पटना हाईकोर्ट के जस्टिस कुमार मनीष ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में टिप्पणी की है कि दशकों तक सेवा देने वाले किसी दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी को उसके करियर के अंतिम पड़ाव पर ‘नवनियुक्त’ (फ्रेश अपॉइंटी) मानना संवैधानिक मूल्यों और भावना के सर्वथा विपरीत है। जल संसाधन विभाग के एक सेवानिवृत्त तृतीय वर्गीय कर्मचारी की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने इस कानूनी पहलू की पड़ताल की कि क्या पे-प्रोटेक्शन (वेतन संरक्षण) और पेंशन लाभों के लिए दशकों की निरंतर दैनिक वेतन सेवा को पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है, विशेषकर तब जब उसी विभाग में समान स्थिति वाले कनिष्ठ (जूनियर) कर्मियों को ऐसी सेवाओं का पूर्वव्यापी लाभ दिया गया हो। हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों को खारिज करने वाले विभागीय आदेशों को रद्द करते हुए सक्षम प्राधिकारी को समानता, वेतन संरक्षण और पेंशन के दावों पर तीन महीने के भीतर एक तर्कसंगत और स्पष्ट आदेश (स्पीकिंग ऑर्डर) पारित करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता बिपिन कुमार वर्मा को 16 जून 1980 को समस्तीपुर स्थित बाढ़ नियंत्रण अंचल में टाइपिस्ट के स्वीकृत और रिक्त तृतीय वर्गीय पद पर दैनिक वेतनभोगी के रूप में नियुक्त किया गया था। वर्ष 1984 से 1988 के बीच जल संसाधन विभाग, समस्तीपुर के मुख्य अभियंता की स्थापना समिति ने कई दैनिक वेतनभोगियों की सेवाओं को नियमित किया। हालांकि, याचिकाकर्ता के इस दावे के बावजूद कि बाद में आने वाले और बिना कार्यानुभव वाले लोगों को नियमित कर दिया गया, वर्मा के मामले पर कोई विचार नहीं किया गया।
इस उपेक्षा के खिलाफ वर्मा ने कई अभ्यावेदन दिए और अंततः हाईकोर्ट में सीडब्लूजेसी संख्या 9630/1998 दायर की। हाईकोर्ट ने 15 जुलाई 1999 को एक अंतरिम आदेश पारित कर उन्हें कार्य अवधि के दौरान न्यूनतम वेतनमान का भुगतान करने का निर्देश दिया। इसके बाद 17 दिसंबर 2003 को मुख्य याचिका का निपटारा करते हुए अदालत ने अधिकारियों को तीन महीने के भीतर उनके नियमितीकरण पर विचार करने का निर्देश दिया। आदेश का पालन न होने पर दायर अवमानना याचिका (एमजेसी संख्या 1252/2004) के दौरान मुख्य अभियंता ने 2 अगस्त 2004 को उनके दावे को खारिज कर दिया।
इसके बाद वर्मा ने दूसरी याचिका (सीडब्लूजेसी संख्या 2156/2009) दायर की। हाईकोर्ट ने 7 जुलाई 2011 को सुप्रीम कोर्ट के ‘कर्नाटक राज्य बनाम एम.एल. केसरी’ (2010) 9 एससीसी 247 फैसले के आलोक में उनके मामले पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। इसके बावजूद विभाग की निष्क्रियता जारी रहने पर वर्मा ने फिर अवमानना याचिका (एमजेसी संख्या 4241/2012) दायर की। इस दबाव के बाद मुख्य अभियंता ने 5 दिसंबर 2012 को कार्यालय आदेश जारी कर निम्न वर्गीय लिपिक (एलडीसी) के पद पर ‘नई नियुक्ति’ के रूप में वर्मा की सेवाओं के नियमितीकरण का आदेश दिया। वर्मा ने 6 दिसंबर 2012 को विरोध दर्ज कराते हुए पदभार ग्रहण किया।
नियमितीकरण को नई नियुक्ति मानने के कारण वर्मा का मूल वेतन 9,840 रुपये से घटकर सीधे 7,730 रुपये हो गया। इससे उनके मूल वेतन में 2,110 रुपये की तत्काल कटौती हुई और महंगाई भत्ते का भी भारी नुकसान हुआ, जबकि इससे पहले वे 5,200–20,200 रुपये के संशोधित वेतनमान और 2,400 रुपये ग्रेड पे के तहत वेतन प्राप्त कर रहे थे।
