दिल्ली हाईकोर्ट ने टेरिटोरियल आर्मी में अधिकारियों की भर्ती प्रक्रिया के दौरान पुरुषों के मुकाबले महिला उम्मीदवारों के लिए केवल एक सीट निर्धारित किए जाने के खिलाफ दायर याचिका पर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को नोटिस जारी किया और विस्तृत जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया। यह याचिका कुश कालरा द्वारा दायर की गई है।
सीटों के असमान आवंटन पर उठे सवाल
याचिका में आरोप लगाया गया है कि भर्ती प्राधिकारी साल 2022 से 2026 तक के प्रत्येक भर्ती चक्र में पुरुष अभ्यर्थियों के लिए 12 से 18 पद आरक्षित कर रहे हैं, जबकि महिला अभ्यर्थियों के लिए केवल एक ही पद रखा जा रहा है।
याचिकाकर्ता ने इस व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने का अनुरोध करते हुए कहा कि पुरुषों के लिए भारी संख्या में पद रखना और महिलाओं को मात्र एक सीट तक सीमित करना भेदभावपूर्ण है। याचिका के अनुसार, केवल एक पद देना महज औपचारिकता (टोकनिज्म) है, जो उस संवैधानिक विसंगति को जारी रखता है जिसे अदालत ने खत्म करने का प्रयास किया था।
2018 के ऐतिहासिक फैसले का दिया हवाला
याचिका में कहा गया कि वर्तमान भर्ती नीति हाईकोर्ट के वर्ष 2018 के उस ऐतिहासिक फैसले के प्रभाव को कम करने की कोशिश है, जिसमें महिलाओं को टेरिटोरियल आर्मी में शामिल होने की अनुमति दी गई थी और केवल पुरुषों की भर्ती के पुराने नियम को असंवैधानिक करार दिया गया था।
याचिका के अनुसार, उस निर्णय में अदालत ने स्पष्ट किया था कि टेरिटोरियल आर्मी एक्ट, 1948 की धारा 6 के तहत प्रयुक्त ‘कोई भी व्यक्ति’ (एनी पर्सन) शब्द में महिला और पुरुष दोनों शामिल हैं।
याचिकाकर्ता ने कहा कि केवल प्रवेश की अनुमति देना एक अधूरा कदम रहा, क्योंकि स्पष्ट कानूनी स्थिति के बावजूद भर्ती प्राधिकारी लगातार महिलाओं के लिए केवल एक सीट तय कर रहे हैं। याचिका में हाईकोर्ट के 2018 के फैसले को पूरी तरह और प्रभावी ढंग से लागू करने का निर्देश देने की मांग की गई है।

