कर्नाटक हाईकोर्ट ने हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा भुगत रहे एक कैदी को खुद की शादी रचाने के लिए 15 दिनों की परोल मंजूर कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी कैदी का अपना विवाह भी परोल दिए जाने के वैध आधारों के दायरे में आता है और इस आधार पर अस्थायी रिहाई से इनकार करना पूरी तरह अनुचित होगा। हालांकि, अदालत ने कैदी की रिहाई के साथ कड़ी शर्तें भी तय की हैं।
जस्टिस बी एम श्याम प्रसाद की एकल पीठ ने यह फैसला 24 सितंबर को सुनाया। अदालत कैदी की मां और उसकी होने वाली दुल्हन द्वारा संयुक्त रूप से दाखिल की गई याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाकर्ताओं ने बेंगलुरु की परप्पना अग्रहारा सेंट्रल जेल के अधीक्षक के 9 मई 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कैदी की आपातकालीन परोल (इमरजेंसी परोल) की अर्जी नामंजूर कर दी गई थी। जेल प्रशासन का कहना था कि आपातकालीन परोल केवल बेटे, बेटी, भाई या बहन की शादी जैसे विशिष्ट पारिवारिक आयोजनों के लिए ही दी जा सकती है।
जेल के इनकार पर हाईकोर्ट का रुख
सुनवाई के दौरान जस्टिस प्रसाद ने रेखांकित किया कि मौजूदा नियमों के तहत किसी भाई या बहन के विवाह में शामिल होने के लिए कैदी को सामान्य परोल दिए जाने का स्पष्ट प्रावधान है। अदालत ने इस पर विचार किया कि जब परिजनों की शादी के लिए यह छूट संभव है, तो वही सिद्धांत कैदी के खुद के विवाह पर भी लागू होना चाहिए।
अदालत ने कहा कि कैदी का अपना विवाह भी उन कारणों में शामिल माना जाना चाहिए जिनके तहत परोल स्वीकृत की जाती है। हालांकि, पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्णय का यह मतलब कतई नहीं है कि शादी करने की इच्छा जताने वाले हर कैदी को स्वतः ही रिहाई का अधिकार मिल जाएगा; इसके लिए परोल से जुड़े अन्य सभी अनिवार्य नियमों और कसौटियों पर खरा उतरना जरूरी होगा।
लंबित मुकदमों में जमानत और सुरक्षा शर्तें
कारागार प्रशासन द्वारा 16 जनवरी 2025 को जारी किए गए कारावास प्रमाण पत्र में कैदी पर चल रहे अन्य आपराधिक मुकदमों का हवाला दिया गया था, जिसे रिहाई के आड़े आने वाला कारक बताया जा रहा था।
हाईकोर्ट ने जब इन मुकदमों के रिकॉर्ड की पड़ताल की, तो पाया कि संबंधित व्यक्ति को सेशंस कोर्ट अथवा हाईकोर्ट से पहले ही सभी लंबित मामलों में जमानत मिल चुकी है, जिसमें से एक मामले में नकद मुचलके की शर्त पूरी की जा चुकी थी। अदालत ने पाया कि इसके अतिरिक्त ऐसी कोई वजह नहीं है जिसके आधार पर कैदी को राहत न दी जाए।
याचिका का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट ने जेल अधिकारियों को निर्देश दिया कि कर्नाटक कारागार एवं सुधार सेवा नियमावली, 2021 के प्रावधानों के तहत कैदी को 15 दिनों की सामान्य परोल पर छोड़ा जाए। 15 दिन की इस अवधि के दौरान कैदी पर निगरानी रखने के लिए अदालत ने सुरक्षा शर्तें भी तय की हैं। कैदी को हर तीन दिन में स्थानीय पुलिस थाने जाकर अपनी हाजिरी दर्ज करानी होगी और वह थाना प्रभारी (एसएचओ) की लिखित अनुमति के बिना थाना क्षेत्र की सीमा से बाहर नहीं जा सकेगा।

