सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत उत्तराधिकार और संपत्ति बंटवारे से जुड़े गैर-संहिताबद्ध (अनकोडिफाइड) नियमों की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करने पर सहमति जताई। अदालत ने उस जनहित याचिका पर केंद्र सरकार को औपचारिक नोटिस जारी किया, जिसमें महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले आधा हिस्सा दिए जाने के प्रावधान को लैंगिक भेदभाव बताते हुए चुनौती दी गई है।
चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की तीन सदस्यीय पीठ ने इम्तियाज हुसैन शहाबुद्दीन मुल्ला की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय तथा युवा मामले एवं खेल मंत्रालय से जवाब तलब किया। याचिका में मुस्लिम महिलाओं को पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में पुरुषों के बराबर उत्तराधिकार दिए जाने को लेकर स्पष्ट और आधिकारिक दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है।
संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन की दलील
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील एम. सिंह और अनिल सी. निशानी ने पीठ के समक्ष दलील दी कि बिना वसीयत छोड़ी गई संपत्ति (इंटेस्टेट सक्सेशन) के मौजूदा नियम महिला वारिसों के साथ संस्थागत भेदभाव को बढ़ावा देते हैं। उन्होंने अदालत को बताया कि केवल लिंग के आधार पर महिलाओं को पैतृक व पारिवारिक संपत्ति में पुरुषों के मुकाबले आधा हिस्सा देना संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), अनुच्छेद 15 (भेदभाव का निषेध) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) के तहत मिले मौलिक अधिकारों का सीधा उल्लंघन है।
शायरा बानो बनाम भारत संघ के ऐतिहासिक फैसले का हवाला देते हुए अधिवक्ता निशानी ने कहा कि जब पर्सनल लॉ के प्रावधान स्पष्ट मनमानेपन (मैनिफेस्ट आर्बिट्रेरीनेस) को बढ़ावा देते हैं, तो उन्हें न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह छूट नहीं मिल सकती। याचिका में शीर्ष अदालत से यह घोषणा करने का आग्रह किया गया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ का ऐसा कोई भी नियम, व्याख्या या प्रथा जो सिर्फ लिंग के आधार पर संपत्ति के अधिकारों में गैर-बराबरी पैदा करती है, वह असंवैधानिक और निष्प्रभावी मानी जाए।
1937 के शरीयत कानून और कानूनी मान्यता पर सवाल
याचिका में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लिकेशन एक्ट, 1937 के वैधानिक ढांचे को मुख्य रूप से कटघरे में खड़ा किया गया है। कानून की धारा 2 के तहत यह निर्धारित है कि किसी भी विपरीत प्रथा या परंपरा के बावजूद, जब पक्षकार मुस्लिम हों तो उत्तराधिकार के मामलों में फैसले का आधार मुस्लिम पर्सनल लॉ ही होगा।
याचिका में कहा गया कि 1937 का कानून उत्तराधिकार के मामलों में मुस्लिम पर्सनल लॉ के इस्तेमाल को वैधानिक मान्यता और न्यायिक प्रवर्तन (ज्यूडिशियल एनफोर्समेंट) तो देता है, लेकिन उत्तराधिकार के मूल नियमों को संहिताबद्ध नहीं करता। ऐसे में यह गंभीर संवैधानिक सवाल उठता है कि क्या नागरिकों के अहम नागरिक और संपत्ति अधिकारों को तय करने वाले वे नियम, जो लिंग के आधार पर असमान परिणाम देते हैं, संविधान के भाग-तीन में दिए गए बुनियादी अधिकारों के खिलाफ जाकर वैधानिक समर्थन प्राप्त करना जारी रख सकते हैं।
हिंदू उत्तराधिकार कानून के सुधारों से तुलना
याचिकाकर्ता ने अन्य पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं को मिले कानूनी संरक्षण की तुलना करते हुए बताया कि मुस्लिम कानून में हिंदू उत्तराधिकार कानून के ‘सहदायिकी’ (कोपार्सनरी) जैसा कोई प्रावधान मौजूद नहीं है, जहां बेटियों को जन्म से ही पैतृक संपत्ति में अधिकार मिल जाता है।
हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम में 2005 में किए गए ऐतिहासिक संशोधन का उल्लेख करते हुए याचिका में कहा गया कि उस सुधार के जरिए बेटियों को संयुक्त हिंदू परिवार की संपत्ति में समान कोपार्सनरी अधिकार दिए गए थे। याचिका के अनुसार, मुस्लिम कानून में इस तरह के विधायी सुधारों के अभाव ने संपत्ति अधिकारों में खाई को और गहरा किया है। इसलिए शीर्ष अदालत को हस्तक्षेप करते हुए यह स्पष्ट करना चाहिए कि मुस्लिम महिलाएं भी संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप पैतृक और पारिवारिक संपत्ति में पूर्ण बराबरी की हकदार हैं।

