पत्नी के नाम खरीदी संपत्ति को बेनामी कानून से छूट तभी, जब पति साबित करे कि भुगतान उसकी ज्ञात आय से हुआ: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी के नाम खरीदी गई संपत्ति को बेनामी लेनदेन की परिभाषा से बाहर रखने वाली कानूनी छूट का लाभ तभी मिल सकता है, जब यह साबित हो कि संपत्ति की कीमत पति ने अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से चुकाई थी। जस्टिस नीना बंसल कृष्णा ने पति की वह अपील खारिज कर दी, जिसमें उसने पत्नी और सास के नाम दर्ज मालवीय नगर की संपत्ति पर वास्तविक मालिक होने का दावा किया था।

कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता के अपने ही दावों से यह स्थापित नहीं होता कि ₹27 लाख की पूरी खरीद राशि उसके अकेले के ज्ञात आय स्रोतों से आई थी। हाईकोर्ट ने यह भी माना कि 2007 की सेल डीड को चुनौती समय-सीमा से बाहर थी और उसी विवाद को लेकर पहले दायर मुकदमा खारिज हो जाने के कारण नया मुकदमा Order IX Rule 9 CPC की रोक से भी प्रभावित था।

मामला क्या था

सूर्य दीप गर्ग उर्फ सूरज गर्ग और नेहा गर्ग की शादी दिसंबर 2001 में हुई थी। पति का कहना था कि उसने समय-समय पर अपने पैसों से कई संपत्तियां खरीदीं, हालांकि उनके दस्तावेज पत्नी के नाम पर बनाए गए थे।

विवाद मालवीय नगर, नई दिल्ली स्थित 90/80-AB, फर्स्ट फ्लोर की संपत्ति को लेकर था। यह संपत्ति अप्रैल 2007 में ₹27 लाख में खरीदी गई थी। रजिस्टर्ड सेल डीड पत्नी नेहा गर्ग और उनकी मां सुनीता गुप्ता के संयुक्त नाम पर थी।

पति का दावा था कि पूरी खरीद राशि उसने दी थी और सास का नाम केवल इसलिए जोड़ा गया था क्योंकि सरकारी कर्मचारी होने के कारण उन्हें कम ब्याज दर पर बैंक ऋण मिल सकता था। उसका कहना था कि बाद में उसने यह ऋण भी चुका दिया था।

इसके बाद पत्नी और सास ने 9 जनवरी 2018 की रजिस्टर्ड सेल डीड के जरिए संपत्ति तीसरे पक्ष को बेच दी। पति ने अदालत में मुकदमा दायर कर 2007 के लेनदेन को बेनामी घोषित करने, 2018 की सेल डीड को अवैध और शून्य घोषित करने, संपत्ति का कब्जा दिलाने और तीसरे पक्ष के अधिकार बनाए जाने पर रोक लगाने की मांग की।

जिला अदालत ने Order VII Rule 11 CPC के तहत plaint खारिज कर दी थी। अदालत ने माना था कि दावा बेनामी कानून, limitation और पूर्व मुकदमे के प्रभाव के कारण सुनवाई योग्य नहीं था। इसके खिलाफ पति दिल्ली हाईकोर्ट पहुंचा।

पति ने क्या दलील दी

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अपीलकर्ता ने कहा कि संपत्ति उसने अपने पैसों से परिवार के उपयोग के लिए खरीदी थी। इसलिए पत्नी के नाम संपत्ति खरीदने से संबंधित वैधानिक अपवाद उसके मामले पर लागू होना चाहिए।

उसकी दलील थी कि पैसे कहां से आए और संपत्ति खरीदने के पीछे वास्तविक मंशा क्या थी, ये तथ्य साक्ष्य के बिना तय नहीं किए जा सकते थे। इसलिए plaint को शुरुआती चरण में Order VII Rule 11 CPC के तहत खारिज नहीं किया जाना चाहिए था।

यह भी कहा गया कि यदि सास के हिस्से को लेकर दावा बेनामी कानून से बाधित माना जाए, तब भी पत्नी के हिस्से से संबंधित दावा जारी रहना चाहिए था।

अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि 2018 में हुई बाद की बिक्री से नया cause of action पैदा हुआ और उसे उस सेल डीड की जानकारी 2022 में मिली थी।

2007 की सेल डीड को चुनौती 16 साल बाद दी गई

हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलकर्ता अपने ही कथन के अनुसार 2007 की सेल डीड से पूरी तरह अवगत था, क्योंकि उसका दावा ही यह था कि संपत्ति खरीदने के लिए रकम उसी ने दी थी।

कोर्ट ने कहा कि 2007 की सेल डीड को सितंबर 2023 में चुनौती दी गई, यानी करीब 16 साल बाद।

कोर्ट ने कहा:

“अपीलकर्ता को 20.04.2007 की सेल डीड के निष्पादन की जानकारी स्वीकार रूप से थी। इसलिए उस सेल डीड को दी गई चुनौती को ऐसा दावा नहीं माना जा सकता जो पहली बार 09.01.2018 की बाद की सेल डीड से पैदा हुआ हो।”

हाईकोर्ट ने इस आधार पर पति की यह दलील स्वीकार नहीं की कि 2018 की बिक्री ने 2007 के मूल लेनदेन को चुनौती देने के लिए नया cause of action पैदा कर दिया था।

पहले मुकदमे के बाद उसी cause of action पर नया केस नहीं

कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता पहले भी 2007 की इसी सेल डीड को लेकर CS(OS) No. 2351/2010 दायर कर चुका था। वह मुकदमा non-prosecution के कारण खारिज हुआ था। बहाली की अर्जी भी खारिज हो गई और आगे की चुनौती भी अंतिम रूप से समाप्त हो गई।

