पॉक्सो मामले में मद्रास हाईकोर्ट से इंजीनियरिंग छात्र को मिली जमानत, बालिग होने से पहले छात्रा से शादी न करने का दिया हलफनामा

मद्रास हाईकोर्ट ने पॉक्सो (POCSO) मामले में नामजद 20 वर्षीय एक इंजीनियरिंग छात्र को इस शर्त पर जमानत दे दी है कि वह पीड़िता के कानूनी रूप से विवाह योग्य उम्र पूरी करने तक उससे शादी का कोई प्रयास नहीं करेगा। अदालत ने यह फैसला आरोपी द्वारा इस संबंध में औपचारिक हलफनामा सौंपने और पीड़िता पक्ष की ओर से उसकी रिहाई पर कोई गंभीर आपत्ति न जताए जाने के बाद सुनाया। इसके साथ ही हाईकोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया के दौरान नाबालिग छात्रा को किसी भी प्रकार के दबाव या अनुचित हस्तक्षेप से दूर रखने के लिए सुरक्षात्मक निर्देश भी दिए हैं।

जस्टिस एम. निर्मल कुमार ने 9 सितंबर को छात्र की उस आपराधिक अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया, जिसमें निचली अदालत द्वारा 9 जुलाई को उसकी जमानत याचिका खारिज किए जाने को चुनौती दी गई थी। आरोपी छात्र को 27 जून को गिरफ्तार किया गया था। उस पर पॉक्सो कानून, भारतीय न्याय संहिता और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत नाबालिग के साथ यौन उत्पीड़न, चोट पहुंचाने, आपराधिक धमकी देने और जातिगत अपराधों के आरोप हैं।

शादी और जातिगत आधार पर भेदभाव न करने का हलफनामा

हाईकोर्ट में पेश किए गए हलफनामे में छात्र ने वचन दिया कि वह पीड़िता के बालिग होने से पहले उस पर शादी के लिए किसी प्रकार का दबाव, प्रभाव या प्रलोभन नहीं डालेगा। उसने स्पष्ट किया कि भविष्य में कोई भी विवाह पूरी तरह से छात्रा की स्वतंत्र और स्वैच्छिक इच्छा पर ही निर्भर करेगा। छात्र ने यह भी रेखांकित किया कि यदि कानूनी उम्र हासिल करने के बाद पीड़िता उससे विवाह करने का फैसला करती है, तो उसकी जाति या समुदाय को किसी भी तरह से बाधा अथवा इनकार का कारण नहीं बनाया जाएगा और वह सामाजिक मान्यताओं को इस कानूनी विवाह के आड़े नहीं आने देगा।

सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा अदालत में पेश की गई छात्र की मां ने भी स्पष्ट किया कि दोनों के विवाह योग्य उम्र प्राप्त कर लेने के बाद उन्हें इस रिश्ते पर कोई एतराज नहीं होगा। इसके अलावा, सऊदी अरब में कार्यरत छात्र के पिता ने भी अपनी सहमति की जानकारी अदालत को दी। उधर, अभियोजन पक्ष ने अदालत को बताया कि दोनों पक्षों की औपचारिक शिक्षा अभी पूरी नहीं हुई है और पुलिस मामले की जांच कर रही है। वहीं, पीड़िता के वकील ने अदालत को अवगत कराया कि छात्र द्वारा दी गई औपचारिक अंडरटेकिंग और पढ़ाई पूरी करने के बाद ही विवाह करने के आश्वासन के मद्देनजर उन्हें जमानत दिए जाने पर कोई गंभीर आपत्ति नहीं है।

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अदालत के समक्ष दोनों पक्षों के विरोधाभासी बयान

मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों ने घटनाक्रम को लेकर एक-दूसरे के विपरीत विवरण पेश किए, जिस पर हाईकोर्ट ने जमानत अर्जी पर विचार करते समय कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला। बचाव पक्ष का तर्क था कि एक ही गांव के रहने वाले दोनों युवाओं के बीच आपसी सहमति से प्रेम संबंध बने थे, जो बाद में शारीरिक संबंधों में बदले। बचाव पक्ष के अनुसार, छात्र ने पढ़ाई पूरी करने, रोजगार पाने और कानूनी उम्र पूरी होने के बाद शादी करने का वादा किया था। जब छात्रा ने गर्भवती होने की बात कही, तो छात्र ने इन औपचारिकताओं के बाद परिवार से बात करने को कहा। इसके बाद छात्र के माता-पिता की ओर से शादी को लेकर शुरुआती आपत्ति जताए जाने पर लड़की के परिजनों ने आपराधिक मामला दर्ज करा दिया।

इसके विपरीत, छात्रा के वकील ने अदालत में दलील दी कि शारीरिक संबंध दबाव और जोर-जबरदस्ती के जरिए बनाए गए थे। वकील का आरोप था कि जब छात्रा ने गर्भावस्था की जानकारी दी, तो आरोपी उससे कतराने लगा, उसने संपर्क बंद कर दिया और जिम्मेदारी लेने से मुकर गया, जिसके कारण पीड़िता को पुलिस के पास जाने के लिए विवश होना पड़ा।

जमानत की शर्तें और जांच अधिकारी को निर्देश

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सभी पक्षों की दलीलों और रिकॉर्ड का संज्ञान लेते हुए जस्टिस एम. निर्मल कुमार ने छात्र को नियमित जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। अदालत ने आरोपी को 5,000 रुपये का निजी मुचलका और इतनी ही राशि के दो जमानती प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।

जमानत की शर्तों के तहत छात्र को आवश्यकता पड़ने पर पुलिस जांच में शामिल होना होगा। साथ ही उसके साक्ष्यों से छेड़छाड़ करने, गवाहों को प्रभावित करने और फरार होने पर रोक लगाई गई है। अदालत ने चेतावनी दी कि यदि छात्रा को किसी भी तरह की असुविधा या मानसिक परेशानी पहुंचाई गई, तो जमानत रद्द कर दी जाएगी। इसके अतिरिक्त, जांच अधिकारी को निर्देश दिया गया कि वे हाईकोर्ट के आदेश में दर्ज इन सभी घटनाक्रमों को ध्यान में रखते हुए ही आगे की विवेचना पूरी करें।

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