सरकारी औद्योगिक प्रोत्साहनों के टैक्स निर्धारण को स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया है कि औद्योगिक इकाई द्वारा उत्पादन शुरू किए जाने के बाद वास्तविक बिजली बिलों के आधार पर मिलने वाली सब्सिडी टैक्स योग्य रेवेन्यू रसीद (राजस्व प्राप्ति) है, न कि टैक्स-मुक्त कैपिटल रसीद (पूंजीगत प्राप्ति)। कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स, मदुरै के खिलाफ मेसर्स मेपको इंडस्ट्रीज लिमिटेड द्वारा दायर अपील को खारिज करते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने टैक्स अधिकारियों और मद्रास हाईकोर्ट के समवर्ती निष्कर्षों को बरकरार रखा। पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी सब्सिडी की प्रकृति का मूल्यांकन सामान्य नीतिगत घोषणाओं के बजाय उस सहायता के वास्तविक और क्रियान्वयन उद्देश्य (ऑपरेटिव पर्पस) के आधार पर किया जाना चाहिए।
मामले की पृष्ठभूमि और प्रक्रियात्मक इतिहास
अपीलकर्ता मेसर्स मेपको इंडस्ट्रीज लिमिटेड पोटेशियम क्लोरेट के निर्माण में लगी एक पब्लिक लिमिटेड कंपनी है। असेसमेंट वर्ष 1997-98 के लिए कंपनी को पांडिचेरी सरकार से 16,20,745 रुपये की बिजली सब्सिडी प्राप्त हुई थी। कंपनी ने 27 नवंबर 1997 को दाखिल अपने इनकम टैक्स रिटर्न में इस राशि को गैर-करयोग्य पूंजीगत प्राप्ति (कैपिटल रसीद) के रूप में दर्शाया था।
यह वित्तीय सहायता पांडिचेरी सरकार की पावर सब्सिडी योजना के तहत दी गई थी, जो 27 नवंबर 1975 से लागू थी और जिसे 9 दिसंबर 1985 और 12 अगस्त 1987 को संशोधित किया गया था। इस योजना के तहत उत्पादन शुरू होने के बाद पांच वर्षों के लिए क्रमिक रूप से घटती दर पर बिजली सब्सिडी दी जाती थी—शुरुआती तीन वर्षों के लिए वास्तविक ऊर्जा प्रभार का 33⅓% (या 33%), चौथे वर्ष के लिए 20% और पांचवें वर्ष के लिए 10%।
इनकम टैक्स एक्ट, 1961 की धारा 143(3) के तहत स्क्रूटनी असेसमेंट के दौरान जॉइंट कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स, स्पेशल रेंज-II, मदुरै ने 31 मार्च 2000 को दिए अपने आदेश में इसे पूंजीगत मानने से इनकार कर दिया। असेसिंग ऑफिसर ने सुप्रीम कोर्ट के साहनी स्टील एंड प्रेस वर्क्स लिमिटेड, हैदराबाद बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स, आंध्र प्रदेश-I, हैदराबाद फैसले पर भरोसा करते हुए माना कि यह सब्सिडी परिचालन संबंधी खर्चों (रेवेन्यू एक्सपेंडिचर) के लिए दी गई थी और पूरी राशि को निर्धारिती की करयोग्य आय में जोड़ दिया।
कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स (अपील्स) ने 12 मार्च 2002 को इस आदेश की पुष्टि करते हुए कहा कि इस सब्सिडी का उद्देश्य बिजली की खपत लागत को घटाना और व्यापार की लाभप्रदता को बढ़ाना था। इसके बाद 28 जुलाई 2005 को इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल (आईटीएटी), चेन्नई ने कंपनी की अपील खारिज कर दी। ट्रिब्यूनल ने रेखांकित किया कि यह सब्सिडी इकाई स्थापित होने और उत्पादन शुरू होने के बाद ही उपलब्ध थी और इसका उद्देश्य किसी नई पूंजीगत संपत्ति का निर्माण करना नहीं था। बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने भी 9 जुलाई 2012 को कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स बनाम कराईकल क्लोरेट्स लिमिटेड मामले में अपने पुराने फैसले का अनुसरण करते हुए निर्धारिती की अपील खारिज कर दी।
