दिल्ली हाईकोर्ट ने साल 2002 में एक दिहाड़ी मजदूर पर धारदार हथियार से हमला करने के मामले में दोषी की सजा पांच साल से घटाकर तीन साल कर दी है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चमड़ा काटने वाले औजार से किया गया यह हमला कानूनी तौर पर हत्या के प्रयास के दायरे में नहीं आता। इसके साथ ही अदालत ने मामले को खतरनाक हथियार से जानबूझकर चोट पहुंचाने के अपराध में तब्दील कर दिया। इस फैसले के दौरान अदालत ने देश में शारीरिक श्रम करने वाले मजदूरों की बदहाली और उपेक्षा पर भी गंभीर टिप्पणियां कीं।
18 सितंबर को फैसला सुनाते हुए जस्टिस विमल कुमार यादव ने कहा कि दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करने वाले मजदूरों को अगले दिन के काम के लिए रात में सुकून और गहरी नींद की सख्त जरूरत होती है। अदालत ने इसे बेहद चिंताजनक बताते हुए रेखांकित किया कि हमारे देश में शारीरिक श्रम करने वाले इस वर्ग को सबसे कम मेहनताना मिलता है, सबसे कम परवाह की जाती है और समाज उनके प्रति सबसे ज्यादा उदासीन रहता है। जबकि पश्चिमी देशों में शारीरिक श्रम का सम्मान किया जाता है और इसके लिए उचित पारिश्रमिक दिया जाता है।
जानलेवा हमले का इरादा साबित नहीं
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि हत्या के प्रयास (आईपीसी की धारा 307) का मामला तय करने के लिए यह देखना अनिवार्य है कि आरोपी की मंशा या जानकारी वास्तव में जान लेने की थी या नहीं। अदालत ने कहा कि किसी की मंशा सीधे तौर पर दिखाई नहीं देती, बल्कि घटना के हालात, हथियार की प्रकृति, हमला करने का तरीका, वार की संख्या और शरीर के किस हिस्से पर वार किया गया, इन तथ्यों से इसका आकलन किया जाता है।
अदालत ने पाया कि आरोपी और पीड़ित के बीच पहले से कोई जान-पहचान या रंजिश नहीं थी। यद्यपि हमले में प्रयुक्त औजार खतरनाक था और उससे जान भी जा सकती थी, लेकिन आरोपी ने उससे घोंपने के बजाय खड़ा (वर्टिकल) वार किया था। इसके अलावा मेडिकल रिपोर्ट में चोट को भले ही गंभीर बताया गया हो, लेकिन कानूनी परिभाषा के तहत यह साधारण चोट की श्रेणी में आती है। इसलिए हत्या के इरादे का अभाव पाते हुए हाईकोर्ट ने धारा में बदलाव कर सजा को पांच साल से घटाकर तीन साल कर दिया।
नींद में खलल पड़ने पर हुआ था विवाद
यह पूरा मामला मार्च 2002 का है। चांदनी चौक स्थित लाजपत राय मार्केट की एक दुकान पर काम करने वाला दिहाड़ी मजदूर रात को दुकान के बरामदे में सोने की तैयारी कर रहा था। उसी दौरान आरोपी और उसके कुछ साथियों द्वारा किए जा रहे शोर-शराबे और हुड़दंग से मजदूर की नींद में खलल पड़ा। जब उसने उन्हें शोर बंद करने को कहा, तो विवाद बढ़ गया।
कहासुनी के दौरान आरोपी ने मजदूर को धक्का दिया और मोचियों द्वारा चमड़ा काटने में इस्तेमाल होने वाली धारदार रापी से उस पर वार कर दिया। इस वार से पीड़ित के गाल से लेकर गर्दन तक गहरा घाव हो गया। गश्त कर रहे एक पुलिस कांस्टेबल ने आरोपी को मौके पर ही पकड़ लिया, जबकि घायल मजदूर को तुरंत ट्रॉमा सेंटर ले जाया गया जहां उसकी सर्जरी हुई।
निचली अदालत का फैसला और अपील
पुलिस ने आरोपी के खिलाफ हत्या के प्रयास की धारा में आरोप-पत्र दाखिल किया था। सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष ने 17 गवाहों के बयान दर्ज कराए। तीस हजारी स्थित निचली अदालत ने 2 दिसंबर 2004 को आरोपी को दोषी करार देते हुए पांच साल के सश्रम कारावास और 1,000 रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
दोषी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए दलील दी थी कि यह हमला अचानक उपजे विवाद का नतीजा था, जिसमें केवल एक ही वार किया गया था और उसका इरादा किसी की जान लेने का कतई नहीं था। हाईकोर्ट ने इन सभी परिस्थितियों और कानूनी तथ्यों पर विचार करने के बाद याचिकाकर्ता की सजा में राहत प्रदान की।

