने के लिए बचाव पक्ष के बयान की कमजोरी या उसके झूठे होने का लाभ नहीं उठा सकता;
(2) आपराधिक मुकदमे में अभियुक्त को तब तक निर्दोष माना जाना चाहिए जब तक कि वह दोषी साबित न हो जाए; और
(3) अभियोजन पक्ष पर सबूत का भार कभी स्थानांतरित नहीं होता।”
अदालत ने कहा कि इन सिद्धांतों के मद्देनजर हाईकोर्ट का सबूत का भार आरोपी पर डालना एक गंभीर कानूनी त्रुटि थी।
अदालत का निर्णय
ट्रायल कोर्ट के बरी करने के फैसले को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया:
“रिकॉर्ड पर मौजूद संपूर्ण सामग्री पर विचार करने के बाद हमारी सुविचारित राय है कि ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता को सही बरी किया था। अभियोजन पक्ष अपीलकर्ता को संपत्ति सौंपे जाने को साबित करने में विफल रहा। रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री यह निष्कर्ष निकालने के लिए अपर्याप्त है कि अपीलकर्ता उस संपत्ति के गबन का दोषी था। अपीलकर्ता की ओर से ऐसा कोई बेईमान इरादा दर्शाने वाला कोई सबूत भी नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप भारतीय दंड संहिता की धारा 409 के तहत दंडनीय अपराध बनता हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने 12 अक्टूबर 2017 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, औरंगाबाद द्वारा 20 फरवरी 2002 को दिए गए बरी के आदेश को बहाल कर दिया। अदालत ने अपीलकर्ता को धारा 409 के आरोप से बरी करते हुए उसके जमानत मुचलके निरस्त करने का निर्देश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रामकृष्ण प्रह्लाद डोंगरेदिवे बनाम महाराष्ट्र राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1432/2019
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
निर्णय की तिथि: 8 अक्टूबर 2026