पक्षकारों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता कंपनी ने दलील दी कि इस योजना का मुख्य उद्देश्य पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देना और नए औद्योगिक उपक्रमों की स्थापना को प्रोत्साहित करना था। कंपनी का तर्क था कि चूंकि नीति का व्यापक उद्देश्य औद्योगिकीकरण को बढ़ावा देना था, इसलिए प्राप्त राशि को पूंजीगत प्रकृति का माना जाना चाहिए।
इसके विपरीत, आयकर विभाग की ओर से पेश एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ने दलील दी कि यह सब्सिडी न तो उद्योग स्थापित करने के लिए दी गई थी और न ही किसी पूंजीगत संपत्ति के अधिग्रहण के लिए। यह उत्पादन के दौरान बिजली खपत की परिचालन लागत को कम करने के लिए दी जाने वाली सहायता थी, जो पूरी तरह से रेवेन्यू रसीद के दायरे में आती है।
अदालत का विश्लेषण: ‘उद्देश्य परीक्षण’ का अनुप्रयोग
पीठ के लिए निर्णय लिखते हुए जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कि किसी सब्सिडी की वास्तविक प्रकृति उस योजना के वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य पर निर्भर करती है जिसके तहत वह राशि दी गई है।
पीठ ने साहनी स्टील मामले में प्रतिपादित सिद्धांतों का विस्तार से परीक्षण किया, जहां शीर्ष अदालत ने कहा था कि उत्पादन शुरू होने के बाद व्यापार चलाने में सहायता के लिए दी जाने वाली रियायतें परिचालन सब्सिडी होती हैं। साहनी स्टील मामले में अदालत ने टिप्पणी की थी:
“वर्तमान मामले में निर्धारिती को दी गई राशि सार्वजनिक कोष से दी गई सब्सिडी के रूप में है। यह धनराशि निर्धारिती को उसका व्यापार या कारोबार चलाने में सहायता करने के लिए उपलब्ध कराई गई थी। हमारे विचार में, अधिसूचना की योजना को ध्यान में रखते हुए, इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता कि सब्सिडी योजना के तहत विभिन्न सहायताओं का उद्देश्य निर्धारिती को अधिक लाभप्रद रूप से व्यवसाय चलाने में सक्षम बनाना था।”
अदालत ने साहनी स्टील के एक अन्य अंश को भी उद्धृत किया:
“इस मामले में ठीक यही प्रश्न उठाया गया है। किसी भी तरह से सेल्स टैक्स की वापसी या बिजली प्रभार अथवा पानी के बिलों में दी गई राहत के रूप में सब्सिडी को निर्धारिती के उद्योग की स्थापना में सहायता नहीं माना जा सकता। जैसा कि हमने पहले देखा है, भुगतान केवल तभी किया जाना था जब निर्धारिती ने अपना उत्पादन शुरू कर दिया हो। उक्त भुगतान निर्धारिती के कारखाने में उत्पादन शुरू होने की तारीख से पांच साल की अवधि के लिए किए गए थे। ये सब्सिडी परिचालन सब्सिडी हैं, न कि पूंजीगत सब्सिडी।”
पीठ ने आगे रेखांकित किया कि इस कानूनी सिद्धांत की पुनः पुष्टि कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स, मद्रास बनाम पोन्नी शुगर्स एंड केमिकल्स लिमिटेड मामले में की गई थी, जिसने ‘उद्देश्य परीक्षण’ (पर्पस टेस्ट) को निर्णायक मानक के रूप में स्थापित किया था:
