नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस के अवैध व्यापार की रोकथाम अधिनियम, 1988 (पीआईटीएनडीपीएस एक्ट) के तहत पारित एक प्रिवेंटिव डिटेंशन (निवारक नजरबंदी) आदेश को रद्द करते हुए आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिरासत में लिए गए व्यक्ति (डिटेन्यू) को मिली जमानत के आदेश अत्यंत महत्वपूर्ण सामग्री हैं, जिन पर विचार करके ही डिटेनिंग अथॉरिटी वैध व्यक्तिपरक संतुष्टि (सब्जेक्टिव सैटिस्फेक्शन) पर पहुंच सकती है। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर की खंडपीठ ने निर्णय दिया कि स्पॉन्सरिंग अथॉरिटी द्वारा पूर्व के जमानत आदेशों को डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष प्रस्तुत न करना डिटेंशन आदेश को अवैध बना देता है। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका को स्वीकार करते हुए डिटेन्यू को तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता कोंडिशेट्टी किरण कुमार ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में हेबियस कॉर्पस याचिका दायर की थी। इस याचिका के जरिए 9 फरवरी 2026 के प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश और उसके बाद जी.ओ.आरटी.सं. 399 के तहत 13 मार्च 2026 को जारी पुष्टि आदेश (कन्फर्मेशन ऑर्डर) को रद्द करने की मांग की गई थी।
याचिकाकर्ता के खिलाफ प्रिवेंटिव डिटेंशन का यह आदेश एस.पी.एस.आर. नेल्लोर जिले के वेदयापालेम पुलिस स्टेशन में दर्ज दो आपराधिक मामलों के आधार पर जारी किया गया था:
- क्राइम सं. 351/2025, जो 24 अगस्त 2025 को दर्ज हुआ था।
- क्राइम सं. 366/2025, जो 5 सितंबर 2025 को दर्ज हुआ था।
पहले मामले में आरोपी को 16 अक्टूबर 2025 को जमानत मिल चुकी थी। वहीं दूसरे मामले में उसे 21 जनवरी 2026 को जमानत दी गई थी। ये दोनों ही जमानत आदेश 9 फरवरी 2026 को डिटेंशन आदेश पारित होने से पहले दिए जा चुके थे।
अदालत के समक्ष दलीलें
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील रामलक्ष्मण रेड्डी सानेपल्ली ने दलील दी कि डिटेंशन आदेश जारी होने से काफी पहले दोनों मामलों में जमानत मिल जाने के बावजूद, किसी भी जमानत आदेश को डिटेनिंग अथॉरिटी के सामने नहीं रखा गया और न ही अथॉरिटी ने उन पर विचार किया। याचिकाकर्ता ने यह भी रेखांकित किया कि राज्य सरकार के पुष्टि आदेश में भी इन जमानत आदेशों पर किसी विचार का कोई उल्लेख नहीं मिलता है।
याचिका का विरोध करते हुए अतिरिक्त महाधिवक्ता कार्यालय के सरकारी वकील कीर्ति तेजा कोंडावेती ने कहा कि डिटेंशन का प्रस्ताव 20 दिसंबर 2025 को भेजा गया था। उन्होंने स्वीकार किया कि पहले मामले का जमानत आदेश डिटेनिंग अथॉरिटी के सामने नहीं रखा गया था। दूसरे मामले को लेकर उन्होंने तर्क दिया कि चूंकि प्रस्ताव भेजे जाने के बाद जमानत मंजूर हुई थी, इसलिए उस पर विचार करने की संभावना नहीं थी। सरकारी वकील ने यह भी माना कि सरकार के पुष्टि आदेश में भी जमानत आदेशों पर विचार परिलक्षित नहीं होता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और नजीरें
पीठ की ओर से फैसला सुनाते हुए जस्टिस रवि नाथ तिलहरी ने टिप्पणी की कि “जमानत आदेशों पर विचार करने के संबंध में कानून पूरी तरह से स्पष्ट है कि वे प्रासंगिक सामग्री हैं और डिटेनिंग अथॉरिटी द्वारा व्यक्तिपरक संतुष्टि पर पहुंचने के लिए उन पर विचार किया जाना अनिवार्य है।”
खंडपीठ ने इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पूर्व के कई फैसलों का संदर्भ लिया:
