दिल्ली की एक अदालत ने एक मां से उसकी रोती हुई तीन साल की बच्ची के सामने ‘कौन से वाले पापा आ गए’ पूछने वाले शख्स को भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 509 के तहत दोषी करार दिया है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि यह टिप्पणी कोई सामान्य सवाल नहीं थी, बल्कि सीधे तौर पर महिला के चरित्र पर लांछन लगाने, उसके पुरुषों से संबंधों और बच्ची के पितृत्व पर सवाल उठाने वाली थी, जिससे महिला की लज्जा और गरिमा को ठेस पहुंची है।
तीस हजारी कोर्ट की न्यायिक मजिस्ट्रेट मोक्षा बैंस ने 24 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष ने आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों को बिना किसी संदेह के साबित कर दिया है। अदालत अब दोषी की सजा की अवधि तय करने के लिए अलग से सुनवाई करेगी।
अदालत का फैसला और मुख्य कानूनी निष्कर्ष
न्यायिक मजिस्ट्रेट मोक्षा बैंस ने अपने निर्णय में रेखांकित किया कि किसी भी कथन का मूल्यांकन उन परिस्थितियों से अलग रखकर नहीं किया जा सकता जिनमें वे शब्द कहे गए हैं। अदालत ने कहा कि जब यह टिप्पणी अपनी तीन साल की बेटी को चुप करा रही एक महिला को निशाना बनाकर कही गई, तो इसे किसी व्यक्ति की पहचान जानने के लिए पूछा गया सामान्य सवाल नहीं माना जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि इस सवाल का साफ संकेत यह था कि बच्ची के पिता के रूप में कई पुरुष हो सकते हैं। इससे सीधे तौर पर शिकायतकर्ता महिला की निष्ठा और यौन शुचिता पर सवाल खड़ा होता है। अदालत के अनुसार, शब्दों का अर्थ केवल उनके शाब्दिक भाव से नहीं, बल्कि उस विशेष परिस्थिति से तय होता है जिसमें वे कहे गए।
फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी महिला के प्रति किया गया हर अशिष्ट या अपमानजनक व्यवहार स्वतः ही आपराधिक श्रेणी में नहीं आ जाता। किसी कृत्य को अपराध की श्रेणी में लाने के लिए उस अपमान का महिला की लज्जा से सीधा संबंध होना आवश्यक है। अदालत ने पाया कि प्रस्तुत मामले में इस्तेमाल किए गए शब्द केवल अभद्रता या सामान्य ताने तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे महिला की गरिमा और शालीनता की भावना पर गंभीर आघात करने वाले थे।
घटनाक्रम और दर्ज कराई गई प्राथमिकी
यह घटना 23 मार्च 2021 की शाम करीब 4 बजे की है, जब शिकायतकर्ता महिला अपने घर के बाहर की गली से अपनी रोती हुई बेटी को लेकर गुजर रही थी। बच्ची को चुप कराने के लिए मां ने उससे कहा कि देखो पापा आ गए, मत रो। उसी दौरान वहां मौजूद आरोपी ने तुरंत टिप्पणी की, “कौन से वाले पापा आ गए?”
महिला ने उस समय इस टिप्पणी पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। करीब दो मिनट बाद महिला के पति वहां पहुंचे और अपनी बेटी को कार में बैठाकर चले गए। महिला ने उस समय अपने पति को इस घटना की जानकारी नहीं दी। इसके बाद महिला ने अपने ससुर को पूरी बात बताई, जिन्होंने पुलिस को सूचित किया। महिला की लिखित शिकायत पर पुलिस ने मामला दर्ज किया और जांच पूरी कर आईपीसी की धारा 509 के तहत अदालत में आरोप पत्र दाखिल किया। इस धारा के तहत किसी महिला की लज्जा का अनादर करने के इरादे से शब्द कहने, इशारा करने या कृत्य करने पर तीन साल तक की कैद और जुर्माने का प्रावधान है।
गवाही, आरोपी की स्वीकारोक्ति और साक्ष्यों का मूल्यांकन
मुकदमे की सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता महिला ने अदालत में आरोपी की पहचान की और बताया कि उसने बेहद आपत्तिजनक अंदाज में यह बात कही थी। महिला ने यह भी साफ किया कि दोनों परिवारों के बीच पहले से कोई रंजिश या विवाद नहीं था। इसके साथ ही महिला ने बचाव पक्ष के उस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि आरोपी को करीब सात साल से वहां चल रहे उसके कपड़े इस्त्री करने के काम से हटाने के लिए यह झूठा मुकदमा दर्ज कराया गया था। अदालत ने पाया कि लंबी जिरह के बाद भी महिला की गवाही पूरी तरह अडिग और विश्वसनीय रही।
वहीं, आरोपी ने अदालत में यह स्वीकार किया कि उसने ये शब्द कहे थे, लेकिन उसका दावा था कि ऐसा किसी गलत इरादे से नहीं किया गया था। आरोपी ने अपने बचाव में कोई अन्य सबूत पेश नहीं किया। अदालत ने कहा कि आरोपी की स्वीकारोक्ति ने शिकायतकर्ता के बयान को अतिरिक्त मजबूती दी और ऐसी कोई परिस्थिति सामने नहीं आई जिससे इस टिप्पणी का कोई निर्दोष अर्थ निकाला जा सके।
अदालत ने किसी स्वतंत्र सार्वजनिक गवाह के न होने के बिंदु पर भी विचार किया। मजिस्ट्रेट ने स्पष्ट किया कि इससे मामले में कोई उचित संदेह पैदा नहीं होता, क्योंकि पीड़िता स्वयं प्रत्यक्ष गवाह है, उसका बयान पूरी तरह सुसंगत रहा और आरोपी ने भी टिप्पणी करने की बात खुद कबूल की है। अदालत ने आरोपी को दोषी ठहराते हुए सजा पर अगली सुनवाई की तारीख तय की है।

