मुख्य चुनाव आयुक्त कानून को संविधान पीठ को भेजने के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट में विभाजित फैसला; मामला सीजेआई के समक्ष भेजा गया

मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं को अनुच्छेद 145(3) के तहत पांच जजों की संविधान पीठ को भेजा जाए या नहीं, इस कानूनी प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने विभाजित निर्णय दिया है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की पीठ में इस मुद्दे पर मतभेद रहा। जस्टिस दत्ता ने माना कि इस मामले में केवल स्थापित कानूनी सिद्धांतों को लागू करने की आवश्यकता है, इसलिए इसे संविधान पीठ को भेजने की जरूरत नहीं है। वहीं दूसरी ओर, जस्टिस शर्मा ने माना कि इस कानून की वैधता को चुनौती संविधान की व्याख्या से जुड़े ऐसे महत्वपूर्ण कानूनी सवाल खड़े करती है जिसका पहले कभी निपटारा नहीं हुआ है, इसलिए इसकी सुनवाई पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा ही की जानी चाहिए। मतभिन्नता के बाद दोनों जजों ने मामला संविधान पीठ के गठन पर विचार करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के समक्ष रखने का निर्देश दिया। इसके साथ ही दोनों जजों ने संवैधानिक मामलों के निपटारे में होने वाली अत्यधिक देरी को दूर करने के लिए सीजेआई से एक स्थायी पांच सदस्यीय संविधान पीठ गठित करने की संभावना तलाशने का भी संयुक्त रूप से अनुरोध किया।

यह मामला डॉ. जया ठाकुर, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज (पीयूसीएल) जैसी संस्थाओं व नागरिकों द्वारा संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दायर याचिकाओं से संबंधित है। इन याचिकाओं में 2023 के अधिनियम की धारा 6, 7 और 8(2) को संविधान के अनुच्छेद 324 के साथ पढ़े जाने वाले अनुच्छेद 14 का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी गई है। कानून की धारा 7 के तहत, मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) और चुनाव आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा तीन सदस्यीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है। इस समिति में प्रधानमंत्री (अध्यक्ष), लोकसभा में विपक्ष के नेता (या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता), और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल होते हैं।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील विजय हंसारिया, संजय पारिख, गोपाल शंकरनारायणन, शादान फरासत और वकील प्रशांत भूषण, कलीश्वरम राज तथा एस.एन. शुक्ला ने दलील दी कि 2023 का यह अधिनियम चुनाव आयोग की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका के वर्चस्व को दोबारा स्थापित करता है। उन्होंने तर्क दिया कि अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ पहले ही यह स्पष्ट निर्णय दे चुकी है कि चुनाव आयोग को कार्यपालिका के अनन्य नियंत्रण से मुक्त होना चाहिए। इसलिए वर्तमान विवाद में केवल पहले से तय सिद्धांतों को लागू किया जाना है, न कि अनुच्छेद 145(3) के तहत नए सिरे से संविधान की व्याख्या करनी है। स्टेट ऑफ जेएंडके बनाम ठाकुर गंगा सिंह, पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज बनाम भारत संघ, अब्दुल रहीम इस्माइल सी. रहीमटोला बनाम स्टेट ऑफ बॉम्बे, और श्रीमंत बालासाहेब पाटिल बनाम कर्नाटक विधानसभा जैसे मामलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि केवल किसी कानून के नए होने या संवैधानिक प्रावधानों के उल्लेख मात्र से मामला संविधान पीठ को भेजने का आधार नहीं बनता। याचिकाकर्ताओं ने मद्रास बार एसोसिएशन बनाम भारत संघ का उल्लेख करते हुए यह भी आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने अपने जवाबी हलफनामे में यह मांग नहीं उठाई थी और मौखिक बहस के दौरान अंतिम समय में यह अर्जी केवल मामले को लटकाने और अनूप बरनवाल के फैसले को कमजोर करने के उद्देश्य से दी गई है।

