सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड की DGP के रूप में वरिष्ठ IPS अधिकारी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर केंद्र सरकार की अवमानना याचिका गुरुवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने पर सहमति जताई है। मिश्रा को 30 दिसंबर 2025 को, उनकी सेवानिवृत्ति से सिर्फ एक दिन पहले, राज्य का DGP नियुक्त किया गया था।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच के सामने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने केंद्र की ओर से अनुरोध किया कि अवमानना याचिका को मिश्रा की नियुक्ति से जुड़ी अन्य लंबित याचिकाओं के साथ सुना जाए।
इस पर चीफ जस्टिस ने कहा कि केंद्र की याचिका को भी गुरुवार को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया जाएगा।
छह महीने की शेष सेवा का मुद्दा
वरिष्ठ अधिवक्ता और एमिकस क्यूरी राजू रामचंद्रन ने इससे पहले सुप्रीम कोर्ट को बताया था कि तदाशा मिश्रा की नियुक्ति कोर्ट के उन निर्देशों के खिलाफ है, जिनके तहत DGP पद संभालने वाले अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा शेष होना जरूरी है।
रामचंद्रन उन मामलों में बेंच की सहायता कर रहे हैं, जिनमें विभिन्न राज्यों पर DGP नियुक्तियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन न करने का आरोप है।
कोर्ट को बताया गया था कि मिश्रा को सेवानिवृत्ति से केवल 24 घंटे पहले DGP नियुक्त करने का नतीजा यह हुआ कि उन्हें प्रभावी रूप से दो साल का कार्यकाल मिल गया।
प्रकाश सिंह मामले में क्या हैं सुप्रीम कोर्ट के निर्देश
प्रकाश सिंह मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार, DGP पद के लिए विचार किए जाने वाले अधिकारी की कम से कम छह महीने की सेवा शेष होनी चाहिए। इसका उद्देश्य पुलिस नेतृत्व में स्थिरता और योग्यता सुनिश्चित करना है।
सुप्रीम कोर्ट के 2006 के फैसले और बाद के निर्देशों में कहा गया था कि राज्य सरकार DGP का चयन विभाग के तीन सबसे वरिष्ठ अधिकारियों में से करेगी, जिन्हें UPSC उनकी सेवा अवधि, बहुत अच्छे रिकॉर्ड और पुलिस बल का नेतृत्व करने के अनुभव के आधार पर पदोन्नति के लिए सूचीबद्ध करे।
एक बार DGP नियुक्त होने के बाद अधिकारी को सेवानिवृत्ति की तारीख की परवाह किए बिना कम से कम दो साल का कार्यकाल मिलना चाहिए।

