सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस अभय ओका ने आगाह किया है कि यदि पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन के लिए तत्काल प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो अगले 20 से 25 वर्षों के भीतर बड़े शहरों में लोगों को अनिवार्य रूप से फेस मास्क पहनना पड़ सकता है। रविवार को ठाणे में एक कार्यक्रम को बतौर मुख्य अतिथि संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि भावी पीढ़ियों के सामने पर्यावरण की रक्षा करना ही सबसे बड़ी चुनौती साबित होगा।
उन्होंने कहा कि पर्यावरण का संरक्षण करना केवल एक विकल्प नहीं है, बल्कि यह प्रत्येक नागरिक का मौलिक संवैधानिक कर्तव्य है ताकि प्रकृति को होने वाले अपूरणीय नुकसान से बचाया जा सके।
प्रकृति पर मालिकाना हक की सोच और बढ़ता प्रदूषण
जस्टिस ओका ने रेखांकित किया कि शासकों और आम नागरिकों—दोनों के बीच यह गंभीर गलतफहमी घर कर चुकी है कि मानव ही इस धरती का स्वामी है। इसी मानसिकता के चलते पर्यावरण के विनाश की एक अंधी दौड़ शुरू हो गई है। सामाजिक और धार्मिक आयोजनों के बहाने अंधाधुंध पेड़ काटे जा रहे हैं, भारी मात्रा में आतिशबाजी की जा रही है, जिससे वायु और ध्वनि प्रदूषण विकराल रूप ले रहा है। इसके साथ ही नदियों, झीलों और समुद्रों को भी प्रदूषित किया जा रहा है।
पूर्व न्यायाधीश ने दो टूक कहा कि इंसान कुदरत का मालिक नहीं है। यदि प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करने में नाकामी जारी रही, तो बिना किसी महामारी के भी अगले दो से ढाई दशकों में महानगरों के भीतर मास्क पहनना अनिवार्य हो जाएगा।
एआई का उपयोग शोध तक सीमित रखें, मौलिक सोच खुद विकसित करें छात्र
कार्यक्रम में शामिल विद्यार्थियों को तकनीकी विकास के संदर्भ में सलाह देते हुए जस्टिस ओका ने कहा कि छात्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग मुख्य रूप से शोध और आंकड़े जुटाने के लिए करें। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि विचार, चिंतन और अभिव्यक्ति का मूल स्वरूप विद्यार्थियों को स्वयं ही विकसित करना चाहिए।
कानूनी शिक्षा में बेटियों का वर्चस्व, युवाओं से लोकतंत्र मजबूत करने का आह्वान
देश के लोकतांत्रिक ढांचे को सुदृढ़ बनाने के लिए जस्टिस ओक ने युवाओं से विधि (कानून) की पढ़ाई करने की अपील की। कानूनी शिक्षा के क्षेत्र में आ रहे सकारात्मक बदलावों का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि देश के 27 नेशनल लॉ यूनिवर्सिटीज (एनएलयू) में होने वाले कुल दाखिलों में 55 से 60 प्रतिशत संख्या छात्राओं की है।
उन्होंने आगे कहा कि छात्राएं न केवल दाखिले में आगे हैं, बल्कि वे मॉक ट्रायल, वाद-विवाद और फैसला-लेखन (जजमेंट-राइटिंग) जैसी प्रतिस्पर्धाओं में भी लगातार बाजी मार रही हैं। इसके साथ ही न्यायपालिका में न्यायाधीशों के पदों पर भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगातार बढ़ रहा है।

