सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (आरपी एक्ट) की धारा 81(1) के तहत किसी चुनाव याचिका को स्वयं याचिकाकर्ता द्वारा व्यक्तिगत रूप से पेश किया जाना एक अनिवार्य वैधानिक शर्त है। यदि इस अनिवार्यता का पालन नहीं किया जाता है, तो अधिनियम की धारा 86(1) के तहत अदालत के पास याचिका को शुरुआती स्तर (थ्रेशोल्ड) पर ही खारिज करने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता। जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा, जिसमें तमिलनाडु के विधायक एस. रघुपति के निर्वाचन को चुनौती देने वाली चुनाव याचिका को केवल इसलिए खारिज कर दिया गया था क्योंकि वह याचिकाकर्ता द्वारा व्यक्तिगत रूप से पेश किए जाने के बजाय उसके वकील द्वारा दाखिल की गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद वर्ष 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनावों से जुड़ा है, जहाँ 181-तिरुमयम विधानसभा क्षेत्र से एस. रघुपति को 4 मई 2026 को विजयी प्रत्याशी घोषित किया गया था।
चुनाव परिणाम के बाद याचिकाकर्ता वी. पोन. पन्नीरसेल्वम ने जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धाराओं 80, 80A, 81, 83, 100(1)(b), 100(1)(d)(i) व (iv) और धारा 123(2) के साथ मद्रास हाईकोर्ट इलेक्शन पिटीशन्स रूल्स, 1967 के तहत मद्रास हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल की। पन्नीरसेल्वम ने रघुपति के निर्वाचन को अमान्य और शून्य घोषित करने की मांग की थी। याचिका में आरोप लगाया गया था कि रघुपति ने वैधानिक फॉर्म 26 हलफनामे में अपनी पत्नी की संपत्तियों की जानकारी जानबूझकर छिपाई और आय से संबंधित गलत घोषणाएं कीं, जो ‘अनुचित प्रभाव’ (अंड्यू इन्फ्लुएंस) के तहत भ्रष्ट आचरण की श्रेणी में आता है।
हालांकि, 22 जुलाई 2026 को मद्रास हाईकोर्ट ने इस चुनाव याचिका (ईएलपी संख्या 36/2026) को पोषणीय (मेंटेनेबल) न मानते हुए खारिज कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले का आधार मद्रास हाईकोर्ट इलेक्शन पिटीशन्स रूल्स, 1967 के नियम 7 को बनाया, जो स्पष्ट रूप से अनिवार्य करता है कि प्रत्येक चुनाव याचिका स्वयं याचिकाकर्ता द्वारा व्यक्तिगत रूप से द्वितीय सहायक रजिस्ट्रार (मूल शाखा) या रजिस्ट्रार द्वारा नामित अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत की जानी चाहिए। क्योंकि याचिका याचिकाकर्ता के वकील ने पेश की थी, इसलिए हाईकोर्ट ने इसे गैर-पोषणीय माना। इस फैसले के खिलाफ पन्नीरसेल्वम ने सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (विशेष अनुमति याचिका) दाखिल की।
पक्षकारों की दलीलें
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने 16 जून 2026 को रजिस्ट्री के समक्ष व्यक्तिगत रूप से चुनाव याचिका पेश की थी। अपने इस दावे के समर्थन में उसने सीआईएसएफ (CISF) प्रवेश पास पेश किया, जिससे उस तारीख को हाईकोर्ट परिसर में उसकी मौजूदगी साबित होती थी। इसके अलावा, उसने सीसीटीवी फुटेज का भी हवाला दिया और कहा कि उसमें याचिका की प्रस्तुति और उसका व्यक्तिगत सत्यापन दर्ज है। याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णय डॉ. विजय लक्ष्मी साधो बनाम जगदीश पर भी भरोसा जताया और तर्क दिया कि केवल हाईकोर्ट द्वारा बनाए गए नियमों के उल्लंघन के आधार पर आरपी एक्ट की धारा 86(1) के तहत याचिका खारिज नहीं की जा सकती।
