पर्सनल लॉ और बाल संरक्षण से जुड़े वैधानिक कानूनों के परस्पर संबंधों पर एक अत्यंत महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव नरूला ने स्पष्ट किया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ निकाह किसी बालिग पति को अपनी नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम, 2012 और भारतीय न्याय संहिता, 2023 (बीएनएस) के तहत आपराधिक दायित्व से कोई छूट या संरक्षण नहीं देता है। एफआईआर रद्द करने की मांग वाली रिट याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने निर्णय दिया कि संसद ने शारीरिक संबंध के लिए सहमति की एक समान कानूनी उम्र 18 वर्ष तय की है, जिसके नीचे दी गई सहमति का कानूनन कोई प्रभाव नहीं होता। इस वैधानिक सीमा को पर्सनल लॉ, कथित वैवाहिक वैधता या पारिवारिक सहमति के आधार पर दरकिनार नहीं किया जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
इस मामले में एक युगल का 20 दिसंबर 2024 को निकाह हुआ था। निकाह के समय लड़की (याचिकाकर्ता संख्या 2) की उम्र 16 वर्ष और तीन महीने थी, जिसका जन्म 19 सितंबर 2008 को हुआ था। वहीं, पति (याचिकाकर्ता संख्या 1) का जन्म 1 जनवरी 1997 को हुआ था और उसकी उम्र उस समय लगभग 28 वर्ष थी। निकाह के बाद दोनों साथ रहने लगे और मई 2026 तक वह करीब आठ महीने की गर्भवती हो चुकी थी।
उसकी कम उम्र की जानकारी अधिकारियों को तब मिली जब वह गर्भावस्था से संबंधित इलाज के लिए एक सरकारी अस्पताल पहुंची। अस्पताल प्रशासन ने तुरंत पुलिस को सूचित किया। पुलिस ने उसके स्कूल रिकॉर्ड से जन्मतिथि सत्यापित करने के बाद दरियागंज थाने में बीएनएस की धारा 64(1) और पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत एफआईआर संख्या 189/2026 दर्ज की।
यह मामला पीड़िता की किसी शिकायत के आधार पर दर्ज नहीं किया गया था। पुलिस को दिए गए बयानों, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (बीएनएसएस) की धारा 183 के तहत दर्ज बयान और 5 जून 2026 को अस्पताल के लेबर रूम से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए स्पेशल जज से बातचीत के दौरान, लड़की ने लगातार यही कहा कि उसने याचिकाकर्ता संख्या 1 से अपनी मर्जी और दोनों परिवारों की सहमति से निकाह किया था। उसने किसी भी प्रकार के दबाव या जोर-जबरदस्ती से साफ इनकार किया।
इसी बीच, गर्भ में ही भ्रूण की मृत्यु हो गई और 6 जून 2026 को उसने एक मृत बच्चे को जन्म दिया। इसके बाद सब-डिवीजनल मजिस्ट्रेट ने पितृत्व निर्धारण के लिए डीएनए प्रोफाइलिंग हेतु बीएनएसएस की धारा 196(4) के तहत शव को बाहर निकालने (उत्खनन) का आदेश दिया। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने एफआईआर रद्द करने, जांच करने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने और कथित उत्पीड़न व झूठे मुकदमे के लिए मुआवजे की मांग को लेकर हाईकोर्ट का रुख किया।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से दलील दी गई कि निकाह से पूर्व लड़की ने प्यूबर्टी (यौवन) प्राप्त कर ली थी, इसलिए वह मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत निकाह करने के लिए पूरी तरह सक्षम थी। इसके समर्थन में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरियत) एप्लीकेशन एक्ट, 1937 की धारा 2 और मुल्ला के ‘प्रिंसिपल्स ऑफ मोहम्मडन लॉ’ का हवाला दिया गया, जिसमें प्रमाण के अभाव में 15 वर्ष की आयु पूरी होने पर प्यूबर्टी मान ली जाती है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि जब पर्सनल लॉ के तहत विवाह कानूनी रूप से वैध है, तो उसके बाद बने सहवास और शारीरिक संबंधों को किसी धर्मनिरपेक्ष आपराधिक कानून के तहत अपराध नहीं माना जा सकता।
अपने पक्ष में याचिकाकर्ताओं ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के युनुस खान बनाम हरियाणा राज्य, गुलाम दीन बनाम पंजाब राज्य और जावेद बनाम हरियाणा राज्य के फैसलों के साथ-साथ दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ (फुल बेंच) के कोर्ट ऑन इट्स ओन मोशन (लज्जा देवी) बनाम राज्य के फैसले का सहारा लिया। उन्होंने यह भी कहा कि गुलाम दीन और जावेद के फैसले इसलिए पुख्ता हैं क्योंकि राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) और राष्ट्रीय महिला आयोग (एनसीडब्ल्यू) द्वारा दायर अपीलों को सुप्रीम कोर्ट ने 19 अगस्त 2025 को खारिज कर दिया था। इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 21, 25 और 26 के तहत मौलिक अधिकारों की दुहाई देते हुए इस बात पर जोर दिया गया कि लड़की ने कभी जबरदस्ती का आरोप नहीं लगाया और दोनों परिवारों ने इस रिश्ते को मंजूरी दी थी।