- रुषिकेश तानाजी भोईटे बनाम महाराष्ट्र राज्य (2012) 2 SCC 72: सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यदि डिटेन्यू अदालत के आदेश से जमानत पर रिहा है और डिटेंशन आदेश के समय अपनी स्वतंत्रता का उपभोग कर रहा है, तो उस जमानत आदेश को डिटेनिंग अथॉरिटी के समक्ष रखा जाना चाहिए। जमानत जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज को पेश न करना और उस पर विचार न करना अथॉरिटी की व्यक्तिपरक संतुष्टि को दूषित कर देता है। पीठ ने इस मामले में रेखा बनाम तमिलनाडु राज्य (2011) 5 SCC 244 के हवाले से भी स्पष्ट किया कि जमानत की स्थिति को जाने बिना दिया गया डिटेंशन आदेश टिक नहीं सकता।
- बुद्दिगा धना लक्ष्मी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (रिट याचिका सं. 33545/2025): हाईकोर्ट ने पूर्व के फैसलों (पोन्नाडा गीता और संयुक्त हाईकोर्ट की खंडपीठ के वसंथु सुमालथा बनाम आंध्र प्रदेश राज्य (2016) 1 ALT 738 (DB)) के हवाले से यह दोहराया था कि जमानत आदेश और उसमें लगाई गई शर्तें अनिवार्य सामग्री हैं। इन्हें रिकॉर्ड से बाहर रखने से वैधानिक संतुष्टि खंडित होती है।
- नेनावथ बुज्जी बनाम तेलंगाना राज्य (2024) 17 SCC 294: सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया था कि “डिटेनिंग अथॉरिटी को अपेक्षित व्यक्तिपरक संतुष्टि तक पहुंचने के लिए केवल प्रासंगिक और महत्वपूर्ण सामग्री पर ही विचार करना चाहिए।” निर्णय प्रक्रिया वस्तुनिष्ठ तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए और उसमें मनमानेपन या आवश्यक तथ्यों की अनदेखी का अभाव होना चाहिए।
- जोयी किट्टी जोसेफ बनाम भारत संघ (2025) 4 SCC 476: सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि “जब क्षेत्राधिकार वाली अदालत द्वारा जमानत दी गई थी, वह भी शर्तों के साथ, तो डिटेनिंग अथॉरिटी को यह जांचना चाहिए था कि क्या वे शर्तें उसी तरह की गतिविधियों में दोबारा संलिप्त होने की बुराई को रोकने के लिए पर्याप्त थीं; जो कि पारित किए गए प्रिवेंटिव डिटेंशन का मुख्य आधार है।”
- प्रमोद सिंगला बनाम भारत संघ (2024) 19 SCC 791: सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि प्रिवेंटिव डिटेंशन के मामलों में संविधान के अनुच्छेद 21 और अनुच्छेद 22(5) के सिद्धांतों के तहत हर प्रक्रियात्मक खामी का लाभ डिटेन्यू को मिलना चाहिए।
इन कानूनी सिद्धांतों को वर्तमान मामले पर लागू करते हुए पीठ ने समय-सीमा से जुड़े राज्य के तर्क को सिरे से खारिज कर दिया:
“यह कोई तर्क या बचाव नहीं है कि दूसरी घटना में डिटेनिंग अथॉरिटी को प्रस्ताव भेजे जाने के बाद जमानत दी गई थी। ऐसे मामले में, प्रायोजक प्राधिकरण को डिटेनिंग अथॉरिटी के विचारार्थ ऐसी अतिरिक्त सामग्री प्रस्तुत करनी चाहिए थी, क्योंकि डिटेंशन आदेश दूसरे आधार वाले आपराधिक मामले में जमानत मिलने की तारीख के काफी समय बाद पारित किया गया था।”
कोर्ट ने पाया कि डिटेनिंग अथॉरिटी इस तथ्य से पूरी तरह अनजान थी कि डिटेन्यू को दोनों मामलों में जमानत मिल चुकी है, और इस कमी को 13 मार्च 2026 के पुष्टि आदेश में भी नहीं सुधारा गया।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने माना कि 9 फरवरी 2026 का प्रिवेंटिव डिटेंशन आदेश और 13 मार्च 2026 का पुष्टि आदेश कानूनी रूप से टिकने योग्य नहीं हैं। इसलिए अदालत ने रिट याचिका को स्वीकार करते हुए दोनों आदेशों को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि डिटेन्यू किसी अन्य लंबित मामले में हिरासत में अपेक्षित न हो, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए। हालांकि, खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि डिटेनिंग अथॉरिटी सभी प्रासंगिक सामग्रियों पर विधिवत विचार करने के बाद कानून के अनुसार नया आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: कोंडिशेट्टी किरण कुमार बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं 3 अन्य
वाद संख्या: रिट याचिका संख्या 10470/2026
पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर
निर्णय की तिथि: 19.08.2026