पीठ के समक्ष मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या आरपी एक्ट की धारा 81 के तहत याचिकाकर्ता द्वारा स्वयं याचिका प्रस्तुत करना अनिवार्य है, क्या इसका पालन न करने पर धारा 86(1) के तहत याचिका का खारिज होना तय है, और क्या हाईकोर्ट को ऐसी याचिकाओं की प्रस्तुति से जुड़े प्रक्रियात्मक नियम तय करने का अधिकार है।
धारा 81 और कानूनी नज़ीरों का विश्लेषण
अधिनियम के कानूनी ढांचे की पड़ताल करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि आरपी एक्ट की धारा 81(1) की भाषा बेहद स्पष्ट और सटीक है। जी.वी. श्रीराम रेड्डी एवं अन्य बनाम रिटर्निंग ऑफिसर एवं अन्य (2009) के फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने दोहराया कि धारा 81(1) में पांच अलग और अनिवार्य घटक शामिल हैं:
- याचिकाकर्ता की योग्यता (वह प्रत्याशी हो या संबंधित क्षेत्र का मतदाता);
- याचिका स्वयं याचिकाकर्ता ‘द्वारा’ (by) पेश की जानी चाहिए;
- याचिका धारा 100 और 101 में निर्दिष्ट आधारों पर आधारित होनी चाहिए;
- इसे हाईकोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाना चाहिए; और
- इसे चुनाव परिणाम की तारीख से 45 दिनों के भीतर पेश किया जाना चाहिए।
इस वैधानिक अनिवार्यता पर ज़ोर देते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
इस प्रकार, धारा 81 के तहत याचिका पेश करने की आवश्यकता को वैधानिक योजना से अलग महज़ एक प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं माना जा सकता, क्योंकि इसका अनुपालन चुनाव याचिका की विचारणीयता (मेंटेनेबिलिटी) से सीधा संबंध रखता है और यदि इसमें कोई त्रुटि होती है, तो उसे सुधारा नहीं जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने के. वेंकटेश्वर राव एवं अन्य बनाम बेक्कम नरसिम्हा रेड्डी एवं अन्य तथा हुकुमदेव नारायण यादव बनाम ललित नारायण मिश्रा के मामलों का संदर्भ देते हुए कहा कि आरपी एक्ट एक विशेष और स्वतः पूर्ण संहिता (सेल्फ-कंटेन्ड कोड) है, जिसका कड़ाई से पालन किया जाना आवश्यक है और इसमें बाहरी प्रक्रियात्मक ढील की गुंजाइश नहीं है।
धारा 81(1) में प्रयुक्त शब्द ‘द्वारा’ (by) के महत्व को स्पष्ट करते हुए अदालत ने कहा:
याचिका को याचिकाकर्ता ‘द्वारा’ पेश किए जाने की अनिवार्यता हाईकोर्ट को प्रस्तुति के स्तर पर ही प्रारंभिक सत्यापन करने में सक्षम बनाती है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि कार्यवाही निरर्थक या तंग करने वाली नहीं है।
पीठ ने धारा 81 के विधायी इतिहास का भी उल्लेख किया। 1966 से पूर्व, धारा 81 की उपधारा (2) में यह व्यवस्था थी कि चुनाव आयोग को याचिका अधिकृत प्रतिनिधि के माध्यम से या रजिस्टर्ड डाक द्वारा भी भेजी जा सकती थी। लेकिन जनप्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1966 के जरिए जब चुनाव याचिकाओं पर सुनवाई का अधिकार हाईकोर्ट को सौंपा गया, तब उपधारा (2) को हटा दिया गया। वर्तमान कानून में किसी प्रतिनिधि या डाक के जरिए याचिका दाखिल करने को कोई मान्यता नहीं दी गई है।
हाईकोर्ट के नियम और तथ्यात्मक निष्कर्ष
