दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 जीवन-यापन और गरिमा सुनिश्चित करने का माध्यम है, न कि किसी पक्ष को अनुचित वित्तीय लाभ या ‘अप्रत्याशित लाभ’ (विंडफॉल) दिलाने का जरिया। यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला ने स्पष्ट किया कि किसी कंपनी की केवल अधिकृत (अथॉराइज्ड) या चुकता (पेड-अप) शेयर पूंजी के आधार पर यह कानूनी अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि वह कंपनी अपने सह-संस्थापक (को-फाउंडर) को भारी वेतन देने लायक आय अर्जित कर रही है। अदालत ने पति को प्रतिमाह 15,000 रुपये भरण-पोषण देने के फैमिली कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए पति और पत्नी दोनों की ओर से दाखिल क्रॉस-रिवीजन याचिकाओं को खारिज कर दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला प्रधान न्यायाधीश, फैमिली कोर्ट, जौनपुर द्वारा वर्ष 2022 के भरण-पोषण वाद संख्या 162 में 4 नवंबर 2024 को पारित निर्णय और आदेश से जुड़ा है। फैमिली कोर्ट ने पत्नी द्वारा सीआरपीसी की धारा 125 के तहत दायर आवेदन को स्वीकार करते हुए पति को निर्देश दिया था कि वह याचिका दायर करने की तिथि से पत्नी को प्रतिमाह 15,000 रुपये भरण-पोषण के रूप में अदा करे।
इस आदेश को दोनों पक्षों ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। पति ने भरण-पोषण के आदेश को पूरी तरह निरस्त कराने के लिए क्रिमिनल रिवीजन संख्या 542/2025 दाखिल की, जबकि पत्नी ने भरण-पोषण राशि बढ़ाने की मांग को लेकर संबद्ध क्रिमिनल रिवीजन संख्या 6290/2024 दाखिल की। दोनों रिवीजन एक ही आदेश के खिलाफ होने के कारण हाईकोर्ट ने संयुक्त रूप से सुनवाई करते हुए एक साझा निर्णय पारित किया।
पक्षों की दलीलें
पति की ओर से मुख्य रूप से यह आधार लिया गया कि पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के उससे अलग रह रही है। उसके अधिवक्ता ने तर्क दिया कि पत्नी एक सुशिक्षित महिला है, जिसके पास बी.एड. की डिग्री है और वह गाजियाबाद स्थित माउंट लिट्रा ज़ी स्कूल में शिक्षिका के पद पर कार्यरत रही है। पति की ओर से विद्यालय की कर्मचारी सूची और अगस्त, सितंबर तथा अक्टूबर 2021 की सैलरी स्लिप प्रस्तुत की गईं, जिसमें उसका मासिक वेतन 45,000 रुपये दर्शाया गया था। इस आधार पर पति के वकील ने कहा कि पत्नी अपना भरण-पोषण करने में पूरी तरह सक्षम है, इसलिए वह भरण-पोषण पाने की हकदार नहीं है।
इसके जवाब में पत्नी के वकील ने दलील दी कि प्रस्तुत की गई सैलरी स्लिप केवल वर्ष 2021 के कुछ महीनों की हैं और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे साबित हो कि वह इसके बाद भी लगातार आय अर्जित कर रही थी। उन्होंने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण की याचिका वर्ष 2022 में दाखिल की गई थी और उस समय वह शिक्षिका के पद पर कार्यरत नहीं थी। साथ ही पति के अपने रिकॉर्ड से यह साबित होता है कि वह गाजियाबाद में नहीं, बल्कि जौनपुर स्थित अपने मायके में रह रही है।
वहीं, भरण-पोषण राशि बढ़ाने की अपनी मांग के समर्थन में पत्नी ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने पति की वास्तविक आय का सही आकलन नहीं किया। उसकी ओर से दलील दी गई कि पति बी.टेक. डिग्री धारक है और ‘इनोएप्स टेक्नोलॉजीज प्राइवेट लिमिटेड’ नामक कंपनी का सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) है, जिससे वह प्रतिमाह लगभग 4,00,000 रुपये कमाता है। कंपनी के कॉर्पोरेट दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया गया कि कंपनी की अधिकृत शेयर पूंजी 50,00,000 रुपये और चुकता शेयर पूंजी 20,00,000 रुपये है। ऐसे में ट्रायल कोर्ट द्वारा पति के इस दावे को स्वीकार करना त्रुटिपूर्ण था कि वह कंपनी में ग्लोबल हेड के रूप में केवल 50,000 रुपये मासिक वेतन प्राप्त करता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
