सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि आपसी सहमति से बने संबंधों में खटास आने के बाद शादी के लिए दबाव बनाने के मकसद से दर्ज कराई गई एफआईआर के आधार पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज करते हुए जिसमें आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार किया गया था, जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 की धारा 482 के तहत निहित शक्तियों का प्रयोग करते हुए अपीलकर्ता और अन्य आरोपियों के खिलाफ दर्ज चार्जशीट और पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया। पीठ ने माना कि ऐसे मामले में अदालती ट्रायल जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं होगा।
मामले की पृष्ठभूमि
अपीलकर्ता ने हाईकोर्ट द्वारा एफआईआर रद्द करने से इनकार किए जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। यह एफआईआर (क्र. 326/2025) 5 दिसंबर 2025 को छत्तीसगढ़ के सरगुजा स्थित मणिपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज की गई थी।
यह मामला दूसरी प्रतिवादी (शिकायतकर्ता महिला) के बयान पर दर्ज हुआ था, जो एक बैंक में कार्यरत थी जहां अपीलकर्ता का बतौर ग्राहक नियमित आना-जाना था। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि 5 मई 2024 को अपीलकर्ता उसे कार में ले गया, उसे नशीला पदार्थ पिलाया और उसके साथ बलात्कार किया। उसका कहना था कि जब उसे होश आया, तो अपीलकर्ता ने पुलिस में शिकायत न करने की गुहार लगाई और उससे शादी करने का वादा किया। इसके बाद दोनों के बीच संबंध जारी रहे। शिकायतकर्ता का दावा था कि इस दौरान वह अक्टूबर 2024 और फरवरी 2025 में दो बार गर्भवती हुई और दोनों बार गर्भपात कराया गया।
शिकायतकर्ता ने यह भी आरोप लगाया कि 29 अक्टूबर 2025 को अपीलकर्ता और उसके चचेरे भाई ने एक होटल के कमरे में उसके साथ मारपीट की, होटल कर्मचारियों के सामने उसे बाहर निकाला और उनके निजी संबंधों के वीडियो वायरल करने की धमकी दी। उसने कहा कि जब वह अगले दिन शिकायत दर्ज कराने जा रही थी, तब अपीलकर्ता और अन्य आरोपियों ने जान से मारने की धमकी दी। इसके बाद अपीलकर्ता के पिता द्वारा भी लगातार धमकियां दी जाने लगीं। शिकायतकर्ता ने अपनी शिकायत में साफ तौर पर लिखा था कि वह अपीलकर्ता से शादी करना चाहती है और यदि वह शादी नहीं करता, तो उसके खिलाफ यौन शोषण और उत्पीड़न के लिए दंडात्मक कार्रवाई की जाए।
इसके विपरीत, अपीलकर्ता का पक्ष था कि बैंक जाने के दौरान उसकी जान-पहचान महिला कर्मचारी से हुई थी। बैंक कर्मी होने का फायदा उठाकर उसने उसका मोबाइल नंबर हासिल किया और बैंक की विभिन्न योजनाओं में निवेश करने के लिए लगातार दबाव बनाने लगी। जब अपीलकर्ता ने निवेश करने से मना कर दिया, तो उसने झूठे आरोप लगाकर पैसे ऐंठने शुरू कर दिए। अपीलकर्ता ने शुरुआत में कुछ रकम दी, लेकिन बाद में और पैसे देने से इनकार कर दिया। इसके बाद अपीलकर्ता ने महिला के खिलाफ संबंधित थाने में 7 नवंबर 2025 और 2 दिसंबर 2025 को दो पुलिस शिकायतें दर्ज कराईं। अपीलकर्ता का कहना था कि उसकी शिकायतों पर पुलिस द्वारा शुरू की गई जांच के बदले में ही 5 दिसंबर 2025 को उसके खिलाफ यह जवाबी एफआईआर दर्ज कराई गई।
पक्षकारों की दलीलें
मामले की सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता की ओर से वरिष्ठ वकील के. परमेश्वर पेश हुए, जबकि छत्तीसगढ़ राज्य का प्रतिनिधित्व एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड सिद्धार्थ सिन्हा ने किया। सुप्रीम कोर्ट द्वारा नोटिस जारी किए जाने के बावजूद दूसरी प्रतिवादी (शिकायतकर्ता) की ओर से अदालत में कोई उपस्थित नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और पूर्व निर्णय
आपराधिक मामले को रद्द करने के कानूनी मानकों का विश्लेषण करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने प्रदीप कुमार केसरवानी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में तय किए गए चार चरणों वाले परीक्षण का उल्लेख किया, जो राजीव थापर एवं अन्य बनाम मदन लाल कपूर के फैसले पर आधारित है:
“20. सीआरपीसी की धारा 482 के तहत हाईकोर्ट में निहित शक्तियों का सहारा लेकर किसी आरोपी द्वारा की गई कार्यवाही रद्द करने की प्रार्थना की सत्यता को सामान्यतः निम्नलिखित चरणों से तय किया जाना चाहिए:-
(i) पहला चरण, क्या आरोपी द्वारा प्रस्तुत की गई सामग्री ठोस, तर्कसंगत और असंदिग्ध है, यानी सामग्री उच्च और त्रुटिहीन गुणवत्ता की है?
