मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत वैध मानी जाने वाली शादी भी नाबालिग पत्नी के साथ शारीरिक संबंध बनाने पर पॉक्सो (POCSO) और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कानूनी कार्रवाई से पति को नहीं बचा सकती। दिल्ली हाईकोर्ट ने 28 वर्षीय एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामले को रद्द करने से इनकार करते हुए यह स्पष्ट किया है। हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चों को यौन अपराधों से बचाने के लिए संसद द्वारा बनाए गए वैधानिक प्रावधान पर्सनल लॉ पर प्राथमिकता रखते हैं।
पॉक्सो कानून के मूल उद्देश्य को निष्प्रभावी नहीं कर सकता पर्सनल लॉ
जस्टिस संजीव नरूला ने 23 सितंबर को दिए अपने आदेश में कहा कि अगर पर्सनल लॉ के तहत हुए विवाह को आपराधिक मामलों में कानूनी ढाल के रूप में स्वीकार कर लिया जाए, तो इससे पॉक्सो कानून की पूरी व्यवस्था कमजोर पड़ जाएगी। अदालत ने टिप्पणी की कि यदि सिर्फ शादी का प्रमाण पेश करके कोई वयस्क पुरुष 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ शारीरिक संबंध के मामले में कानूनी कार्रवाई से बच निकलता है, तो कानून का पूरा उद्देश्य ही निरर्थक हो जाएगा। ऐसा होने पर वैधानिक संरक्षण पीड़िता की उम्र पर नहीं, बल्कि इस बात पर निर्भर करने लगेगा कि शारीरिक संबंधों का पता चलने से पहले शादी हुई थी या नहीं।
शादी से किसी की वास्तविक उम्र नहीं बदल जाती: अदालत
हाईकोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि संसद ने पॉक्सो कानून के तहत नाबालिगों के लिए वैवाहिक छूट (मैरिटल एक्सेप्शन) को जानबूझकर बाहर रखा है। अदालत ने कहा कि केवल इस आधार पर एफआईआर रद्द नहीं की जा सकती कि दोनों पक्ष खुद को विवाहित बता रहे हैं और नाबालिग लड़की अपने पति का समर्थन कर रही है। अदालत के अनुसार, ऐसा करना न्यायपालिका द्वारा खुद एक ऐसा अपवाद गढ़ने जैसा होगा, जिसे विधायिका ने कानून बनाते समय स्पष्ट रूप से खारिज कर दिया था।
जस्टिस नरूला ने कहा कि निकाह की रस्म से किसी व्यक्ति की वास्तविक आयु नहीं बदल जाती। जो लड़की विवाह से पहले 16 वर्ष की थी, वह रस्म के बाद भी 16 वर्ष की ही रहती है। व्यक्तिगत कानून उस वैधानिक आदेश को कमजोर नहीं कर सकता जो नाबालिगों को यौन कृत्यों से बचाने के लिए बनाया गया है।
अस्पताल पहुंचने पर हुआ था नाबालिग होने का खुलासा
यह कानूनी मामला तब शुरू हुआ जब 28 वर्षीय युवक ने 16 साल और तीन महीने की एक किशोरी से शादी की। दोनों साथ रहने लगे और इसी दौरान लड़की गर्भवती हो गई। गर्भावस्था के दौरान जब वह चिकित्सकीय देखरेख के लिए एक सरकारी अस्पताल पहुंची, तब उसके नाबालिग होने की बात सामने आई। अस्पताल प्रशासन ने इसकी जानकारी पुलिस को दी, जिसके बाद युवक के खिलाफ पॉक्सो एक्ट के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई। अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, लड़की ने जून के महीने में एक मृत बच्चे को जन्म दिया।
नाबालिग की सहमति भी अपराध को खत्म नहीं कर सकती
आपराधिक कार्यवाही को चुनौती देते हुए युवक और लड़की ने हाईकोर्ट में संयुक्त याचिका दायर की थी। याचिका में तर्क दिया गया था कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार प्यूबर्टी (यौवन) प्राप्त करने के बाद लड़की शादी के योग्य हो जाती है, इसलिए वैध निकाह के बाद बने शारीरिक संबंध को आपराधिक कृत्य नहीं ठहराया जा सकता।
सुनवाई के दौरान लड़की ने अदालत में कहा कि यह विवाह दोनों परिवारों की पूरी रजामंदी से हुआ था और इसमें कोई दबाव या जोर-जबरदस्ती नहीं थी। उसने पहले भी अपने पति की जमानत याचिका का समर्थन किया था और गर्भावस्था के दौरान उसके साथ रहने की इच्छा जताई थी। उसने हाईकोर्ट के समक्ष भी दोहराया कि वह खुद को किसी अपराध की पीड़िता नहीं मानती।
लड़की के पक्ष पर विचार करते हुए जस्टिस नरूला ने कहा कि उसके बयान को गंभीरता और गरिमा के साथ सुना जाना चाहिए, और यह भी माना जा सकता है कि यह रिश्ता स्वेच्छा से बना था। इसके बावजूद, अदालत ने स्पष्ट किया कि 18 वर्ष से कम उम्र में दी गई सहमति या निकाह की दलील इस मामले को पॉक्सो और बीएनएस के दायरे से बाहर नहीं ले जा सकती।