दूसरी तरफ, केंद्र सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि यह मामला अनुच्छेद 145(3) और सुप्रीम कोर्ट रूल्स, 2013 के ऑर्डर 38 नियम 1 के तहत संविधान की व्याख्या से जुड़ा एक गंभीर प्रश्न है। अटॉर्नी जनरल ने तर्क दिया कि अनूप बरनवाल का फैसला अनुच्छेद 324(2) के तहत संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक विधायी शून्यता को भरने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत एक अंतरिम व्यवस्था मात्र थी। जैसे ही संसद ने 2023 का कानून बनाकर उस क्षेत्र को भर दिया, अदालत के अंतरिम निर्देश स्वतः निष्प्रभावी हो गए। उन्होंने कहा कि समिति में कार्यपालिका के बहुमत मात्र से दुर्भावना या पक्षपात का अनुमान नहीं लगाया जा सकता, क्योंकि उच्च संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों से निष्पक्ष कार्य करने की उपधारणा की जाती है (सीपीआईएल बनाम भारत संघ)। सॉलिसिटर जनरल ने प्रधानमंत्री के पद में जनता के संवैधानिक विश्वास को दर्शाने के लिए मनोज नरूला बनाम भारत संघ का हवाला दिया। उन्होंने यह भी तर्क रखा कि यदि न्यायपालिका की स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कॉलेजियम प्रणाली में बाहरी व्यक्तियों के प्रवेश को वर्जित रखा गया है, तो शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत के तहत कार्यपालिका और विधायिका की संस्थागत स्वायत्तता का भी सम्मान होना चाहिए।

जस्टिस दीपांकर दत्ता का विश्लेषण

केंद्र सरकार की संविधान पीठ को भेजने की मांग को खारिज करते हुए जस्टिस दीपांकर दत्ता ने माना कि इस विवाद का फैसला करने के लिए स्थापित संवैधानिक सिद्धांत पहले से मौजूद हैं। अनूप बरनवाल के फैसले का विश्लेषण करते हुए उन्होंने कहा कि यद्यपि चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाना अनुच्छेद 142 के तहत एक अस्थायी व्यवस्था थी जो संसद द्वारा कानून बनाते ही समाप्त हो गई, लेकिन उस फैसले का मूल संवैधानिक सिद्धांत आज भी पूरी तरह लागू है:

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“अनूप बरनवाल (पूर्व उल्लिखित) को पढ़ने से यह स्पष्ट होता है कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए चुनाव आयोग की स्वतंत्रता का अनिवार्य होना तथा नियुक्ति प्रक्रिया का पूर्णतः कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त होना, सभी अदालतों के लिए बाध्यकारी है और स्पष्ट शब्दों में यह रेखांकित करता है कि संवैधानिक अदालतों द्वारा अनुच्छेद 324(2) की व्याख्या किस प्रकार की जानी है।”

ठाकुर गंगा सिंह, पीयूसीएल, और अब्दुल रहीम इस्माइल सी. रहीमटोला के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए जस्टिस दत्ता ने कहा कि किसी नए कानून पर स्थापित संवैधानिक सिद्धांतों को लागू करने मात्र से वह मामला संविधान की व्याख्या से जुड़ा गंभीर प्रश्न नहीं बन जाता।

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कानून की धारा 7 के तहत बनाई गई चयन समिति की संरचना पर प्रथम दृष्टया टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 75(3) के तहत सामूहिक उत्तरदायित्व के सिद्धांत के कारण प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री से अपने नेता से अलग राय रखने की उम्मीद नहीं की जा सकती:

“ऐसी स्थिति में, चयन समिति में किसी कैबिनेट मंत्री को शामिल करना वह निष्पक्ष संतुलन प्रदान करने में विफल रहता है जो एक तटस्थ चयनकर्ता दे सकता था और वह (कैबिनेट मंत्री) केवल अपने नेता की आवाज़ को दोहराएगा; परिणामस्वरूप, चयन समिति में विपक्ष के नेता की उपस्थिति काफी हद तक औपचारिक रह जाती है, जिससे उन्हें शामिल करने का उद्देश्य सिद्ध नहीं होता।”

जस्टिस दत्ता ने सॉलिसिटर जनरल द्वारा 2023 के कानून की चयन समिति की तुलना न्यायिक कॉलेजियम प्रणाली से किए जाने पर भी कड़ी असहमति व्यक्त की:

“‘जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं’ यह बहुप्रचारित जुमला एक मिथक है, जिसे निहित स्वार्थों द्वारा प्रेरित बयानों के जरिए लोगों के बीच परोसा गया है, जो अक्सर जजों की नियुक्ति के संबंध में इस शताब्दी में लिए गए कुछ विवादास्पद निर्णयों से खुराक पाता है। यह व्यापक सामान्यीकरण कि कॉलेजियम अपनी मनमर्जी से काम करता है, संविधान के तहत परिकल्पित विस्तृत परामर्श प्रक्रिया, केंद्र और राज्यों दोनों स्तरों पर कार्यपालिका के साथ-साथ खुफिया व अन्य एजेंसियों द्वारा साख की जांच सहित नियुक्ति प्रक्रिया में निभाई जाने वाली आंतरिक भूमिका, और इस तथ्य की अनदेखी करता है कि प्रत्येक नियुक्ति पर राष्ट्रपति की अंतिम मुहर होती है।”