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस नरूला ने विवाह की दीवानी (सिविल) हैसियत और शारीरिक संबंध के आपराधिक परिणामों को स्पष्ट रूप से अलग किया। हाईकोर्ट ने कहा कि यदि पर्सनल लॉ के तहत निकाह को वैध भी मान लिया जाए, तब भी पर्सनल लॉ किसी आपराधिक कानून में कोई अपवाद नहीं जोड़ सकता, जब तक कि संसद ने स्वयं ऐसा प्रावधान न किया हो:
“पर्सनल लॉ यह तय कर सकता है कि कोई विवाह हुआ है या नहीं और उसके क्या दीवानी परिणाम होंगे। लेकिन यह किसी आपराधिक कानून में ऐसी छूट प्रदान नहीं कर सकता, जिसका प्रावधान संसद ने नहीं किया है।”
हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि पॉक्सो की धारा 2(1)(d) के तहत 18 वर्ष से कम आयु के किसी भी व्यक्ति को ‘बच्चा’ माना गया है। धारा 3 सहमति की परवाह किए बिना बच्चे के साथ पेनेट्रेटिव सेक्शुअल असॉल्ट को अपराध बनाती है, और धारा 42-ए पॉक्सो को किसी भी अन्य असंगत कानून पर सर्वोपरि (अधिभावी) प्रभाव देती है। इसी तरह, बीएनएस की धारा 63 स्पष्ट करती है कि 18 वर्ष से कम उम्र की महिला के साथ शारीरिक संबंध बनाना सहमति हो या न हो, बलात्कार की श्रेणी में आता है। बीएनएस में वैवाहिक अपवाद केवल वहीं लागू होता है जहां पत्नी की उम्र 18 वर्ष से कम न हो। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“अदालत पॉक्सो और बीएनएस द्वारा निर्धारित 18 वर्ष की आयु सीमा की जगह ‘प्यूबर्टी’ को प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। न ही इस वैधानिक सीमा को इस केस-विशिष्ट मूल्यांकन के आधार पर फिर से तय किया जा सकता है कि 16 वर्ष की किशोरी संबंध को समझने के लिए पर्याप्त परिपक्व थी या नहीं।”
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले इंडिपेंडेंट थॉट बनाम यूनियन ऑफ इंडिया का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने याद दिलाया कि सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी के तहत वैवाहिक बलात्कार के अपवाद को केवल 18 वर्ष या उससे अधिक उम्र की पत्नियों तक सीमित कर दिया था। कोर्ट ने कहा कि विवाह किसी बच्चे को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा को कम नहीं करता:
“विवाह का कोई समारोह किसी बच्चे को सुरक्षा की कमतर श्रेणी में नहीं डाल देता।”
इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट की तीन न्यायाधीशों की पीठ द्वारा सोसायटी फॉर एनलाइटनमेंट एंड वॉलंटरी एक्शन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में दिए गए फैसले का भी संदर्भ दिया गया, जिसमें स्पष्ट किया गया था कि बाल विवाह सीधे तौर पर पॉक्सो के मूल सिद्धांतों पर आघात करता है और अपनी नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने वाला पति पॉक्सो कानून के तहत उत्तरदायी है। नाबालिग की शारीरिक और कानूनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए जस्टिस नरूला ने कहा:
“सरल शब्दों में कहें तो विवाह से किसी बच्चे की उम्र नहीं बढ़ जाती। जो व्यक्ति निकाह से पहले 16 वर्ष का था, वह निकाह के बाद भी 16 वर्ष का ही रहता है। पॉक्सो और बीएनएस की धारा 63 के लिए यही तथ्य शारीरिक संबंध की सहमति की कानूनी क्षमता तय करने में निर्णायक है।”
याचिकाकर्ताओं द्वारा उद्धृत नजीरों का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने पाया:
- युनुस खान, गुलाम दीन और जावेद के मामले बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) या सुरक्षा याचिकाओं से जुड़े थे, जिनमें पॉक्सो के तहत दर्ज मुकदमे को रद्द करने का कोई प्रश्न विचाराधीन नहीं था।
- गुलाम दीन मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा एनसीपीसीआर की चुनौती को खारिज करना केवल याचिकाकर्ता के अधिकार क्षेत्र (लोकस) के अभाव पर आधारित था। सुप्रीम कोर्ट ने न तो हाईकोर्ट के तर्कों को स्वीकार किया था और न ही अनुच्छेद 141 के तहत कोई कानून प्रतिपादित किया था।
- लज्जा देवी का फैसला उस दौर में आया था जब आईपीसी में सहमति की वैधानिक उम्र 16 वर्ष थी और वैवाहिक अपवाद 15 वर्ष से ऊपर लागू होता था; जबकि मौजूदा पॉक्सो और बीएनएस कानूनों में यह सीमा स्पष्ट रूप से बढ़ाकर 18 वर्ष कर दी गई है।