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हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Ganesh Prasad v. Rajeshwar Prasad फैसले का उल्लेख करते हुए कहा कि Order IX Rule 9 CPC उसी cause of action पर नया मुकदमा दायर करने पर रोक लगाता है, जिस पर पहले का मुकदमा अनुपस्थिति के कारण खारिज हो चुका हो।

कोर्ट ने कहा कि 2018 की सेल डीड को चुनौती तभी सफल हो सकती थी, जब पति पहले 2007 की मूल सेल डीड को बेनामी लेनदेन साबित करता।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:

“09.01.2018 की बाद की सेल डीड को दी गई चुनौती, पहली सेल डीड को दी गई चुनौती पर निर्भर है।”

इसलिए कोर्ट ने माना कि नया मुकदमा मूल रूप से उसी cause of action पर आधारित था और Order IX Rule 9 CPC के तहत बाधित था।

₹27 लाख की पूरी रकम पति की अपनी आय से साबित नहीं हुई

बेनामी कानून के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के Manjula & Ors. v. D.A. Srinivas फैसले का उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा कि Prohibition of Benami Property Transactions Act की Section 2(9)(A)(iii) के तहत पत्नी या बच्चे के नाम खरीदी गई संपत्ति बेनामी लेनदेन नहीं मानी जाएगी, यदि उसकी खरीद राशि संबंधित व्यक्ति की ज्ञात आय के स्रोतों से चुकाई गई हो।

लेकिन पति के अपने ही विवरण की जांच करने पर हाईकोर्ट ने पाया कि ₹27 लाख की पूरी राशि उसके अकेले के स्रोतों से नहीं आई थी।

₹7 लाख और ₹3.85 लाख पति-पत्नी के संयुक्त बैंक खातों से दिए गए थे। कोर्ट ने कहा कि संयुक्त खाते में मौजूद रकम पर दोनों खाताधारकों के अधिकार होते हैं और पति अकेले उस रकम को अपनी विशिष्ट आय नहीं बता सकता।

₹5.85 लाख M/s Credit Solutions के खाते से दिए गए थे। पति के अपने कथन के अनुसार यह proprietorship firm पत्नी के नाम पर थी। कोर्ट ने कहा कि पत्नी के नाम पर चल रही फर्म की रकम को बिना किसी उचित आधार के पति की अपनी ज्ञात आय नहीं माना जा सकता।

इसके अलावा ₹10.30 लाख का ऋण सास के नाम पर लिया गया था। पति ने दावा किया कि उसने बाद में यह रकम सास को चुका दी, लेकिन कोर्ट ने पाया कि इस दावे के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी सबूत नहीं थे।

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हाईकोर्ट ने कहा:

“अपीलकर्ता यह स्थापित करने में विफल रहा है कि संपत्ति की खरीद राशि अधिनियम की धारा 2(9)(A)(iii) के अर्थ में उसकी अपनी ज्ञात आय के स्रोतों से चुकाई गई थी।”

इसलिए पत्नी के नाम संपत्ति खरीदने से संबंधित कानूनी अपवाद का लाभ उसे नहीं मिला।

कोर्ट ने आगे कहा कि संपत्ति पत्नी और सास के नाम होने के बावजूद खुद को वास्तविक मालिक बताने का पति का दावा Section 4(1) की रोक के दायरे में आता है, जो बेनामी संपत्ति पर वास्तविक मालिक होने के आधार पर अधिकार लागू कराने वाले मुकदमे को प्रतिबंधित करती है।

केवल पैसे का स्रोत तय नहीं करता कि लेनदेन बेनामी है या नहीं

हाईकोर्ट ने Binapani Paul v. Pratima Ghosh में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया।

कोर्ट ने कहा:

“खरीद राशि का स्रोत प्रासंगिक जरूर है, लेकिन केवल वही यह तय करने के लिए पर्याप्त नहीं है कि लेनदेन बेनामी है या नहीं। पक्षकारों की मंशा आसपास की परिस्थितियों से देखी जानी चाहिए, जिसमें लेनदेन का उद्देश्य, संपत्ति का कब्जा, पक्षकारों के संबंध, टाइटल दस्तावेज किसके पास थे और बाद का आचरण शामिल है।”

अपील खारिज

दिल्ली हाईकोर्ट ने जिला अदालत के फैसले को सही ठहराते हुए कहा कि 2007 की सेल डीड को दी गई चुनौती बेनामी कानून के तहत सुनवाई योग्य नहीं थी।

कोर्ट ने कहा कि जब 2007 की सेल डीड को चुनौती टिक नहीं सकती और संपत्ति पत्नी तथा सास के नाम खरीदी गई थी, तो उन्हें संपत्ति से संबंधित लेनदेन करने का अधिकार था। इस कारण पति 2018 में तीसरे पक्ष के पक्ष में हुई बाद की बिक्री को भी चुनौती नहीं दे सकता।

हाईकोर्ट ने अपील में कोई मेरिट नहीं पाते हुए उसे लंबित आवेदनों के साथ खारिज कर दिया।

केस टाइटल: सूर्य दीप गर्ग उर्फ सूरज गर्ग बनाम श्रीमती नेहा गर्ग एवं अन्य

केस नंबर: RFA 674/2026 एवं CM APPL. 44816/2026, CM APPL. 44817/2026

बेंच: जस्टिस नीना बंसल कृष्णा

तारीख: 24 सितंबर 2026

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