(ii) दूसरा चरण, क्या आरोपी द्वारा प्रस्तुत सामग्री आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों में निहित दावों को खारिज करती है, यानी क्या सामग्री शिकायत में लगाए गए तथ्यात्मक दावों को नकारने और खारिज करने के लिए पर्याप्त है, यानी क्या सामग्री ऐसी है जो किसी भी समझदार व्यक्ति को आरोपों के तथ्यात्मक आधार को झूठा मानकर खारिज करने के लिए आश्वस्त कर दे?
(iii) तीसरा चरण, क्या आरोपी द्वारा प्रस्तुत सामग्री का अभियोजन या शिकायतकर्ता द्वारा खंडन नहीं किया गया है; और/या सामग्री ऐसी है जिसका अभियोजन या शिकायतकर्ता द्वारा उचित रूप से खंडन नहीं किया जा सकता?
(iv) चौथा चरण, क्या मुकदमे (ट्रायल) को आगे बढ़ाने से अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इससे न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं होगा?
यदि इन सभी चरणों का उत्तर सकारात्मक है, तो हाईकोर्ट की न्यायिक अंतरात्मा को सीआरपीसी की धारा 482 के तहत प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए ऐसी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर देना चाहिए।”
मौजूदा मामले के तथ्यों का इन पैमानों पर मूल्यांकन करते हुए पीठ ने टिप्पणी की:
“दलीलों और तथ्यों को देखने से यह पूरी तरह स्पष्ट है कि दोनों पक्षों के बीच आपसी सहमति से संबंध थे।”
पहले चरण पर विचार करते हुए पीठ ने कहा कि अपीलकर्ता द्वारा पेश किए गए साक्ष्य साफ दर्शाते हैं कि उसने शिकायतकर्ता को पैसे दिए थे, जिसके बारे में उसका दावा था कि यह उगाही के तहत दिए गए थे। साथ ही अपीलकर्ता ने एफआईआर दर्ज होने से पहले ही पुलिस में दो शिकायतें दर्ज करा रखी थीं।
दूसरे चरण की पड़ताल करते हुए अदालत ने रेखांकित किया:
“दूसरे चरण पर हमें विशेष रूप से यह ध्यान देना होगा कि दोनों के बीच प्रेम संबंध था और खुद दूसरी प्रतिवादी के अनुसार भी, उसकी मर्जी के खिलाफ बलात्कार किया गया था और उसके बाद शादी की इच्छा जताई गई थी। दूसरी प्रतिवादी को शारीरिक संबंध बनाने के लिए शादी का झांसा देने का कोई आरोप नहीं लगाया गया था। विशिष्ट आरोप यह है कि बलात्कार किया गया और मामले की शिकायत दर्ज कराने से रोकने के लिए शादी की इच्छा जताई गई, जिसे उसने स्वेच्छा से स्वीकार कर लिया। इसलिए, बलात्कार का यह आरोप डेढ़ साल से अधिक समय से विलंबित है।”
पीठ ने आगे पाया कि होटल के कमरे में कथित मारपीट की कोई सूचना न तो होटल स्टाफ ने और न ही खुद महिला ने उस समय पुलिस को दी। परिजनों द्वारा दी गई धमकियों की भी तब कोई शिकायत नहीं की गई थी। इसके अलावा अदालत ने कहा:
“यह शिकायत विशेष रूप से अपीलकर्ता पर शिकायतकर्ता से शादी करने का दबाव बनाने के लिए दर्ज कराई गई थी, ऐसा न होने पर वह कथित यौन उत्पीड़न और शोषण के लिए दंडात्मक कार्रवाई चाहती थी। हम यह भी पाते हैं कि हालांकि दूसरी प्रतिवादी का दावा है कि उसका दो बार गर्भपात कराया गया, लेकिन मेडिकल रिपोर्ट में ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया है।”
चौथे चरण पर अदालत ने दृढ़ मत व्यक्त किया कि “ट्रायल चलाने से कोई उद्देश्य सिद्ध नहीं होगा।”
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि हाईकोर्ट को सीआरपीसी की धारा 482 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस आपराधिक मामले को रद्द कर देना चाहिए था। ऐसा न होने पर शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया और सरगुजा जिले के अंबिकापुर स्थित मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत में लंबित क्रिमिनल केस नंबर 147/2026 से संबंधित चार्जशीट नंबर 5/2026 (दिनांक 19 जनवरी 2026) को रद्द कर दिया।
अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले में अपीलकर्ता अथवा एफआईआर में नामजद किसी भी अन्य आरोपी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही आगे नहीं बढ़ेगी, क्योंकि मारपीट और आपराधिक धमकी के आरोपों में कोई दम नजर नहीं आता। इसके साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अपीलकर्ता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों के संबंध में भी आगे की कार्यवाही जारी रखने की आवश्यकता नहीं है।
अपने आदेश के समापन पर पीठ ने कहा:
“हम ये परिणामी निर्देश केवल इसलिए दे रहे हैं क्योंकि हमारा मानना है कि दोनों पक्षों के बीच सहमति से संबंध थे, जो बाद में बिगड़ गए और फिर दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगे।”
इन निर्देशों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और सभी लंबित अर्जियों को खारिज कर दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सचिन गुप्ता बनाम छत्तीसगढ़ राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: आपराधिक अपील संख्या 4721/2026, विशेष अनुमति याचिका क्रिमिनल संख्या 4615/2026 से उद्भूत
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 1 अक्टूबर 2026