उन्होंने रेखांकित किया कि कार्यपालिका कॉलेजियम के प्रस्तावों को चुनिंदा तरीके से लागू करके, सिफारिशों को रोककर और बार-बार दोहराई गई सिफारिशों को वर्षों तक दबाकर निर्णायक नियंत्रण रखती है। इसलिए, कॉलेजियम की तुलना कार्यपालिका के बहुमत वाली चयन समिति से करने के तर्क को उन्होंने “काफी भ्रामक, टालमटोल भरा और असहज करने वाला” करार दिया।

जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की असहमति

इसके विपरीत, जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल की दलीलों को स्वीकार करते हुए माना कि इन याचिकाओं की सुनवाई कम से कम पांच जजों की संविधान पीठ द्वारा ही की जानी चाहिए।

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जस्टिस शर्मा ने रेखांकित किया कि 2023 का अधिनियम अनूप बरनवाल के बाद संसद द्वारा बनाया गया एक नया कानून है और इसकी संवैधानिक वैधता का परीक्षण पहले कभी नहीं हुआ है:

“इस न्यायालय का ऐसा कोई प्रामाणिक निर्णय आज तक नहीं है जो उक्त अधिनियम की संवैधानिक वैधता पर फैसला देता हो। जब यह न्यायालय उक्त अधिनियम की धारा 7 और इसके अन्य प्रावधानों की वैधता के मुद्दे पर विचार कर रहा है, तो उसे संविधान के प्रावधानों के आलोक में न्यायिक निर्णय देना होगा। इन रिट याचिकाओं पर होने वाला निर्णय अपनी तरह का पहला निर्णय होगा और इसलिए यह और भी आवश्यक हो जाता है कि संदर्भ (रेफरेंस) दिया जाए।”

जस्टिस शर्मा ने स्पष्ट किया कि सॉलिसिटर जनरल द्वारा एनजेएसी केस (2016) का दिया गया हवाला शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत और कार्यपालिका की स्वतंत्रता को रेखांकित करने के लिए था, न कि कॉलेजियम प्रणाली की आलोचना के रूप में। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि क्या संसद चयन समिति से किसी तटस्थ व्यक्ति को बाहर रखने के लिए उचित थी, यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और अनसुलझा संवैधानिक प्रश्न है, इसलिए अनुच्छेद 145(3) के तहत इसे संविधान पीठ के पास भेजा जाना अनिवार्य है।

संयुक्त आदेश और स्थायी संविधान पीठ के गठन का आह्वान

अपने संयुक्त आदेश में दोनों जजों ने राय में विभाजन को दर्ज किया। तीन जजों की पीठ के पास भेजकर मामले को और अधिक लंबा खींचने से बचने के लिए, उन्होंने पत्रावली को सीधे भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखने का निर्देश दिया ताकि वे इस पर संविधान पीठ गठित करने पर विचार कर सकें।

अदालत ने इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि अनूप बरनवाल मामले को तय होने में आठ वर्ष लग गए, जबकि स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश बनाम जय बीर सिंह में संदर्भ दो दशकों से अधिक समय तक लंबित रहा:

“निस्संदेह, यह गंभीर चिंता का विषय है और संदर्भों (रेफरेंस) के निपटारे में अत्यधिक देरी अपने आप में एक संस्थागत शर्मिंदगी का स्रोत है जिससे सभी हितधारकों को बचने का प्रयास करना चाहिए। वास्तव में आत्ममंथन की आवश्यकता है।”

पीठ ने मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया कि वे विशुद्ध संवैधानिक प्रश्नों के त्वरित निपटारे के लिए एक स्थायी पांच सदस्यीय संविधान पीठ के गठन की संभावना पर विचार करें।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: डॉ. जया ठाकुर एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य (तथा संबंधित मामले)

वाद संख्या: रिट याचिका (सिविल) संख्या 14/2024 

पीठ: जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा 

निर्णय की तिथि: 23 सितंबर 2026

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