राजस्थान हाईकोर्ट ने तिजारा नगर पालिका अध्यक्ष पद के चुनाव को स्थगित करने की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि एक बार चुनावी प्रक्रिया शुरू हो जाने के बाद उसमें न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जाना चाहिए। इसके साथ ही अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि नवनिर्वाचित पार्षदों को अपनी मर्जी से मतदान करने का वैधानिक अधिकार है, जिसे किसी भी मनमानी या राजनीतिक दखल से छीना नहीं जा सकता।
जस्टिस अनूप कुमार ढंड की एकलपीठ ने यह आदेश 21 सितंबर को राजकीय अवकाश के दिन बैठी विशेष अदालत में दिया। राजस्थान में इस दिन रामदेव जयंती, तेजा दशमी और खेजड़ली शहीद दिवस का सार्वजनिक अवकाश था।
पार्षदों को बंधक बनाने के आरोप और याचिकाकर्ता की मांगें
यह याचिका तिजारा के वार्ड संख्या 33 के निर्वाचित पार्षद और पालिका अध्यक्ष पद के उम्मीदवार राम अवतार सैनी की ओर से दायर की गई थी। चुनाव 21 सितंबर को सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक होना तय था।
सैनी ने आरोप लगाया कि दो प्रतिवादियों के कहने पर पुलिस ने उनके समर्थक पार्षदों को अवैध रूप से हिरासत में ले लिया है, ताकि वे अध्यक्ष पद के मतदान में भाग न ले सकें। याचिकाकर्ता ने एक पार्षद का वीडियो मिलने का हवाला दिया, जिसमें उसने खुद के और अन्य पार्षदों के बंधक होने की बात कही थी। सैनी ने अदालत को बताया कि इस संबंध में तिजारा के उपखंड अधिकारी (एसडीओ) को भी शिकायत दी गई थी, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई।
याचिका में मांग की गई थी कि जब तक बंधक बनाए गए पार्षदों को मुक्त नहीं कराया जाता, तब तक चुनाव स्थगित किया जाए। इसके अलावा सैनी और उनके समर्थक पार्षदों को मतदान केंद्र तक आने-जाने के लिए पुलिस सुरक्षा देने, राज्य चुनाव आयोग को निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित कराने का निर्देश देने, प्राथमिकी दर्ज करने, स्वतंत्र पर्यवेक्षक नियुक्त करने और पूरी चुनाव प्रक्रिया की वीडियोग्राफी कराकर रिकॉर्ड सुरक्षित रखने की राहत भी मांगी गई थी।
राज्य सरकार का पक्ष और आयोग की जांच
राज्य सरकार ने इन आरोपों का विरोध किया और हाईकोर्ट को बताया कि पार्षदों को हिरासत में रखने में पुलिस की कोई भूमिका नहीं है। महाधिवक्ता ने दलील दी कि याचिकाकर्ता के पास राज्य चुनाव आयोग के समक्ष जाने का विकल्प मौजूद है। अदालत को यह भी अवगत कराया गया कि रिटर्निंग ऑफिसर के पास शिकायत पहले ही पहुंच चुकी थी, जिसे राज्य चुनाव आयोग को भेज दिया गया था।
सरकार की ओर से बताया गया कि राज्य चुनाव आयोग ने भिवाड़ी के अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट (एडीएम) को मामले की जांच सौंपी है और उन्हें 21 सितंबर को दोपहर 1:30 बजे तक तथ्यात्मक रिपोर्ट देने का निर्देश दिया गया है।
इसके अलावा राज्य सरकार ने कहा कि पार्षद के जिस वीडियो का हवाला दिया गया है, उसमें पार्षदों को हरियाणा के पंचकूला में रखे जाने का आरोप सामने आया है। यदि कथित हिरासत वहां की है, तो याचिकाकर्ता को बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका लेकर पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का रुख करना चाहिए।
चुनाव प्रक्रिया में अदालती दखल से इनकार
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में यह निष्कर्ष दर्ज नहीं किया कि पार्षदों को अवैध रूप से हिरासत में रखा गया था। चुनाव टालने की मांग पर विचार करते हुए जस्टिस ढंड ने सुप्रीम कोर्ट के उन सिद्धांतों का उल्लेख किया, जिनके अनुसार चुनाव प्रक्रिया शुरू होने के बाद अदालतों को उसमें बीच में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। निर्धारित व्यवस्था के मुताबिक चुनाव तय समय पर होने चाहिए और विवादों को उचित कानूनी प्रक्रिया के जरिए ही उठाया जाना चाहिए। इन आधारों पर हाईकोर्ट ने चुनाव टालने से इनकार कर दिया।
वहीं, नवनिर्वाचित पार्षदों के अधिकारों पर टिप्पणी करते हुए अदालत ने कहा कि कोई भी प्राधिकरण निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपनी स्वतंत्र इच्छा से मतदान करने के कानूनी अधिकार से वंचित नहीं कर सकता, क्योंकि यह लोकतंत्र का बुनियादी आधार है। अदालत ने कहा कि राजनीतिक हस्तक्षेप या प्रशासनिक मर्जी के आधार पर किसी व्यक्ति से मताधिकार नहीं छीना जा सकता और चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बनना प्रत्येक निर्वाचित सदस्य का अटूट अधिकार है।
अदालत ने कहा कि राज्य चुनाव आयोग पहले ही एडीएम भिवाड़ी के माध्यम से जांच के आदेश दे चुका है, लिहाजा चुनाव प्रक्रिया में दखल देने का कोई कारण नहीं है। आयोग जांच रिपोर्ट पर विचार करने के बाद कानून के अनुसार उचित कदम उठाने के लिए स्वतंत्र है।
नागरिक अधिकारों की सुरक्षा के लिए छुट्टियों में भी काम करने को बाध्य हैं अदालतें
छुट्टी के दिन विशेष सुनवाई करने के संदर्भ में जस्टिस ढंड ने कहा कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के मामले में अदालतों को अवकाश के दिन काम करने से नहीं रोका जा सकता, क्योंकि न्याय के मंदिर के दरवाजे कभी बंद नहीं होते।
अदालत ने कहा कि जब परिस्थितियां मांग करें, तो नागरिकों के मौलिक और वैधानिक अधिकारों की रक्षा के लिए अदालतें रविवार और सार्वजनिक अवकाश के दिनों में भी काम करने के लिए अधिकार संपन्न ही नहीं, बल्कि कर्तव्यबद्ध हैं।
जस्टिस ढंड ने कहा कि जब किसी नागरिक की स्वतंत्रता, जीवन और अधिकारों का सवाल हो, तो न्याय की व्यवस्था को छुट्टियों की अवधारणा में नहीं बांधा जा सकता। अदालतें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव सजग प्रहरी की भूमिका में हैं और जब कोई नागरिक अपनी शिकायत के निवारण के लिए आता है, तो अदालतें अपनी आंखें या दरवाजे बंद नहीं कर सकतीं।

