गुजरात हाईकोर्ट ने 35 वर्षीय एक व्यक्ति को हनीट्रैप में फंसाकर उससे 10 लाख रुपये की जबरन वसूली करने और उसे आत्महत्या के लिए विवश करने के मामले में मुख्य आरोपी की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है। अदालत ने कहा कि केवल पुलिस जांच पूरी हो जाना और आरोप पत्र (चार्जशीट) दाखिल हो जाना किसी आरोपी को जमानत पर रिहा करने का स्वतः आधार नहीं बन सकता। मामले की गंभीरता और साक्ष्यों से छेड़छाड़ की प्रबल आशंका को देखते हुए हाईकोर्ट ने संबंधित ट्रायल कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई तेजी से पूरी करने का भी निर्देश दिया है।
मानवीय मूल्यों और ‘जियो और जीने दो’ की भावना पर गहरी चोट
जस्टिस हसमुख डी. सुथार की एकल पीठ ने 23 सितंबर को दिए अपने आदेश में समाज में बढ़ रही आपराधिक प्रवृत्तियों पर गंभीर चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने रेखांकित किया कि समाज में हिंसा, उगाही, हनीट्रैप और शोषण का बढ़ता चलन सभ्य जगत को झकझोर देता है। जब ऐसी घटनाओं का अंत किसी व्यक्ति की असमय मौत के रूप में होता है, तो इससे सहिष्णुता और ‘जियो और जीने दो’ जैसे बुनियादी मानवीय मूल्यों का निरंतर क्षरण होता है। केस डायरी और जांच सामग्री का अवलोकन करने के बाद पीठ ने पाया कि आरोपी ने एक आम नागरिक के खिलाफ पूरी तरह मनमाना आचरण किया और अपराध में उसकी सीधी व सक्रिय संलिप्तता रही है।
शराब पिलाकर आपत्तिजनक वीडियो बनाया और महीनों तक दी मानसिक यातनाएं
मामले का ब्योरा देते हुए मृतक के भाई ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया था कि आरोपी ने एक सोची-समझी साजिश के तहत 35 वर्षीय पीड़ित को जबरन शराब पिलाई और फिर एक महिला के साथ आपत्तिजनक स्थिति में उसका वीडियो रिकॉर्ड कर लिया। इसके बाद उसी वीडियो को सार्वजनिक करने की धमकी देकर उससे 10 लाख रुपये की मोटी रकम ऐंठ ली गई।
शिकायत के अनुसार, आरोपी लगातार पीड़ित को गालियां देते रहे और करीब दो से तीन महीने तक उसे असहनीय शारीरिक व मानसिक यातनाएं दीं। पीड़ित पर इस बात का भी लगातार दबाव बनाया जा रहा था कि वह पुलिस में दी गई अपनी पूर्व शिकायतों को वापस ले ले या समझौता कर ले। इन प्रताड़नाओं से तंग आकर पीड़ित ने अंततः जान दे दी। यद्यपि आत्महत्या के बाद दर्ज कराई गई प्राथमिक सूचना में हनीट्रैप का जिक्र नहीं था, परंतु मृतक के सुसाइड नोट और अस्पताल में दर्ज उसके मृत्यु पूर्व बयान (डाइंग डिक्लेरेशन) में आरोपी की इस पूरी साजिश का सिलसिलेवार ब्योरा सामने आया।
पुलिस कांस्टेबल भाई की संलिप्तता और साक्ष्यों को प्रभावित करने का अंदेशा
अदालत में सरकार का पक्ष रखते हुए असिस्टेंट पब्लिक प्रॉसिक्यूटर श्रुति पाठक ने जमानत याचिका का कड़ा विरोध किया। अभियोजन ने दलील दी कि मामले में संलिप्त सह-आरोपियों में से एक व्यक्ति पुलिस विभाग में बतौर कांस्टेबल तैनात है और वह मुख्य आरोपी का सगा भाई है, जबकि एक अन्य सह-आरोपी को गिरफ्तार कर उसकी शिनाख्त की जा चुकी है। मृतक के परिजनों का भी यह गंभीर आरोप रहा है कि लगातार उत्पीड़न की शिकायतें पहले भी स्थानीय पुलिस को दी गई थीं, लेकिन आरोपी का भाई पुलिसकर्मी होने के कारण कोई ठोस व प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।
अभियोजन पक्ष ने अदालत को अवगत कराया कि जब्त किए गए एक मोबाइल फोन से पांच वीडियो क्लिप बरामद कर विस्तृत वैज्ञानिक जांच के लिए फॉरेंसिक साइंस लेबोरेटरी (एफएसएल) भेजे गए हैं, जिसकी अंतिम रिपोर्ट प्रतीक्षित है। इसके अलावा वीडियो ट्रांसक्रिप्ट से भी स्पष्ट होता है कि मृतक को लंबे समय तक यातनाएं दी गईं। अभियोजन ने आशंका जताई कि यदि आरोपी को जमानत पर रिहा किया जाता है, तो वह अपने संपर्कों के जरिए गवाहों पर दबाव बना सकता है और डिजिटल साक्ष्यों को नुकसान पहुंचा सकता है।
बचाव पक्ष की दलीलें खारिज
आरोपी की ओर से पेश अधिवक्ता लक्ष्मणसिंह एम. झाला ने अदालत में दावा किया कि उनके मुवक्किल को इस मामले में झूठा फंसाया गया है और वह पूरी तरह निर्दोष है। बचाव पक्ष ने तर्क रखा कि प्राथमिकी दर्ज करने में अत्यधिक देरी हुई है और आरोपी का पहले कभी हनीट्रैप जैसे अपराधों से कोई संबंध नहीं रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि चूंकि जांच एजेंसी जांच पूरी कर चुकी है और सक्षम अदालत में चार्जशीट भी पेश की जा चुकी है, इसलिए आरोपी को हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है।
हाईकोर्ट ने बचाव पक्ष के इन सभी तर्कों को नकार दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि मात्र चार्जशीट पेश हो जाने से अपराध की गंभीरता कम नहीं हो जाती। साक्ष्यों की प्रकृति और संभावित दखलंदाजी को देखते हुए अदालत ने आरोपी को किसी भी प्रकार की राहत देने से मना कर दिया।

