सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को निर्देश दिया कि इलाज के सिलसिले में लंबी दूरी तय करने वाले एसिड अटैक पीड़ितों को ट्रेन किराए में छूट देने संबंधी नीति को अंतिम रूप देने में दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग को सक्रिय रूप से शामिल किया जाए।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने केंद्र सरकार को प्रस्तावित मसौदा नीति अदालत के रिकॉर्ड पर रखने के लिए छह सप्ताह की मोहलत दी है। पीठ ने अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे को यह दस्तावेज दाखिल करने का निर्देश देते हुए रेल मंत्रालय से आग्रह किया कि वह पीड़ितों को रियायत देने के मसले पर उदार और मानवीय दृष्टिकोण अपनाए।
नीति निर्धारण में दिव्यांगता विभाग की भागीदारी
सुप्रीम कोर्ट ने यह निर्देश उस समय दिया जब उसे बताया गया कि याचिकाकर्ता एनजीओ ‘अतिजीवन सोसाइटी’ सहित विभिन्न हितधारकों के साथ परामर्श के बाद केंद्र सरकार ने एक ड्राफ्ट पॉलिसी तैयार कर ली है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत ने कहा कि सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय के अधीन आने वाले दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग को भी इस प्रक्रिया से जोड़ा जाना चाहिए, ताकि एक समग्र नीति बनाई जा सके। इससे पहले अदालत ने एसिड अटैक पीड़ितों के लिए विशेष रेल कोटा और रियायती टिकट की मांग वाली जनहित याचिका पर केंद्र को नोटिस जारी किया था। बाद में 16 जुलाई को अदालत ने वातानुकूलित (एसी) डिब्बों में रियायती यात्रा की सुविधा देने पर सरकार से अपना पक्ष स्पष्ट करने को कहा था।
‘मरीज श्रेणी’ के तहत राहत देने का केंद्र का प्रस्ताव
केंद्र सरकार ने 13 अगस्त को पीठ को अवगत कराया था कि वह एसिड अटैक पीड़ितों को यात्रा रियायत देने के लिए नीति तैयार करने पर सैद्धांतिक रूप से सहमत है। सरकार का पक्ष रखते हुए अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे ने कहा कि केंद्र इन पीड़ितों को अलग से दिव्यांग श्रेणी में रखने के बजाय ‘मरीज श्रेणी’ (पेशेंट कैटेगरी) के तहत यह सुविधा देने का विचार कर रहा है।
दवे ने स्पष्ट किया कि एसिड अटैक पीड़ितों को दिव्यांग वर्ग में शामिल करने को लेकर सरकार के कुछ संशय हैं, क्योंकि इस वर्ग की कुछ अन्य श्रेणियों को रेलवे में छूट नहीं मिलती है। उन्होंने पहले अदालत को बताया था कि रेलवे वर्तमान में दिव्यांगों की 21 श्रेणियों को यात्रा रियायत प्रदान कर रहा है और सभी श्रेणियों के लिए एक आपातकालीन यात्रा कोटा निर्धारित करने पर भी विचार कर रहा है।
लंबा इलाज, महंगे एसी टिकट और प्रशासनिक बाधाएं
एनजीओ ‘अतिजीवन सोसाइटी’ द्वारा दायर याचिका में बताया गया है कि एसिड अटैक पीड़ितों को इलाज और पुनर्वास के लिए चार से पांच साल तक लगातार दूरदराज के अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। उन्हें कई दौर की रिकंस्ट्रक्टिव सर्जरी, जटिल नेत्र शल्य चिकित्सा और ऑपरेशन के बाद लंबे उपचार की आवश्यकता होती है। इस स्तर की विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाएं केवल दिल्ली, चेन्नई और हैदराबाद जैसे महानगरों के बड़े तृतीयक अस्पतालों में ही उपलब्ध हैं।
याचिका के अनुसार, जलने के गहरे घावों, निरंतर होने वाली जलन-खुजली और संक्रमण से बचाव के लिए पीड़ितों को वातानुकूलित (एसी) कोच में यात्रा करना अनिवार्य हो जाता है। लेकिन बार-बार यात्रा करने पर एसी टिकट का खर्च उठाना उनके लिए संभव नहीं होता। मौजूदा नियमों के चलते उन्हें न तो रियायती किराया मिलता है और न ही दिव्यांगों के लिए निर्धारित सीट कोटा। इसके अलावा याचिकाकर्ता के वकील ने यह प्रशासनिक समस्या भी उठाई कि जिन पीड़ितों को जबरन तेजाब पिलाया गया था, उन्हें ट्रेन आरक्षण के लिए संबंधित अस्पतालों से मेडिकल प्रमाण पत्र हासिल करने में अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।