पत्रावली का परिशीलन करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि यद्यपि पत्नी यह साबित करने में सफल रही कि पति संबंधित कंपनी का सह-संस्थापक है, लेकिन रिकॉर्ड पर मौजूद सैलरी स्लिप के अनुसार उसका मासिक वेतन 50,000 रुपये ही दर्ज है। अदालत ने पत्नी की इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया कि कंपनी की पूंजी संरचना के आधार पर पति की व्यक्तिगत आय अधिक मानी जानी चाहिए।
अदालत ने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की:
“केवल इसलिए कि उक्त कंपनी की अधिकृत शेयर पूंजी 50,00,000 रुपये दिखाई गई है और बैलेंस शीट के अनुसार इसकी चुकता शेयर पूंजी 20,00,000 रुपये है, यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि कंपनी इतनी पर्याप्त आय अर्जित कर रही है कि वह अपने किसी कर्मचारी को प्रतिमाह 4,00,000 रुपये का वेतन दे सके। ऐसी आय साबित करने वाली किसी ठोस और विश्वसनीय सामग्री के अभाव में, पत्नी-रिवीजनकर्ता का यह दावा केवल कंपनी की अधिकृत या चुकता शेयर पूंजी के आधार पर स्वीकार नहीं किया जा सकता कि पति-रिवीजनकर्ता प्रतिमाह 4,00,000 रुपये कमाता है।”
पति की मासिक आय 50,000 रुपये मानने के ट्रायल कोर्ट के निष्कर्ष में हस्तक्षेप से इनकार करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के नजीर फैसले कल्याण डे चौधरी बनाम रीता डे चौधरी उर्फ नंदी, (2017) 14 एससीसी 200 का संदर्भ दिया। सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि पति की शुद्ध आय का 25 प्रतिशत हिस्सा पत्नी के भरण-पोषण निर्धारण के लिए एक उचित बेंचमार्क माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गई 15,000 रुपये प्रतिमाह की राशि पहले से ही पति की 50,000 रुपये आय के 25 प्रतिशत से काफी अधिक है, इसलिए इसमें और वृद्धि का कोई औचित्य नहीं बनता।
सीआरपीसी की धारा 125 के मूल विधायी उद्देश्य की व्याख्या करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“सीआरपीसी की धारा 125 का उद्देश्य निराश्रयता और दरिद्रता को रोकना है तथा यह सुनिश्चित करना है कि जो पत्नी, बच्चा या माता-पिता अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, वे जीवन-यापन के बुनियादी साधनों से वंचित न रहें। यह प्रावधान अनिवार्य रूप से सामाजिक न्याय का एक उपाय है, जिसका उद्देश्य भरण-पोषण के हकदार व्यक्ति को उचित और गरिमापूर्ण जीवन-यापन का साधन उपलब्ध कराना है। साथ ही, इस प्रावधान का उद्देश्य अनुचित वित्तीय लाभ देना या भरण-पोषण का दावा करने वाले व्यक्ति के लिए धन संचय का साधन बनना नहीं है। इसलिए भरण-पोषण की राशि का निर्धारण दावाकर्ता की जरूरतों, भुगतान करने के लिए उत्तरदायी व्यक्ति की आय और वित्तीय क्षमता, पक्षों के जीवन स्तर और मामले की अन्य प्रासंगिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए, ताकि दावाकर्ता की वैध आवश्यकताओं और भरण-पोषण देने वाले व्यक्ति की वित्तीय क्षमता के बीच एक उचित संतुलन बनाया जा सके। सीआरपीसी की धारा 125 जीवन-यापन और गरिमा सुरक्षित करने का उपाय है, न कि दावाकर्ता के पक्ष में कोई अप्रत्याशित लाभ या खजाना तैयार करने का साधन।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट, जौनपुर द्वारा 4 नवंबर 2024 को पारित आदेश में किसी भी प्रकार की भौतिक अवैधता या त्रुटि नहीं है। अदालत ने पति की आदेश रद्द करने की मांग और पत्नी की भरण-पोषण राशि बढ़ाने की अर्जी—दोनों में कोई दम नहीं पाया। परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की क्रिमिनल रिवीजन याचिकाओं को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: अंकित सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
वाद संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या 542 वर्ष 2025
पीठ: जस्टिस लक्ष्मी कांत शुक्ला