“साहनी स्टील मामले में इस न्यायालय के निर्णय का महत्व इस बात में है कि इसने पूरे केस लॉ पर चर्चा और विश्लेषण किया है और सब्सिडी के स्वरूप को तय करने के लिए लागू किए जाने वाले बुनियादी परीक्षण को निर्धारित किया है। वह परीक्षण यह है कि निर्धारिती के हाथों में रसीद का स्वरूप उस उद्देश्य के संदर्भ में निर्धारित किया जाना चाहिए जिसके लिए सब्सिडी दी जाती है। दूसरे शब्दों में, ऐसे मामलों में उद्देश्य परीक्षण लागू करना होता है। सब्सिडी किस समय दी जाती है, यह प्रासंगिक नहीं है। इसका स्रोत महत्वहीन है। सब्सिडी का रूप महत्वहीन है… यदि सब्सिडी योजना का उद्देश्य निर्धारिती को अधिक लाभप्रद रूप से व्यवसाय चलाने में सक्षम बनाना था, तो रसीद रेवेन्यू खाते में है। दूसरी ओर, यदि सब्सिडी योजना के तहत सहायता का उद्देश्य निर्धारिती को एक नई इकाई स्थापित करने या मौजूदा इकाई का पर्याप्त विस्तार करने में सक्षम बनाना था, तो सब्सिडी की प्राप्ति पूंजीगत खाते में थी। इसलिए, वह उद्देश्य ही जिसके लिए सब्सिडी/सहायता दी जाती है, प्रोत्साहन सब्सिडी की प्रकृति तय करता है। जिस व्यवस्था के माध्यम से सब्सिडी दी जाती है, उसका रूप अप्रासंगिक है।”
अदालत ने इस मामले की तुलना कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स-I, कोल्हापुर बनाम चाफलकर ब्रदर्स, पुणे से करते हुए अंतर स्पष्ट किया। चाफलकर ब्रदर्स मामले में मनोरंजन शुल्क में छूट को पूंजीगत माना गया था क्योंकि उस योजना का मुख्य उद्देश्य अत्यधिक पूंजी-गहन मल्टीप्लेक्स सिनेमा परिसरों की स्थापना को बढ़ावा देना था। शीर्ष अदालत ने दोहराया कि प्रत्येक योजना का मूल्यांकन उसकी अपनी शर्तों और प्रावधानों के आधार पर किया जाना आवश्यक है।
पांडिचेरी सरकार की योजना का विश्लेषण करते हुए पीठ ने पाया कि इसके तहत औद्योगिक उपभोक्ता को निर्माण प्रक्रिया में वास्तव में खपत की गई बिजली और उसके बिल का प्रमाण देना होता था, जिसके बाद चालू बिजली बिलों से कटौती के रूप में सब्सिडी दी जाती थी। यह पूंजी निवेश पर आधारित कोई एकमुश्त स्वतंत्र अनुदान नहीं था, बल्कि इसकी मात्रा उत्पादन के दौरान आने वाले बिजली बिलों के साथ सीधे घटती-बढ़ती थी।
अदालत ने अपीलकर्ता की इस दलील को खारिज कर दिया कि योजना की प्रस्तावना में “उद्योगों के विकास को बढ़ावा देने” का उल्लेख होने मात्र से यह पूंजीगत सहायता बन जाती है:
- किसी पिछड़े क्षेत्र के विकास या औद्योगीकरण के व्यापक नीतिगत लक्ष्य को योजना के वास्तविक क्रियान्वयन तंत्र से अलग करके नहीं देखा जा सकता।
- यह सब्सिडी प्लांट या मशीनरी खरीदने, फैक्ट्री निर्माण करने या पूंजीगत ऋण चुकाने के लिए नहीं दी गई थी।
- बिजली बिलों में राहत मिलने से यदि कंपनी के पास व्यवसाय चलाने के लिए अधिक नकदी बच जाती है, तो केवल इस आर्थिक लाभ के आधार पर सब्सिडी का रेवेन्यू स्वरूप नहीं बदल जाता।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह सब्सिडी उत्पादन शुरू होने के बाद सामान्य विनिर्माण खर्चों को पूरा करने के लिए दी गई थी। अतः असेसिंग ऑफिसर, सीआईटी (अपील्स), आईटीएटी और मद्रास हाईकोर्ट द्वारा 16,20,745 रुपये की इस राशि को टैक्स योग्य रेवेन्यू रसीद मानना पूर्णतः सही था। पीठ ने अपील में कोई दम न पाते हुए उसे खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मेसर्स मेपको इंडस्ट्रीज लिमिटेड बनाम कमिश्नर ऑफ इनकम टैक्स, मदुरै
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8694 / 2012
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा, जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 07 अक्टूबर 2026