हाईकोर्ट ने अन्य उच्च न्यायालयों के फैसलों का भी उल्लेख किया, जिनमें कर्नाटक हाईकोर्ट का अलीम पाशा बनाम कर्नाटक राज्य, केरल हाईकोर्ट के खालिदुर रहमान बनाम केरल राज्य व अब्दुल कादर बनाम केरल राज्य, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का वाहिद बनाम पंजाब राज्य, इलाहाबाद हाईकोर्ट का रूबी बनाम यूपी राज्य, तथा दिल्ली हाईकोर्ट के मोहम्मद अमान मलिक बनाम राज्य और हामिद रज़ा बनाम राज्य शामिल हैं। इन सभी फैसलों में यह सिद्धांत दोहराया गया है कि बाल संरक्षण से जुड़े विशेष कानून पर्सनल लॉ से ऊपर हैं।
हाईकोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के हालिया फैसले हरमीत सिंह बनाम जीएनसीटीडी से भी वर्तमान मामले में अंतर स्पष्ट किया। हरमीत सिंह मामले में दोनों पक्षों की उम्र लगभग 17 और 22 वर्ष थी, उनका एक आठ महीने का जीवित बच्चा था जिसकी देखभाल जरूरी थी और राज्य सरकार ने भी एफआईआर रद्द करने पर कोई आपत्ति नहीं जताई थी। इसके विपरीत, वर्तमान मामले में उम्र का अंतर बहुत अधिक था (16 वर्ष और 28 वर्ष), कोई जीवित बच्चा नहीं था और याचिकाकर्ताओं ने पर्सनल लॉ के आधार पर कानून से व्यापक आपराधिक छूट की मांग की थी। सुप्रीम कोर्ट द्वारा संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत असाधारण शक्तियों के उपयोग (के. दंडापानी बनाम राज्य और के. किरुबाकरण बनाम तमिलनाडु राज्य) और बाल अपराधों में समझौते के खिलाफ चेतावनी (रामजी लाल बैरवा बनाम राजस्थान राज्य) के साथ-साथ दिल्ली हाईकोर्ट के अन्य मामलों (प्रिंस कुमार शर्मा, प्रसनजीत मंडल और अमन गुप्ता) का भी संज्ञान लिया गया, जिनमें माना गया है कि बाद में हुआ विवाह पहले घटित वैधानिक अपराध को समाप्त नहीं करता।
नाबालिग की सहमति और परिजनों की रजामंदी पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“अदालत को उसकी अपनी परिस्थितियों के विवरण का सम्मान करना चाहिए। लेकिन उसकी वर्तमान इच्छाओं का सम्मान करने और उन इच्छाओं को एक सार्वजनिक आपराधिक कानून को माफ करने की निजी शक्ति मानने में बड़ा अंतर है। पॉक्सो ऐसी कोई शक्ति उस बच्चे, उसके माता-पिता या अदालत को नहीं देता।”
अस्पताल द्वारा दी गई जानकारी को कोर्ट ने पूरी तरह वैध माना और कहा कि पॉक्सो की धारा 19 के तहत नाबालिग के गर्भवती होने या अपराध की जानकारी मिलने पर अस्पताल के लिए पुलिस को रिपोर्ट करना अनिवार्य है, तथा सूचना न देने पर धारा 21 के तहत सजा का प्रावधान है। इसलिए बिना किसी पारिवारिक शिकायत के भी एफआईआर दर्ज करना पूरी तरह विधि सम्मत था।
अंत में, संविधान के अनुच्छेद 21, 25 और 26 तथा शरियत एक्ट की धारा 2 पर आधारित दलीलों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत पसंद और धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार किसी वयस्क को बच्चों की सुरक्षा के लिए बनाए गए सामान्य आपराधिक कानून से कोई छूट नहीं दे सकते।
हाईकोर्ट का निर्णय
यह मानते हुए कि मामले में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध का गठन करते हैं, दिल्ली हाईकोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और एफआईआर संख्या 189/2026 को रद्द करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई करने और याचिकाकर्ताओं को मुआवजा देने की मांग भी खारिज कर दी गई। कोर्ट ने कहा कि मृत बच्चे के जन्म का दुख निस्संदेह गहरा है, लेकिन मानवीय सहानुभूति किसी संज्ञेय अपराध के वैधानिक पंजीकरण को अवैध नहीं ठहरा सकती।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि इस निर्णय में की गई सभी टिप्पणियां केवल याचिका के निस्तारण तक सीमित हैं और इन्हें पति के दोष पर अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाएगा। ट्रायल कोर्ट साक्ष्यों के आधार पर कानून सम्मत तरीके से मामले का फैसला करने के लिए स्वतंत्र है। इसके अलावा, पति को 5 जून 2026 को दी गई नियमित जमानत की शर्तें इस फैसले से अप्रभावित रहेंगी।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: बिलाल एवं अन्य बनाम राज्य (रा.रा.खे. दिल्ली सरकार) एसएचओ एवं अन्य के माध्यम से
वाद संख्या: डब्ल्यूपी (सीआरएल) 2976/2026 एवं सीआरएल.एम.ए. 29702/2026
पीठ: जस्टिस संजीव नरूला
निर्णय की तिथि: 23 सितंबर, 2026

