गौहाटी हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि जब अदालतें और न्यायाधिकरण (ट्रिब्यूनल) अवैध प्रवासियों और विदेशियों से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रहे हों, तो गलत जगह सहानुभूति नहीं दिखाई जा सकती और ऐसे मामलों में देश का हित ही सर्वोपरि होना चाहिए।
जस्टिस कल्याण राय सुराणा और जस्टिस सुस्मिता फुकन खौंड की खंडपीठ ने यह टिप्पणी मुसम्मत हसीना भानू नामक महिला की याचिका खारिज करते हुए की। याचिका में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के उस फैसले को चुनौती दी गई थी, जिसमें भानू को 25 मार्च 1971 के बाद भारत में अवैध रूप से दाखिल हुई विदेशी नागरिक घोषित किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता भरोसेमंद और कानूनी रूप से स्वीकार्य दस्तावेजों के जरिए अपनी वंशावली साबित करने में नाकाम रही हैं। इसके साथ ही अदालत ने भानू को 25 अगस्त 2017 को दी गई अंतरिम जमानत रद्द कर दी और ट्रिब्यूनल के 19 मई 2017 के आदेश के तहत कानूनी परिणाम प्रभावी करने का निर्देश दिया।
फॉरेनर्स एक्ट के तहत नागरिकता साबित करने का दायित्व
हाईकोर्ट ने 5 अक्टूबर को दिए फैसले में रेखांकित किया कि फॉरेनर्स एक्ट के प्रावधानों के तहत जब किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठता है, तो खुद को भारतीय साबित करने का पूरा कानूनी भार उसी व्यक्ति पर होता है। अदालत ने कहा कि इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए व्यक्ति को बुनियादी पारिवारिक तथ्य अदालत के सामने रखने होते हैं और उन्हें ठोस, विश्वसनीय और स्वीकार्य दस्तावेजी साक्ष्यों से साबित करना होता है।
खंडपीठ ने यह भी कहा कि ट्रिब्यूनल की कार्यवाही के दौरान अपनी बात को लिखित बयान (रिटन स्टेटमेंट) के बजाय केवल ‘अभ्यावेदन’ कहकर कोई भी व्यक्ति पूरी जानकारी देने से बच नहीं सकता। नागरिकता का दावा करने वाले को अपने जन्म की तारीख, जन्मस्थान, माता-पिता की जानकारी, उनके जन्मस्थान और वंशावली से जुड़े अन्य आवश्यक पारिवारिक विवरण स्पष्ट रूप से दर्ज करने होते हैं।
बुनियादी पारिवारिक विवरणों का अभाव
अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता के लिखित बयान में कई गंभीर कमियां थीं। भानू ने यह स्पष्ट नहीं किया कि उनका जन्म कब और कहां हुआ तथा उनका पालन-पोषण किस स्थान पर हुआ। इसके अतिरिक्त, उन्होंने अपने माता-पिता की जन्मतिथि और जन्मस्थान की जानकारी भी नहीं दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि बयान में दादा-दादी, माता-पिता, पिता के भाई-बहनों (चाचा-ताऊ या बुआ), अपने खुद के भाई-बहनों और अपने बच्चों तक के नामों का कोई उल्लेख नहीं किया गया था, जो पारिवारिक वंशावली की पुष्टि के लिए आवश्यक थे।
दस्तावेजों में वंशावली की कड़ी अधूरी
भानू का दावा था कि वह जन्म से भारतीय नागरिक हैं। अपने पक्ष में उन्होंने 1966 और 1970 की मतदाता सूचियां पेश कीं, जिनमें हासेन अली नाम के व्यक्ति का नाम दर्ज था। भानू ने हासेन अली को अपना पिता बताया था। इसके अलावा उन्होंने बाद के वर्षों की मतदाता सूचियां (जिनमें उनका खुद का नाम था), एक पैन कार्ड आवेदन और ग्राम पंचायत सचिव द्वारा जारी लिंकेज प्रमाण पत्र अदालत के समक्ष रखा।
इन दस्तावेजों की समीक्षा के बाद खंडपीठ ने पाया कि 1966 और 1970 की मतदाता सूची में हासेन अली का नाम तो दर्ज था, लेकिन उन रिकॉर्ड्स में भानू का नाम उनके साथ मतदाता के रूप में नहीं था। इससे यह साबित नहीं होता कि वह हासेन अली की ही बेटी हैं। अदालत ने कहा कि इन सूचियों से कथित माता-पिता और दादा-दादी की पारिवारिक संरचना स्थापित नहीं होती। वहीं, ग्राम पंचायत के प्रमाण पत्र को अदालत ने इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि इसे जारी करने वाले अधिकारी को बतौर गवाह अदालत में पेश कर दस्तावेज को साबित नहीं कराया गया था।
जिरह और समन से जुड़ी दलीलें नामंजूर
याचिकाकर्ता ने यह तर्क भी दिया था कि राज्य पक्ष ने न तो उनसे और न ही उनके गवाह मो. इमाम हुसैन से जिरह (क्रॉस-एग्जामिनेशन) की थी, इसलिए उनके पक्ष को साबित मान लिया जाना चाहिए। इमाम हुसैन ने खुद को भानू का चाचा बताते हुए गवाही दी थी कि वह हासेन अली की बेटी हैं।
हाईकोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि किसी गवाह से विरोधी पक्ष द्वारा जिरह न किए जाने मात्र से कोई विवादित तथ्य अपने आप साबित नहीं हो जाता। अदालत ने स्पष्ट किया कि फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष केवल मौखिक गवाही नागरिकता का प्रमाण नहीं हो सकती; इसके लिए दस्तावेजी साक्ष्य का होना अनिवार्य है।
अदालत ने यह भी साफ किया कि किसी समन में संदिग्ध के पिता के तौर पर किसी व्यक्ति का नाम दर्ज होने से पितृत्व साबित नहीं होता और न ही इसे प्रशासन की तरफ से रिश्ते की स्वीकारोक्ति माना जा सकता है। हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के फैसले में दखल देने से इनकार करते हुए याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया।

