सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि किसी आरोपी की गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 22(1) या 22(2) के उल्लंघन के कारण अवैध पाई जाती है और उसे रिहा कर दिया जाता है, तो जांच एजेंसी अपनी मर्जी से उसे दोबारा गिरफ्तार नहीं कर सकती। ऐसी दोबारा गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट की न्यायिक मंजूरी जरूरी होगी। जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें जांच एजेंसी को कानून का पालन करते हुए आरोपी को फिर से गिरफ्तार करने की छूट दी गई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन पर रिहा व्यक्ति को दोबारा हिरासत में लेने के लिए जांच एजेंसी को संबंधित मजिस्ट्रेट के सामने आवेदन देना होगा। एजेंसी को यह बताना होगा कि हिरासत क्यों जरूरी है, गिरफ्तारी के समय लिखित आधार क्यों नहीं दिए गए और बाद में उन आधारों की प्रति आरोपी को दी गई या नहीं। ऐसे आवेदन पर संबंधित अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी भी आवश्यक होगी।
कोर्ट ने कहा कि यही प्रक्रिया अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के मामलों में भी लागू होगी, जहां गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं किया गया हो। संविधान का अनुच्छेद 22(2) यात्रा में लगे जरूरी समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर पेशी अनिवार्य करता है।
क्या था मामला
मामला पंजाब के एसएएस नगर जिले के मटौर पुलिस स्टेशन में 13 मई 2026 को दर्ज एफआईआर से जुड़ा था। एफआईआर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 65(1) और 351 के साथ पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत दर्ज की गई थी।
आरोपी जसकरण जीत सिंह देओल को 17 मई 2026 की सुबह करीब 7:54 बजे गिरफ्तार किया गया और अगले दिन दोपहर करीब 12 बजे मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
ड्यूटी मजिस्ट्रेट ने पाया कि गिरफ्तारी के समय आरोपी को लिखित रूप में गिरफ्तारी के आधार नहीं दिए गए थे। सुप्रीम कोर्ट के मिहिर राजेश शाह मामले के फैसले का हवाला देते हुए मजिस्ट्रेट ने गिरफ्तारी को अवैध माना और आरोपी को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया।
हालांकि, मजिस्ट्रेट ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच एजेंसी कानून और संवैधानिक आवश्यकताओं का पालन करते हुए हिरासत या रिमांड के लिए दोबारा आवेदन कर सकती है।
उसी दिन जांच एजेंसी ने आरोपी की हिरासत के लिए एक और आवेदन किया। बाद में एडिशनल चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने 22 मई को यह आवेदन खारिज कर दिया। अदालत ने पाया कि तब तक भी आरोपी को गिरफ्तारी के आधार उपलब्ध नहीं कराए गए थे।
इसके बाद आरोपी पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट पहुंचा और मांग की कि पुलिस को उसे दोबारा गिरफ्तार करने, गिरफ्तारी वारंट लेने या उसकी हिरासत मांगने से रोका जाए।
हाईकोर्ट ने 29 मई 2026 को याचिका खारिज करते हुए कहा कि पहली गिरफ्तारी भले ही अवैध घोषित हुई हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आरोपी को भविष्य की गिरफ्तारी से पूरी सुरक्षा मिल गई। हाईकोर्ट ने कहा था कि जांच एजेंसी कानून के अनुसार आरोपी को दोबारा गिरफ्तार कर सकती है।
आरोपी ने बताया दो संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन
अपीलकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ अग्रवाल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि पुलिस ने संविधान के अनुच्छेद 22 के दोनों महत्वपूर्ण सुरक्षा उपायों का उल्लंघन किया।
उनका कहना था कि न तो आरोपी को गिरफ्तारी के लिखित आधार दिए गए और न ही उसे गिरफ्तारी के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
अपीलकर्ता ने दलील दी कि जिस पुलिस तंत्र की कार्रवाई के कारण आरोपी के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ, उसी एजेंसी को बिना किसी न्यायिक निगरानी के दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति देना संवैधानिक सुरक्षा को कमजोर कर देगा।