हाईकोर्ट द्वारा याचिकाएं प्राप्त करने के लिए नियम बनाने के अधिकार क्षेत्र पर सुप्रीम कोर्ट ने जमाल उद्दीन अहमद बनाम अबू सालेह नजमुद्दीन एवं अन्य (2003) के मामले का हवाला दिया। पीठ ने कहा कि किसी अदालत को जब कोई मुख्य वैधानिक अधिकार दिया जाता है, तो उस शक्ति को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक अनुषंगी व प्रशासनिक शक्तियां भी स्वतः निहित होती हैं। न्यायिक कार्यों को सौंपा नहीं जा सकता, परंतु दस्तावेज प्राप्त करना, उसकी प्राथमिक जांच करना और फाइलिंग से जुड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारियां रजिस्ट्री के अधिकारियों को सौंपी जा सकती हैं।
मद्रास हाईकोर्ट इलेक्शन पिटीशन्स रूल्स, 1967 के नियम 7 को वैध ठहराते हुए अदालत ने कहा:
यह नियम हाईकोर्ट के समक्ष चुनाव याचिका पेश करने और उसे स्वीकार करने के तरीके को नियंत्रित करता है और ऐसा करते हुए, यह आरपी एक्ट द्वारा हाईकोर्ट को प्रदत्त अधिकार क्षेत्र के एक सहायक अंग के रूप में कार्य करता है। यह नियम अपने शब्दों में अधिनियम की धारा 81 द्वारा स्पष्ट रूप से निर्धारित किसी भी आवश्यकता का उल्लंघन नहीं करता और न ही उसके विपरीत जाता है।
मामले के तथ्यों पर विचार करते हुए अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता स्वयं याचिका प्रस्तुत करने का कोई समकालीन दस्तावेजी सबूत नहीं दे सका। सीआईएसएफ पास और सीसीटीवी फुटेज से केवल यह साबित होता है कि वह 16 जून 2026 को अदालत परिसर में मौजूद था, लेकिन इससे यह सिद्ध नहीं होता कि उसने याचिका खुद पेश की थी। इसके विपरीत, आरपी एक्ट की धारा 117 के तहत जमा की जाने वाली सुरक्षा राशि (सिक्योरिटी डिपॉजिट) की रसीद याचिकाकर्ता के वकील के नाम पर जारी की गई थी।
पीठ ने डॉ. विजय लक्ष्मी साधो बनाम जगदीश पर याचिकाकर्ता के भरोसे को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि साधो मामला धारा 83 के तहत हलफनामे की त्रुटि से संबंधित था, जो धारा 86(1) के तहत शुरुआती खारिजगी का आधार नहीं है। इसके विपरीत, धारा 81 के उल्लंघन पर धारा 86(1) के तहत याचिका का खारिज होना कानूनन अनिवार्य है।
अदालत ने शेओ सदन सिंह बनाम मोहन लाल गौतम के मामले में भी अंतर स्पष्ट किया। उस मामले में याचिकाकर्ता की प्रत्यक्ष मौजूदगी में उसके वकील के क्लर्क ने याचिका पेश की थी, जिसे अदालत ने पर्याप्त अनुपालन माना था। लेकिन पन्नीरसेल्वम के मामले में ऐसा कोई साक्ष्य या तथ्य नहीं था कि वह याचिका पेश किए जाने के समय अपने वकील के साथ व्यक्तिगत रूप से उपस्थित था।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला
मद्रास हाईकोर्ट के रुख से पूर्ण सहमति व्यक्त करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि चुनाव याचिका आरपी एक्ट की धारा 81 और संबंधित हाईकोर्ट नियमों के अनुसार प्रस्तुत नहीं की गई थी।
अदालत ने याचिका को आधारहीन पाते हुए स्पेशल लीव पिटीशन को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: वी. पोन. पन्नीरसेल्वम बनाम एस. रघुपति एवं अन्य
वाद संख्या: स्पेशल लीव पिटीशन (सिविल) संख्या 30538/2026
पीठ: जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर
निर्णय की तिथि: 7 अक्टूबर 2026

