सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी आरोपी के इकबालिया बयान को आधार बनाकर उसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत निवारक हिरासत में नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने 2024 की संभल हिंसा से जुड़े मामले में मुल्ला अफरोज की हिरासत रद्द कर दी।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने हिरासत आदेश को अवैध मानते हुए उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया।
उत्तर प्रदेश पुलिस ने अक्टूबर 2025 में मुल्ला अफरोज के खिलाफ NSA लगाया था। उस पर नवंबर 2024 में संभल में हुई सांप्रदायिक हिंसा में कथित भूमिका का आरोप था।
सुप्रीम कोर्ट के विस्तृत फैसले की प्रति अभी उपलब्ध नहीं हुई है।
मस्जिद के सर्वे के दौरान हुई थी हिंसा
संभल में तनाव उस समय बढ़ा था जब शाही जामा मस्जिद का कोर्ट के आदेश पर सर्वे कराया जा रहा था। यह सर्वे उस दावे के बाद कराया गया था कि इस स्थान पर पहले हरिहर मंदिर मौजूद था।
24 नवंबर 2024 को सर्वे के दूसरे चरण के दौरान प्रदर्शन कर रहे स्थानीय लोगों और सुरक्षाकर्मियों के बीच झड़प हो गई थी। इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और दर्जनों लोग घायल हुए थे।
NSA में अधिकतम 12 महीने की हिरासत का प्रावधान
राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत केंद्र और राज्य सरकारें किसी व्यक्ति को ऐसे कार्यों से रोकने के लिए हिरासत में ले सकती हैं, जिन्हें भारत की रक्षा के लिए प्रतिकूल माना जाए।
इस कानून के तहत अधिकतम हिरासत अवधि 12 महीने है, हालांकि हिरासत आदेश इससे पहले भी रद्द किया जा सकता है। स्थानीय प्रशासन द्वारा लगाए गए NSA को एक ऐसे बोर्ड की मंजूरी की जरूरत होती है, जिसकी अध्यक्षता किसी पूर्व हाईकोर्ट जज के पास होती है।
NSA के तहत कार्रवाई निवारक हिरासत की होती है, सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी की नहीं। इसलिए हिरासत में लिए गए व्यक्ति को अदालत के सामने पेश करना कानूनी रूप से अनिवार्य नहीं होता।
फैसला सुनाते समय जस्टिस दीपांकर दत्ता ने अपने लॉ क्लर्क को भी श्रद्धांजलि दी, जिनका 27वें जन्मदिन से चार दिन पहले निधन हो गया था।

