उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में निर्देश दिया है कि आपराधिक कार्यवाही रद्द होने के बाद ई-कोर्ट्स पोर्टल पर किसी व्यक्ति का नाम सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित नहीं रखा जा सकता। कोर्ट ने न्यायिक प्राधिकारियों को आदेश दिया कि संबंधित सॉफ्टवेयर पेशेवर का वास्तविक नाम हटाकर उसकी जगह ‘एबीसी’ (ABC) या ‘एक्सवाईजेड’ (XYZ) जैसे तटस्थ छद्म नाम दर्ज किए जाएं। अदालत ने स्पष्ट किया कि जब किसी मामले में कोई वैध जनहित शेष न हो, तब न्यायिक रिकॉर्ड को ऑनलाइन किसी व्यक्ति की पहचान से जोड़े रखना उसकी निजता, सम्मान और प्रतिष्ठा को अनुचित नुकसान पहुंचाता है।
यह आदेश जस्टिस आलोक महरा की एकलपीठ ने एक तकनीकी पेशेवर की याचिका को स्वीकार करते हुए पारित किया। याचिकाकर्ता ने उधम सिंह नगर जिले से जुड़े एक आपराधिक मामले के रिकॉर्ड से अपना नाम हटाने या छिपाने (मास्क करने) की गुहार लगाई थी।
डिजिटल निजता और आनुपातिकता का संवैधानिक आधार
बीती 17 सितंबर को फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक डिजिटल रिकॉर्ड से पहचान छिपाने (मास्किंग) की मांग का आधार संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मिलने वाले सूचनात्मक निजता के अधिकार में निहित है। अदालत ने रेखांकित किया कि यह अधिकार ठीक उसी संवैधानिक बुनियाद से निकलता है, जिस पर सर्च इंजनों से रिकॉर्ड हटाने यानी ‘डी-इंडेक्सिंग’ का अधिकार टिका है।
अदालत ने कहा कि इंटरनेट पर किसी व्यक्ति के नाम को अदालती रिकॉर्ड से हमेशा जोड़े रखने का मूल्यांकन करते समय ‘भूल जाने के अधिकार’ (राइट टू बी फॉरगॉटन) से जुड़ा आनुपातिकता का सिद्धांत पूरी तरह लागू होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी आपराधिक मामले में दोनों पक्षों के बीच समझौता (कंपाउंडिंग) हो चुका हो और शिकायतकर्ता की सहमति से कार्यवाही समाप्त कर दी गई हो, तो उस व्यक्ति के नाम को सार्वजनिक अदालती रिकॉर्ड से जोड़े रखने का कोई वैध आधार नहीं बचता।
पहचान मास्किंग का दायरा और डी-इंडेक्सिंग से अंतर
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ऑनलाइन न्यायिक रिकॉर्ड को ‘मास्क’ करने की पूरी प्रक्रिया की व्याख्या की। अदालत ने कहा कि मास्किंग का तात्पर्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड में किसी व्यक्ति के नाम, पते और अन्य पहचान योग्य व्यक्तिगत विवरणों को किसी तटस्थ संदर्भ से बदलना है। अदालत ने साफ किया कि इसका अर्थ फैसले को मिटाना या केस का रिकॉर्ड नष्ट करना बिल्कुल नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि फैसले के कानूनी तर्क, निष्कर्ष, केस नंबर, अदालत का विवरण और तारीख जैसी सभी महत्वपूर्ण जानकारियां सार्वजनिक रूप से पहले की तरह उपलब्ध रहेंगी। मास्किंग का एकमात्र उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी व्यक्ति का नाम इंटरनेट पर केवल नाम टाइप करके रिकॉर्ड खोजने का जरिया न बने। वहीं, मामले का मूल और असंशोधित रिकॉर्ड कोर्ट के आंतरिक अभिलेखागार में सुरक्षित रहेगा, जिसे अदालतें, पक्षकार, वकील और जांच एजेंसियां वैध न्यायिक प्रक्रियाओं के माध्यम से देख सकेंगी।
मास्किंग और डी-इंडेक्सिंग में अंतर स्पष्ट करते हुए कोर्ट ने कहा कि डी-इंडेक्सिंग के तहत किसी निजी इंटरनेट सर्च प्लेटफॉर्म को निर्देश दिया जाता है, जबकि मास्किंग में खुद कोर्ट रजिस्ट्री को अपने सार्वजनिक रिकॉर्ड में संशोधन करना पड़ता है। रजिस्ट्री द्वारा रिकॉर्ड में बदलाव किए जाने के कारण अदालत ने हिदायत दी कि ऐसे मामलों पर बेहद सावधानीपूर्वक विचार किया जाना चाहिए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि मास्किंग का यह नियम मौजूदा ऑनलाइन रिकॉर्ड के साथ-साथ भविष्य में होने वाले डिजिटाइजेशन पर भी लागू रहेगा।
उधम सिंह नगर के मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा विवाद उधम सिंह नगर जिले से शुरू हुआ था। याचिकाकर्ता सॉफ्टवेयर पेशेवर के खिलाफ वर्ष 2023 में एक पुलिस थाने में एफआईआर दर्ज की गई थी। पुलिस जांच पूरी होने के बाद अदालत में चार्जशीट पेश की गई और स्थानीय अदालत ने मामले पर संज्ञान ले लिया। इसके बाद दोनों पक्षों के बीच विवाद सुलझ गया और उन्होंने अदालत में सुलह-समझौते (कंपाउंडिंग) का प्रार्थना पत्र दिया।
आपसी समझौते के आधार पर उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 6 जून 2024 को उस आपराधिक मामले की पूरी कार्यवाही को निरस्त कर दिया था। इसके बावजूद, उधम सिंह नगर की अदालत के ई-कोर्ट्स पोर्टल पर याचिकाकर्ता का नाम लगातार आरोपी के तौर पर दर्ज दिखाई दे रहा था। अपना नाम डिजिटल रिकॉर्ड से हटवाने के लिए उसने दोबारा हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिका को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट ने अपनी रजिस्ट्री, कंप्यूटर अनुभाग और उधम सिंह नगर की जिला अदालत को निर्देश दिया कि ई-कोर्ट्स वेबसाइट से याचिकाकर्ता का असली नाम तत्काल हटाकर उसकी जगह ‘ABC’ या ‘XYZ’ दर्ज किया जाए।

