केरल में आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के क्रियान्वयन को लेकर हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। हाईकोर्ट ने एक उच्च स्तरीय निगरानी समिति को निर्देश दिया है कि वह राज्यभर के स्थानीय निकायों द्वारा किए जा रहे उपायों की जमीनी हकीकत पर हर महीने एक विस्तृत रिपोर्ट अदालत को सौंपे।
जस्टिस ए.के. जयशंकरण नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की पीठ ने स्पष्ट किया कि समिति पूरे राज्य से आंकड़े जुटाकर हर महीने की 10 तारीख तक अपनी सारणीबद्ध रिपोर्ट पेश करे। यह प्रक्रिया अगले आदेश तक लगातार जारी रहेगी। अदालत ने इस मामले की अगली सुनवाई 29 अक्टूबर तय की है।
स्थानीय निकायों की निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही
हाईकोर्ट के निर्देशों के अनुसार, निगरानी समिति को सबसे पहले यह जांचना होगा कि क्या सभी पंचायतों और नगर निकायों ने अपने अधिकार क्षेत्र में आवारा कुत्ता प्रबंधन समितियों का गठन कर लिया है या नहीं।
इसके साथ ही, समिति को 31 जुलाई को राज्य सरकार द्वारा जारी उस सर्कुलर के अनुपालन की स्थिति भी परखनी होगी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को सख्ती से लागू करने के निर्देश दिए गए थे। सरकारी सर्कुलर में चेतावनी दी गई थी कि शीर्ष अदालत के आदेशों के पालन में किसी भी तरह की लापरवाही को बेहद गंभीरता से लिया जाएगा और चूक पाए जाने पर संबंधित अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
पीठ ने निर्देश दिया है कि यदि किसी स्थानीय निकाय ने इस सर्कुलर पर आंशिक रूप से अमल किया है, तो समिति यह पता लगाए कि नियमों के पालन में कितनी कमी रह गई और इसके पीछे क्या वजहें थीं। वहीं, जिन निकायों ने निर्देशों पर बिल्कुल भी काम नहीं किया है, उनसे पूरी तरह निष्क्रिय रहने के ठोस कारण दर्ज कराए जाएं। इसके अलावा, समिति को यह विवरण भी जुटाना होगा कि प्रत्येक स्थानीय निकाय ने कितने कुत्तों को दया मृत्यु (यूथेनेशिया) दी है।
सुप्रीम कोर्ट के 19 मई 2026 के आदेश की पृष्ठभूमि
हाईकोर्ट ने यह कदम सुप्रीम कोर्ट के 19 मई 2026 के आदेश का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करने के लिए खुद शुरू की गई एक जनहित याचिका पर उठाया है।
सुप्रीम कोर्ट ने इंसानी जीवन की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए कई कड़े दिशा-निर्देश जारी किए थे। शीर्ष अदालत ने रेबीज से संक्रमित, लाइलाज बीमारी से ग्रस्त, हिंसक और इंसानों के लिए खतरनाक बन चुके कुत्तों को दया मृत्यु देने की अनुमति दी थी।
इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को एनिमल बर्थ कंट्रोल (एबीसी) ढांचे को मजबूत करने के लिए समन्वित और समयबद्ध कदम उठाने को कहा था। इन निर्देशों में नसबंदी और टीकाकरण की क्षमता में तेजी से विस्तार करना, पहले से मौजूद पशु देखभाल केंद्रों को सुदृढ़ बनाना और आवश्यक संस्थागत तंत्र तैयार करना शामिल है। शीर्ष अदालत ने यह भी अनिवार्य किया था कि प्रत्येक जिले में आवश्यक सर्जिकल सुविधाओं, लॉजिस्टिक्स और प्रशिक्षित पशु चिकित्सकों से युक्त कम से कम एक पूर्णतः क्रियाशील एबीसी केंद्र स्थापित किया जाए।

