देशभर की अदालतों पर मुकदमों के भारी बोझ को कम करने के लिए ट्रायल कोर्ट्स में एक विशेष अभियान चलाकर गैर-गंभीर आपराधिक मामलों में एकमुश्त राहत दी जानी चाहिए। यह बात सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने शुक्रवार को नई दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कही।
‘एथिक्स इन क्रिमिनल लिटिगेशन — ड्यूटीज ऑफ डिफेंस एंड द प्रॉसिक्यूशन’ विषय पर बोलते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि मामूली बातों और आहत भावनाओं के आधार पर दर्ज होने वाले बेबुनियाद मुकदमों की वजह से न्यायिक व्यवस्था चरमरा रही है। उन्होंने राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 17 सितंबर तक देश की विभिन्न अदालतों में 4.27 करोड़ से अधिक आपराधिक मामले लंबित थे, जिनमें से 95 प्रतिशत मामले अकेले ट्रायल कोर्ट्स में हैं। उन्होंने रेखांकित किया कि पहले से ही भारी दबाव झेल रही निचली अदालतों पर ऐसे बेतुके मामलों का थोपा जाना स्थिति को और असहनीय बना रहा है।
अदालतों का समय और संसाधन गंभीर मामलों पर केंद्रित हो सके, इसके लिए उन्होंने प्रस्ताव रखा कि सेशन कोर्ट के दायरे से बाहर वाले और गैर-गंभीर मामलों में व्यापक स्तर पर एकमुश्त माफी दी जा सकती है। इसके साथ ही ट्रायल कोर्ट्स को ऐसे निरर्थक मुकदमों के निपटारे के लिए विशेष अभियान चलाना चाहिए।
बेतुके मामलों की बढ़ती संख्या पर चिंता
जस्टिस भुइयां ने सामान्य गतिविधियों पर आपराधिक धाराएं लगाए जाने के बढ़ते चलन पर गहरी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि आज किसी खास तरह का खाना खाने, कविताएं सुनाने, दूसरों की जमानत के समर्थन में नारे लगाने, प्रदर्शनों में हिस्सा लेने, सोशल मीडिया पर टिप्पणी करने, स्टैंड-अप कॉमेडी करने और यहां तक कि फिल्मों व किताबों के नाम या सामग्री को लेकर भी लोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि बात-बात पर लोगों की भावनाएं आहत हो जाती हैं और मुकदमे दर्ज करवा दिए जाते हैं। ऐसे आरोप न सिर्फ हास्यास्पद हैं बल्कि समझदारी का उपहास उड़ाने जैसे हैं। इसके बावजूद पुलिस मामले दर्ज करती है और नतीजा पहले से पता होने के बाद भी चार्जशीट दाखिल कर ट्रायल शुरू कर देती है, जिससे अदालतों का बोझ लगातार बढ़ता जाता है।
हिरासत में हिंसा और पुलिस कार्यशैली पर सवाल
पुलिस के रवैये और कथित एनकाउंटरों पर चिंता व्यक्त करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि देश में गैर-न्यायिक हत्याएं बढ़ रही हैं, जो पुलिसिंग और जांच तंत्र की विफलता को दर्शाती हैं। उन्होंने कहा कि वर्ष 1997 के ऐतिहासिक डीके बसु फैसले के बाद उन्हें लगा था कि हिरासत में हिंसा बीते दिनों की बात हो गई है, लेकिन मौजूदा हालात उन्हें इस सोच पर दोबारा विचार करने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
आरोपियों को देर रात घटनास्थल पर ले जाने और उसके बाद होने वाली पुलिस कार्रवाई में उनकी मौत की घटनाओं पर सवाल उठाते हुए उन्होंने युवा पुलिस अधिकारियों के हिंसक व्यवहार पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि पेशेवर पुलिसकर्मियों को प्रदर्शनकारियों पर आपा खोने और हाथ से उनकी पिटाई करने की जरूरत क्यों पड़ती है। ऐसे आचरण के कारण ही न्यायाधीश आरोपियों को पुलिस हिरासत में भेजने से हिचकिचाते हैं, क्योंकि रात के वक्त हिरासत में उनके साथ क्या होगा, यह सोचकर ही डर लगता है।
सरकारी वकीलों की निष्पक्षता और न्यायिक भरोसा
अभियोजन पक्ष की भूमिका पर बात करते हुए जस्टिस भुइयां ने कहा कि मुकदमों को वापस लेने का फैसला कार्यपालिका के निर्देश पर नहीं, बल्कि सरकारी वकील के अपने स्वतंत्र विवेक पर आधारित होना चाहिए। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सभी सरकारी वकील आर्थिक रूप से इतने संपन्न नहीं होते कि वे अपने अधिकारियों या सरकार से असहमत होने का जोखिम उठा सकें। इसके बावजूद जो अभियोजक दबाव के आगे नहीं झुकते, वे सम्मान के हकदार हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि आपराधिक न्याय प्रणाली पर जनता का विश्वास प्रक्रिया की निष्पक्षता पर निर्भर करता है। किसी भी मामले में दोषसिद्धि तभी विश्वसनीय मानी जा सकती है जब वह निष्पक्ष तरीके से हासिल की गई हो, और बरी किया जाना भी तभी स्वीकार्य है जब अदालत में ईमानदारी से दलीलें पेश की गई हों। इसके लिए अभियोजक का निष्पक्ष होना और बचाव पक्ष के वकील का ईमानदार होना अनिवार्य है।
इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में सेंटर फॉर डिस्कोर्स ऑन क्रिमिनल एंड कॉन्स्टिट्यूशनल ज्यूरिप्रूडेंस द्वारा आयोजित इस संगोष्ठी में सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस अभय एस. ओका और दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस अमित शर्मा ने भी अपने विचार रखे। इस दौरान कई पूर्व न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता और बार के सदस्य मौजूद थे।

