पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने नवंबर 2021 में दो साल की बच्ची की नृशंस हत्या के मामले में दोषी करार दी गई महिला नीलम की मृत्युदंड की सजा को 30 साल के कठोर कारावास में बदल दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि एक मां ने अपनी मासूम बच्ची को खोया है, लेकिन न्याय का उद्देश्य ऐसा भी नहीं होना चाहिए कि दोषी के बच्चे अपनी मां को हमेशा के लिए खो दें। खंडपीठ ने इस बात पर विशेष बल दिया कि दोषी के बच्चों के भविष्य के लिए उम्मीद की एक किरण बची रहनी चाहिए।
जस्टिस विनोद एस भारद्वाज और जस्टिस रविंदर मलिक की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा अप्रैल 2024 में सुनाई गई फांसी की सजा के खिलाफ दायर अपील पर यह फैसला सुनाया। पीठ ने दोषी महिला पर 30 साल की बिना किसी छूट वाली जेल की सजा के साथ 50,000 रुपये का जुर्माना भी लगाया। भारत में मृत्युदंड का सामना कर रहीं 21 अन्य महिलाओं के साथ नीलम के मामले पर ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ ने पहले भी विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित की थी।
सुधार और प्रायश्चित का अवसर
हाईकोर्ट ने अपने 23 सितंबर के आदेश में टिप्पणी की कि समाज बच्चों से वह छीनकर नहीं खड़ा किया जा सकता जो उनकी मां ने छीना था, बल्कि बच्चों के जीवन में नई आशा जगाने से समाज का निर्माण होता है। पीठ ने कहा कि भले ही यह अपराध अत्यंत वीभत्स है, लेकिन फांसी की सजा ही एकमात्र उचित विकल्प नहीं हो सकती।
अदालत का मानना था कि दोषी महिला के भी छोटे-छोटे बच्चे हैं और उसका पूर्व में कोई ऐसा विघटनकारी या हिंसक आचरण नहीं रहा है जिससे यह निष्कर्ष निकाला जाए कि उसमें सुधार की कोई संभावना नहीं बची है या वह समाज के लिए स्थायी खतरा है। जेल रिकॉर्ड से भी यह तथ्य सामने आया कि कारावास के दौरान अन्य कैदियों के साथ उसके संबंध सौहार्दपूर्ण रहे और उसने जेल नियमों का पूरी तरह पालन किया।
सजा के दार्शनिक पहलू पर विचार करते हुए अदालत ने रेखांकित किया कि मृत्युदंड किसी सजा का आरंभ है या उसका अंत। पीठ के अनुसार, ऐसी सजा जो दोषी को प्रतिदिन अपने अपराध पर आत्ममंथन और पश्चाताप करने का समय दे, वही वास्तविक सजा है। बीता हुआ कल हर नई सुबह व्यक्ति को अपने किए गए गुनाह का प्रायश्चित करने और समाज में किसी सार्थक योगदान के प्रयास की याद दिलाता है।
रंजिश और ईर्ष्या से उपजा अपराध
यह दर्दनाक घटना 28 नवंबर 2021 को घटी थी। शिकायत के अनुसार, पीड़िता की दादी बच्ची को घर के बाहर गली में खिला रही थीं। इसी दौरान वह लगभग पांच मिनट के लिए घर के भीतर पानी पीने गईं। जब वह बाहर लौटीं, तो बच्ची वहां मौजूद नहीं थी।
परिजनों द्वारा की गई तलाश के दौरान पड़ोस में रहने वाली नीलम पर संदेह गहराया। शिकायत में बताया गया कि मृतका के पिता पंजाब पुलिस में सेवारत हैं और उन्होंने पड़ोस में नीलम के कथित आचरण को देखते हुए अपनी पत्नी को उससे बातचीत करने से रोक दिया था। इसी बात को लेकर नीलम परिवार से रंजिश रखने लगी थी। जांच के दौरान एक स्थानीय व्यक्ति ने पुलिस को सूचना दी कि नीलम ने उसके सामने बच्ची को गड्ढे में दबाने की बात स्वीकार की है, जिसके तुरंत बाद पुलिस ने उसे हिरासत में ले लिया।
पूछताछ में नीलम ने कबूल किया कि मृतका के दादा एक फैक्ट्री में काम करते थे और पिता पुलिस विभाग में थे, जिससे वे अपने बच्चों के लिए अच्छी चीजें खरीद पाते थे। इसे देखकर उसके अपने बच्चे भी वैसी ही चीजों की मांग करते थे, जिन्हें पूरा करने में वह आर्थिक तंगी के कारण असमर्थ थी। इसी कुंठा और ईर्ष्या में उसने घटना वाले दिन बच्ची को अपनी स्कूटी पर बैठाया, एक खाली प्लॉट में ले गई और गड्ढे में जिंदा दफना दिया। उसने जांच में यह भी स्पष्ट किया कि इस कृत्य में उसके साथ कोई अन्य व्यक्ति शामिल नहीं था।
अदालत में पेश की गईं कानूनी दलीलें
ट्रायल कोर्ट ने नीलम को 12 अप्रैल 2024 को हत्या का दोषी ठहराया था और 18 अप्रैल 2024 को मृत्युदंड की सजा सुनाई थी। इसके बाद नीलम ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट में नीलम के वरिष्ठ अधिवक्ता ए. डी. एस. सुखीजा ने तर्क दिया कि अपराध व्यक्तिगत रंजिश के चलते हुआ था, लेकिन याचिकाकर्ता में किसी प्रकार की न्यूरोटिक या साइकोटिक बीमारी, मानसिक विकृति, भ्रम या हिंसक व्यक्तित्व के लक्षण नहीं पाए गए हैं जो उसे समाज के लिए अपूरणीय खतरा साबित करें। बचाव पक्ष ने दलील दी कि महिला अत्यंत गरीब और सामाजिक रूप से वंचित पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखती है, तथा बच्चों की मांगों को पूरा न कर पाने का आर्थिक व मानसिक दबाव इस मामले में एक महत्वपूर्ण राहतकारी परिस्थिति (मिटिगेटिंग सरकमस्टेंस) है।
वहीं दूसरी ओर, शिकायतकर्ता के अधिवक्ता अतुल गोयल ने अपील का विरोध करते हुए कहा कि दो साल की निर्दोष बच्ची को रेत के गड्ढे में जिंदा दफनाना अमानवीय क्रूरता और संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है, इसलिए इसमें किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जानी चाहिए।
हाईकोर्ट ने अभियोजन पक्ष के साक्ष्यों और परिस्थितियों की पूरी कड़ी को पुख्ता मानते हुए नीलम की दोषसिद्धि को तो बरकरार रखा, लेकिन उसके पारिवारिक दायित्वों, सुधरने की संभावना और जेल में उसके अनुशासित व्यवहार को ध्यान में रखते हुए फांसी की सजा को 30 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया।

