रिफंड मिलने पर ही उत्पन्न होता है ब्याज का दावा करने का आधार, विभागीय ज्ञापनों पर लागू नहीं होता सीपीसी का ऑर्डर II रूल 2: पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

गलत तरीके से वसूली गई रकम पर ब्याज के अधिकार और प्रक्रियात्मक नियमों के दायरे पर एक अहम फैसले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने परमानेंट लोक अदालत का आदेश रद्द कर दिया है। जस्टिस त्रिभुवन दहिया की एकल पीठ ने पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (पीएसपीसीएल) को निर्देश दिया है कि वह उपभोक्ता से अनुचित तरीके से वसूले गए और बाद में वापस किए गए 6,13,800 रुपये पर 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज का भुगतान करे। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि विभाग के समक्ष प्रशासनिक ज्ञापन (रिप्रजेंटेशन) देना किसी अदालत में कानूनी कार्यवाही शुरू करना नहीं माना जा सकता, इसलिए इस पर सिविल प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) का ऑर्डर II रूल 2 लागू नहीं होता। इसके साथ ही कोर्ट ने कहा कि ब्याज मांगने का कानूनी अधिकार (कॉज ऑफ एक्शन) वास्तव में मूल राशि रिफंड होने की तिथि से ही शुरू होता है।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, मैसर्स संगरूर कोल्ड स्टोरेज के पास लार्ज सप्लाई (एलएस) श्रेणी के तहत बिजली कनेक्शन (कनेक्शन संख्या S46MS460073P और खाता संख्या 3002802541) है। कॉरपोरेशन ने अप्रैल 2011 से याचिकाकर्ता पर तीन प्रतिशत की दर से अतिरिक्त सप्लाई यूनिट का गलत शुल्क लगाना शुरू कर दिया था।

याचिकाकर्ता ने इस गलत वसूली के खिलाफ 13 अक्टूबर 2014 को पत्र लिखकर आपत्ति जताई। इसके बाद 4 मार्च 2016, 5 जुलाई 2016 और 14 फरवरी 2020 को रिमाइंडर भी भेजे गए। बाद में, 28 अप्रैल 2021 के कानूनी नोटिस के जवाब में कॉरपोरेशन ने अपनी गलती स्वीकार कर ली और 5 अप्रैल 2022 को गलत तरीके से वसूली गई 6,13,800 रुपये की पूरी राशि वापस (रिफंड) कर दी।

चूंकि कॉरपोरेशन ने केवल मूल राशि लौटाई और उस पर कोई ब्याज नहीं दिया, इसलिए याचिकाकर्ता ने 27 अप्रैल 2022 को ब्याज की मांग करते हुए ज्ञापन दिया। इसके बाद 1 जुलाई 2022 को लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज एक्ट, 1987 की धारा 22-सी के तहत परमानेंट लोक अदालत (जन उपयोगी सेवाएं), संगरूर में अर्जी दाखिल की।

परमानेंट लोक अदालत ने 4 फरवरी 2026 को याचिकाकर्ता की अर्जी खारिज कर दी। लोक अदालत का मानना था कि:

  1. रिफंड मांगते समय शुरुआती ज्ञापनों में ब्याज की मांग न करके याचिकाकर्ता ने सीपीसी के ऑर्डर II रूल 2 के तहत अपने अधिकार छोड़ (वेव) दिए हैं; और
  2. रिफंड का दावा मई 2011 से मार्च 2017 की अवधि से संबंधित है, इसलिए यह समय-सीमा कानून (लॉ ऑफ लिमिटेशन) के तहत बाधित (टाइम-बार्ड) है।
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लोक अदालत के इस फैसले को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की और 18 प्रतिशत वार्षिक ब्याज दिलाने तथा लोक अदालत के आदेश को रद्द करने की मांग की।

पक्षों की दलीलें

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से याचिकाकर्ता की ओर से पेश एडवोकेट स्पर्श छिब्बर ने दलील दी कि कॉरपोरेशन ने अतिरिक्त राशि अवैध रूप से वसूली थी और उसे बिना किसी वैध कारण के अपने पास रोके रखा। इसलिए उपभोक्ता उस अवधि के लिए ब्याज पाने का पूरा हकदार है।

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वहीं, प्रतिवादी कॉरपोरेशन की ओर से पेश एडवोकेट प्रियंका मलिक और एडवोकेट महक कंवर ने अदालत के सामने रखे गए इन तथ्यात्मक पहलुओं पर कोई विवाद नहीं जताया।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

मामले के रिकॉर्ड पर विचार करने के बाद जस्टिस दहिया ने पाया कि कॉरपोरेशन ने उपभोक्ता से गलत तरीके से राशि वसूली और उस धन का उपयोग अपने कार्यों के लिए किया। कॉरपोरेशन द्वारा गलती स्वीकार किए जाने पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:

“05.04.2022 को राशि वापस करके कॉरपोरेशन ने अपनी गलती मान ली है।”

समय-सीमा (लिमिटेशन) से जुड़े लोक अदालत के निष्कर्ष को खारिज करते हुए कोर्ट ने रेखांकित किया कि याचिकाकर्ता ने रिफंड मिलने के तुरंत बाद ही ब्याज की मांग उठाई थी। अदालत ने टिप्पणी की:

“इन परिस्थितियों में यह नहीं कहा जा सकता कि उनका दावा समय-सीमा से बाहर है, क्योंकि ब्याज मांगने का वाद-कारण (कॉज ऑफ एक्शन) 05.04.2022 को राशि रिफंड होने पर ही उत्पन्न हुआ।”

इसके साथ ही, कोर्ट ने याचिकाकर्ता के खिलाफ सीपीसी के ऑर्डर II रूल 2 को लागू करने के तर्क को भी पूरी तरह गलत ठहराया और स्पष्ट किया:

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“इसके अलावा, केवल रिफंड की मांग को लेकर प्रतिवादियों के समक्ष ज्ञापन देने मात्र से यह नहीं कहा जा सकता कि याचिकाकर्ता ने किसी अदालत या ट्रिब्यूनल में कोई कार्यवाही शुरू की थी। इसलिए, सीपीसी के ऑर्डर II रूल 2 के प्रावधान यहां लागू नहीं होंगे।”

हाईकोर्ट का निर्णय

इन निष्कर्षों के साथ हाईकोर्ट ने रिट याचिका का निपटारा करते हुए परमानेंट लोक अदालत के 4 फरवरी 2026 के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने प्रतिवादी कॉरपोरेशन को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ता को मई 2011 से लेकर रिफंड की तिथि (5 अप्रैल 2022) तक की कुल राशि पर 6 प्रतिशत वार्षिक दर से ब्याज का भुगतान करे। यह भुगतान आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के चार सप्ताह के भीतर किया जाना है।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मैसर्स संगरूर कोल्ड स्टोरेज बनाम पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सीडब्ल्यूपी-15813-2026
पीठ: जस्टिस त्रिभुवन दहिया
निर्णय की तिथि: 01.09.2026

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