बाद में 21 दिसंबर 2017 को अधीक्षण अभियंता ने बिहार सेवा संहिता के नियम 78 के तहत वर्मा को पे-प्रोटेक्शन प्रदान किया। लेकिन मुख्य अभियंता ने 4 अगस्त 2018 को इस आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि नियम 78 का लाभ केवल नियुक्त सरकारी सेवकों पर ही लागू होता है। इसके बाद वर्मा के अभ्यावेदनों और विभागीय शिकायत निवारण समिति में की गई अपील को भी खारिज कर दिया गया। परिणामस्वरूप, वर्मा नवंबर 2019 में बिना पे-प्रोटेक्शन और बिना किसी पेंशन लाभ के सेवानिवृत्त हो गए।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने तर्क दिया कि वर्मा ने लगभग चार दशकों तक एक स्वीकृत पद पर निर्बाध सेवा दी है। याचिका के पैरा 36 का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि याचिकाकर्ता के साथ संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत मिले समानता के अधिकार का खुला उल्लंघन और भेदभाव किया गया है। उन्होंने बताया कि दैनिक वेतनभोगी के रूप में वर्मा से कनिष्ठ रहे महेश राय को विभाग ने 1984 में ही नियमित कर दिया था। इसके अलावा उसी मुख्य अभियंता ने 9 अक्टूबर 2010 के पत्र संख्या 3034 के जरिए दिलीप कुमार राय, बिपिन कुमार सिंह, राम चंद्र महतो, मो. सेराज, लक्ष्मी नारायण सिंह, सत्य नारायण सिंह और राम बिलास मेहतर जैसे समान स्थिति वाले कर्मचारियों को 1 अप्रैल 1988 से पेंशन और सेवानिवृत्ति लाभों के लिए काल्पनिक (नोशनल) नियमितीकरण का लाभ दिया था।
पेंशन के लिए पिछली दैनिक वेतन सेवा की गणना के समर्थन में याचिकाकर्ता ने पटना हाईकोर्ट की खंडपीठ के निर्णय ‘रजिस्ट्रार जनरल, पटना हाईकोर्ट बनाम राम व्यास दुबे’ (एलपीए संख्या 198/2016) पर भरोसा जताया, जिसमें कहा गया था:
“उपरोक्त प्रावधानों के अवलोकन से स्पष्ट है कि यदि किसी व्यक्ति ने अस्थायी तौर पर काम किया है और उसकी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन किसी पद पर उसकी सेवा निरंतर है और 15 वर्ष से अधिक है, तो बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम 59 के तहत इसे पेंशन योग्य माना जा सकता है।”
इसके साथ ही ‘सविता देवी बनाम बिहार राज्य’ (सीडब्लूजेसी संख्या 12833/2017) और ‘परमेश्वर पासवान बनाम बिहार राज्य’ के फैसलों का हवाला देते हुए कहा गया कि राज्य सरकार को बिहार पेंशन नियमावली के नियम 58 और 59 के तहत पिछली सेवा की गणना पर सचेत निर्णय लेना चाहिए।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने जवाबी हलफनामा दायर कर याचिका का विरोध किया। राज्य के अधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता को विशुद्ध रूप से दैनिक वेतनभोगी के रूप में रखा गया था और उन्हें वर्क-चार्ज कर्मचारियों जैसा अस्थायी दर्जा कभी नहीं मिला। उनकी सेवा का संविलियन कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार विभाग के 16 मार्च 2006 के परिपत्र के तहत किया गया था, जिसके खंड 2(5) में स्पष्ट प्रावधान है कि दैनिक वेतनभोगी के रूप में दी गई सेवा को किसी भी प्रयोजन के लिए सरकारी सेवा नहीं माना जाएगा।
राज्य की ओर से आगे कहा गया कि बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के नियम 56, 58 और 61 के तहत पेंशन अर्हक सेवा के लिए तीन अनिवार्य शर्तें हैं: सेवा सरकार के अधीन होनी चाहिए, पद मौलिक व स्थायी होना चाहिए और भुगतान सरकारी राजस्व से होना चाहिए। इसके समर्थन में पूर्ण पीठ के फैसले ‘बिहार राज्य बनाम भगवान सिंह’ (2014) 4 पीएलजेआर 229, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ‘बिहार राज्य बनाम एस.ए. हसन’ (2002) 3 एससीसी 566 और ‘यूनियन ऑफ इंडिया बनाम एन. मुरुगेसन’ (2022) 2 एससीसी 25 में प्रतिपादित ‘स्वीकार और अस्वीकार’ (एप्रोबेट और रेप्रोबेट) के सिद्धांत का हवाला दिया गया। राज्य का तर्क था कि 5 दिसंबर 2012 के नियुक्ति आदेश की शर्तों को स्वीकार करने के बाद याचिकाकर्ता अब पूर्वव्यापी लाभ की मांग नहीं कर सकते।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस कुमार मनीष ने कहा कि न्यायिक अनुशासन और पूर्व निर्णयों के सम्मान (स्टेयर डिसाइसिस) का सिद्धांत यह मांग करता है कि एक ही विभाग के भीतर समान विवादों पर सुसंगत कानूनी दृष्टिकोण अपनाया जाए ताकि अनुच्छेद 14 की रक्षा हो सके। हाईकोर्ट ने इस मामले में मुख्य कानूनी प्रश्न तय किया:
“क्या 1980 से एक दैनिक वेतनभोगी के रूप में याचिकाकर्ता द्वारा दी गई निरंतर पिछली सेवा को वेतन संरक्षण और पेंशनरी लाभों के उद्देश्य से पूरी तरह से समाप्त किया जा सकता है, विशेष रूप से तब जब समान स्थिति वाले कनिष्ठों को ऐसे काल्पनिक लाभ प्रदान किए गए हों?”
हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता 16 जून 1980 से लगातार तृतीय वर्गीय पद के दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे। रिट याचिका के पैरा 36 में रेखांकित किए गए भेदभाव का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने कहा कि उसी मुख्य अभियंता के अधीन कनिष्ठ कर्मियों को 1 अप्रैल 1988 से पेंशन लाभ की गणना के लिए काल्पनिक नियमितीकरण दिया गया था। इसलिए वर्मा के समानता के दावे की जांच उनके समकक्षों की सेवा स्थिति, नियुक्ति तिथि और उन पर लागू नीतियों के संदर्भ में की जानी आवश्यक है।
राज्य द्वारा 2006 के परिपत्र की कट-ऑफ तारीखों और खंडपीठ के निर्णय ‘अशोक कुमार शर्मा बनाम बिहार राज्य’ (एलपीए संख्या 1690/2013) के संदर्भ में कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 11 दिसंबर 1990 तक नियुक्त दैनिक वेतनभोगियों के वर्गीकरण की प्रयोज्यता संबंधित श्रेणी और नीति पर निर्भर करती है और यह बिना विभागीय पड़ताल के स्वतः समानता का अधिकार नहीं देती।
सरकारी प्रतिष्ठानों में मनमानी नियुक्ति प्रथाओं पर संवैधानिक मर्यादाओं को रेखांकित करते हुए हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय ‘धरम सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य’ (सिविल अपील संख्या 8558/2018, निर्णय 19 अगस्त 2025) का उल्लेख किया:
“17. निष्कर्ष निकालने से पहले, हम यह स्मरण कराना आवश्यक समझते हैं कि राज्य (केंद्र और राज्य दोनों सरकारें) केवल बाजार का प्रतिभागी नहीं, बल्कि एक संवैधानिक नियोक्ता है। वह उन लोगों की पीठ पर बजट का संतुलन नहीं साध सकता जो सबसे बुनियादी और आवर्ती सार्वजनिक कार्यों को पूरा करते हैं। जहां काम दिन-प्रतिदिन और साल-दर-साल लगातार चलता है, वहां व्यवस्था को अपनी स्वीकृत संख्या और नियुक्ति प्रक्रियाओं में उस वास्तविकता को दर्शाना चाहिए। अस्थायी लेबलों के तहत नियमित श्रम का दीर्घकालिक दोहन लोक प्रशासन में विश्वास को क्षीण करता है और समान संरक्षण के वादे का हनन करता है।”
कोर्ट ने इस फैसले के पैरा 18 को भी उद्धृत किया:
“लंबे समय तक रहने वाली असुरक्षा के मानवीय परिणामों के प्रति संवेदनशीलता कोई भावुकता नहीं है। यह एक संवैधानिक अनुशासन है जिसे उन सभी निर्णयों में शामिल होना चाहिए जो सार्वजनिक कार्यालयों को संचालित रखने वाले लोगों को प्रभावित करते हैं।”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक अन्य फैसले ‘भीखनी देवी आदि बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ (सिविल अपील संख्या 8354-8356/2026, निर्णय 1 जून 2026) का भी संज्ञान लिया, जिसमें माना गया था कि अस्थायी दर्जा प्राप्त आकस्मिक श्रमिक नियमितीकरण के अभाव में भी सेवानिवृत्ति पर पेंशन लाभ के हकदार हैं। इन तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि वर्मा की लंबी सेवा अवधि और नवंबर 2019 में उनकी सेवानिवृत्ति ऐसे तथ्य हैं जो लागू नियमों के तहत वेतन संरक्षण और पेंशन पर अलग से नए सिरे से विचार की मांग करते हैं।
हाईकोर्ट का निर्णय
पटना हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता के दावों को खारिज करने वाले 31 जुलाई 2017 (पत्र संख्या 861) और 4 अगस्त 2018 (पत्र संख्या 2149) के दोनों आदेशों को रद्द कर दिया।
हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को निम्नलिखित चार बिंदुओं पर याचिकाकर्ता के दावों पर अलग-अलग पुनर्विचार करने का निर्देश दिया:
- 5 दिसंबर 2012 के आदेश का कानूनी प्रभाव;
- याचिकाकर्ता द्वारा संदर्भित अन्य कर्मचारियों के साथ समानता का दावा;
- बिहार सेवा संहिता के नियम 78 के तहत पे-प्रोटेक्शन (वेतन संरक्षण); तथा
- बिहार पेंशन नियमावली, 1950 के तहत पेंशन लाभों के लिए पिछली सेवा की गणना।
हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को इस पूरी प्रक्रिया को पूरा कर इस आदेश की प्रति प्राप्त होने या प्रस्तुत किए जाने की तिथि से तीन महीने के भीतर एक तर्कसंगत और स्पष्ट आदेश पारित करने का निर्देश दिया। इसके साथ ही रिट याचिका को इस सीमा तक स्वीकार कर लिया गया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: बिपिन कुमार वर्मा बनाम बिहार राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल रिट ज्यूरिस्डिक्शन केस संख्या 20684/2019
पीठ: जस्टिस कुमार मनीष
निर्णय की तिथि: 29-09-2026