दलीलों के समर्थन में खत्री बनाम बिहार राज्य, मनोज बनाम मध्य प्रदेश राज्य, प्रवर्तन निदेशालय बनाम सुभाष शर्मा, भीम सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य, पंकज बंसल बनाम भारत संघ, प्रबीर पुरकायस्थ बनाम राज्य (एनसीटी दिल्ली), विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और मिहिर राजेश शाह सहित कई फैसलों का उल्लेख किया गया।
पंजाब सरकार ने कहा, अवैध गिरफ्तारी से हमेशा के लिए सुरक्षा नहीं मिल सकती
पंजाब सरकार की ओर से एडिशनल एडवोकेट जनरल रजत भारद्वाज ने तर्क दिया कि पहली गिरफ्तारी में संवैधानिक या प्रक्रियात्मक चूक होने से आरोपी को भविष्य की किसी भी गिरफ्तारी से स्थायी छूट नहीं मिल सकती।
राज्य ने कहा कि अवैध गिरफ्तारी के कारण रिहाई होने से न तो अपराध की जांच समाप्त होती है और न ही जांच एजेंसी की वैधानिक शक्तियां खत्म हो जाती हैं।
राज्य ने सुप्रीम कोर्ट को यह भी बताया कि गिरफ्तारी में हुई चूक को लेकर संबंधित पुलिस अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू की गई थी। जांच अधिकारी एएसआई गुरतेज सिंह को निलंबित किया गया, जबकि तत्कालीन एसएचओ इंस्पेक्टर रुपिंदर सिंह को पद से हटाकर पुलिस लाइंस भेज दिया गया। बाद में जांच इंस्पेक्टर अमनदीप सिंह को सौंप दी गई।
डी फैक्टो शिकायतकर्ता की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायण ने भी आरोपी को दोबारा गिरफ्तारी से पूरी सुरक्षा देने का विरोध किया।
गिरफ्तारी के आधार बताना केवल औपचारिकता नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 22(1) पर विस्तार से विचार करते हुए कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार बताना कोई साधारण प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़ा मौलिक संवैधानिक अधिकार है।
कोर्ट ने पंकज बंसल, प्रबीर पुरकायस्थ, विहान कुमार और मिहिर राजेश शाह मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि गिरफ्तारी के आधार व्यक्ति को सार्थक तरीके से बताए जाने चाहिए और मिहिर राजेश शाह के अनुसार उन्हें उस भाषा में लिखित रूप से उपलब्ध कराया जाना चाहिए जिसे गिरफ्तार व्यक्ति समझता हो।
कोर्ट ने कहा:
“जब संविधान का उल्लंघन होता है, तब पूर्वाग्रह या प्रत्यक्ष पूर्वाग्रह साबित करने का सवाल नहीं उठता।”
पीठ ने आगे कहा:
“अनुच्छेद 22(1) में दिए गए सुरक्षा उपाय केवल प्रक्रियात्मक सुरक्षा नहीं हैं। ये ऐसे मौलिक सिद्धांत हैं जिनका पालन तब अनिवार्य है जब किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित किया जा रहा हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के कारण रिहाई को जमानत पर रिहाई के समान नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने कहा:
“जब किसी आरोपी को अनुच्छेद 22(1) के तहत उसके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के कारण रिहा किया जाता है, तो उसे जमानत पर नहीं छोड़ा जाता। उसे अवैध और असंवैधानिक हिरासत से मुक्त किया जाता है।”
दोबारा गिरफ्तारी के लिए न्यायिक मंजूरी जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि गिरफ्तारी के आधार न देने के कारण किसी व्यक्ति को रिहा किया गया है और जांच एजेंसी उसकी दोबारा गिरफ्तारी चाहती है, तो उसे सीधे गिरफ्तारी करने की बजाय पहले मजिस्ट्रेट के पास जाना होगा।
एजेंसी को आरोपी को लिखित आधार उपलब्ध कराने होंगे और मजिस्ट्रेट को बताना होगा कि पहली बार वे आधार क्यों नहीं दिए गए। इसके साथ यह भी स्पष्ट करना होगा कि आरोपी की दोबारा गिरफ्तारी या हिरासत जांच के लिए क्यों जरूरी है।
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“एक बार अनुच्छेद 22(1) का उल्लंघन हो जाने पर आरोपी को दोबारा गिरफ्तार करने की शक्ति उसी प्राधिकारी के विवेक पर नहीं छोड़ी जा सकती जिसने संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन किया था। ऐसी गिरफ्तारी पर न्यायिक मुहर आवश्यक है।”
कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट दोबारा गिरफ्तारी की अनुमति तभी दे सकता है जब वह इस बात से संतुष्ट हो कि प्रारंभिक स्तर पर गिरफ्तारी के आधार न देने के वास्तविक कारण थे, बाद में वे आधार आरोपी को उपलब्ध करा दिए गए और जांच के लिए उसकी हिरासत वास्तव में आवश्यक है।
सुप्रीम कोर्ट ने एक अतिरिक्त सुरक्षा उपाय भी जोड़ा। कोर्ट ने कहा कि ऐसे आवेदन पर जांच अधिकारी के तत्काल वरिष्ठ अधिकारी की मंजूरी ली जाएगी। साथ ही मामले की जांच किसी दूसरे अधिकारी को दी जाएगी और पहली गिरफ्तारी में हुई संवैधानिक चूक को लेकर विभागीय जांच शुरू की जाएगी।
24 घंटे के नियम का उल्लंघन भी गंभीर संवैधानिक चूक
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 22(2) पर कहा कि गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के लिए आवश्यक समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर निकटतम मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जाना संविधान का स्पष्ट आदेश है।
कोर्ट ने खत्री, मनोज और प्रवर्तन निदेशालय बनाम सुभाष शर्मा मामलों का उल्लेख करते हुए कहा कि इस समयसीमा का कठोरता से पालन होना चाहिए।
पीठ ने कहा:
“हम तब से बहुत आगे आ चुके हैं, लेकिन यह संवैधानिक आदेश आज भी दृढ़ और अडिग है, मानो पत्थर पर अंकित हो।”
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के कारण किसी व्यक्ति को रिहा किया जाता है और जांच एजेंसी उसे फिर गिरफ्तार करना चाहती है, तो वही न्यायिक प्रक्रिया अपनानी होगी जो अनुच्छेद 22(1) के उल्लंघन वाले मामलों के लिए निर्धारित की गई है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि मामले की परिस्थितियों के आधार पर हाईकोर्ट अनुच्छेद 22(2) के उल्लंघन के लिए सार्वजनिक कानून के तहत मुआवजा देने का आदेश भी दे सकता है। इससे पीड़ित व्यक्ति को निजी कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपनाने से नहीं रोका जाएगा।
अपराध की गंभीरता से संवैधानिक सुरक्षा खत्म नहीं होती
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि आरोपी पर लगे आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, संवैधानिक अधिकारों का पालन अनिवार्य है।
पीठ ने कहा:
“संविधान या किसी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन स्वीकार नहीं किया जा सकता। ऐसे उल्लंघन से सख्ती से निपटना होगा। यह अपराध की प्रकृति या उसकी गंभीरता पर निर्भर नहीं करता और सभी अपराधों पर समान रूप से लागू होता है।”
कोर्ट ने कहा कि किसी गंभीर अपराध का आरोप अपने आप में व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े संवैधानिक सुरक्षा उपायों की अनदेखी करने का आधार नहीं बन सकता।
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट का 29 मई 2026 का आदेश रद्द कर दिया। मजिस्ट्रेट के 18 मई के आदेश में की गई संबंधित टिप्पणियों को भी निरस्त कर दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि यदि जांच एजेंसी आरोपी की कस्टोडियल इंटेरोगेशन आवश्यक मानती है, तो उसे मिहिर राजेश शाह मामले में तय प्रक्रिया के साथ इस फैसले में निर्धारित अतिरिक्त संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन करना होगा।
पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने आरोपी के खिलाफ लगाए गए आरोपों की मेरिट पर कोई राय व्यक्त नहीं की है।
सुप्रीम कोर्ट ने फैसले की एक प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस महानिदेशकों, सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य न्यायिक अकादमियों के निदेशकों को भेजने का निर्देश दिया।
केस का शीर्षक: जसकरण जीत सिंह देओल बनाम पंजाब राज्य
केस नंबर: आपराधिक अपील संख्या 4234/2026, विशेष अनुमति याचिका (आपराधिक) संख्या 11103/2026 से उत्पन्न
पीठ: जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
तारीख: 21 सितंबर 2026

