भर्ती विज्ञापन में निर्धारित अनिवार्य पात्रता शर्त को पूर्व अनुभव, चाहे वह कितना भी लंबा हो, दरकिनार नहीं कर सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्पेशल एजुकेटर (विशेष शिक्षक) के 4,900 पदों के लिए जारी विज्ञापन में निर्धारित उस पात्रता शर्त को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है, जिसमें केवल वर्तमान में संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग पर कार्यरत अभ्यर्थियों को ही आवेदन का पात्र माना गया था। जस्टिस मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा की शक्ति का प्रयोग करते हुए अदालतें भर्ती की शर्तों को दोबारा नहीं लिख सकतीं और न ही सहानुभूति या समानता के आधार पर सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों को शिथिल कर सकती हैं। पीठ ने माना कि पूर्व में किया गया कार्य या पुराना अनुभव, चाहे वह कितना भी लंबा क्यों न हो, भर्ती के लिए तय अनिवार्य शर्त का स्थान नहीं ले सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिका में शामिल 13 याचिकाकर्ताओं को नवंबर 2005 से सितंबर 2011 के बीच महराजगंज जिले में ‘इंटीग्रेटेड एजुकेशन फॉर डिसेबल्ड स्कीम’ के तहत इटिनरेंट टीचर और रिसोर्स टीचर के रूप में नियुक्त किया गया था। उत्तर प्रदेश एजुकेशन फॉर ऑल प्रोजेक्ट बोर्ड के माध्यम से संचालित यह योजना 6 से 14 वर्ष की आयु के दिव्यांग बच्चों को सामान्य कक्षाओं में समावेशी शिक्षा प्रदान करने के लिए लागू की गई थी। सभी याचिकाकर्ता स्नातक हैं और उनके पास विशेष शिक्षा में डिप्लोमा (श्रवण बाधित), डिप्लोमा इन हियरिंग, लर्निंग एंड स्पीच अथवा बी.एड. (विशेष शिक्षा) जैसी मान्यता प्राप्त योग्यताएं हैं। इसके साथ ही वे भारतीय पुनर्वास परिषद (आरसीआई) के सेंट्रल रिहैबिलिटेशन रजिस्टर में भी पंजीकृत हैं।

याचिकाकर्ताओं की नियुक्ति शैक्षणिक सत्र के आधार पर की जाती थी और हर साल संतोषजनक सेवा के आधार पर इसका नवीनीकरण होता रहा। मई 2019 तक कार्य करने के बाद, सत्र 2019-20 के लिए राज्य परियोजना निदेशक ने नवीनीकरण सर्कुलर जारी किया। खंड शिक्षा अधिकारियों और जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी (बीएसए) महराजगंज की संस्तुति के बावजूद, 27 जुलाई 2019 को केवल 12 शिक्षकों का ही नवीनीकरण किया गया, जबकि याचिकाकर्ताओं सहित करीब 17 शिक्षकों की सेवाएं असंतोषजनक बताते हुए उन्हें बाहर कर दिया गया।

इसके खिलाफ याचिकाकर्ताओं ने रिट-ए संख्या 12972/2019 दाखिल की, जिसे हाईकोर्ट ने 8 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट के डायरेक्टर, इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट डेवलपमेंट, यूपी बनाम श्रीमती पुष्पा श्रीवास्तव मामले का हवाला देते हुए खारिज कर दिया था। उस फैसले में कहा गया था कि संविदा कर्मियों को संविदा अवधि समाप्त होने के बाद पद पर बने रहने का कोई विधिक अधिकार नहीं होता। इसके बाद विशेष अपील में खंडपीठ ने अधिकारियों को तत्कालीन सरकारी नीति के तहत नियमित नियुक्ति के दावों पर विचार करने का निर्देश दिया, लेकिन 15 जून 2026 को बीएसए महराजगंज ने उनके प्रत्यावेदन खारिज कर दिए।

इसी बीच, सुप्रीम कोर्ट देश भर में विशेष शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने की निगरानी रजनीश कुमार पांडे एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य मामले में कर रहा था। सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई 2026 के आदेश में उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि वह राज्य के दो प्रमुख हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में विज्ञापन जारी कर संविदा और आउटसोर्सिंग पर कार्यरत विशेष शिक्षकों से करीब 4,900 रिक्त पदों के लिए आवेदन आमंत्रित करे।

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इन निर्देशों के अनुपालन में उत्तर प्रदेश बेसिक शिक्षा परिषद के सचिव ने 13 जून 2026 को विज्ञापन जारी किया। हालांकि, विज्ञापन के सामान्य निर्देश संख्या 2 में यह अनिवार्य शर्त रखी गई कि अभ्यर्थियों को संविदा, दैनिक वेतन या आउटसोर्सिंग पर वर्तमान में कार्यरत होने का अनुबंध पत्र या कार्यालय आदेश प्रस्तुत करना होगा। चूंकि याचिकाकर्ता मई 2019 से कार्यरत नहीं थे, इसलिए वे अपात्र हो गए। इसके बाद उन्होंने निर्देश संख्या 2 और 15 जून 2026 के निरस्तीकरण आदेशों को रद्द करने तथा चयन प्रक्रिया में शामिल होने की अनुमति मांगने के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षकारों की दलीलें

याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने तर्क दिया कि केवल वर्तमान में बेरोजगार होने के आधार पर योग्य और अनुभवी विशेष शिक्षकों को भर्ती प्रक्रिया से बाहर करना विशेष आवश्यकता वाले बच्चों को प्रशिक्षित शिक्षक उपलब्ध कराने के मूल उद्देश्य को विफल करता है। उन्होंने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने 3 फरवरी 2026 के अपने आदेश में कट-ऑफ डेट की बाध्यता को समाप्त कर दिया था ताकि सभी पात्र अभ्यर्थियों को मौका मिल सके।

याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वर्तमान रोजगार की स्थिति के आधार पर अभ्यर्थियों के बीच भेद करना संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन है और यह एक कृत्रिम व अतार्किक वर्गीकरण पैदा करता है। उन्होंने बताया कि उनके पास 8 से 9 साल का कार्यानुभव है और उनका आरसीआई पंजीकरण 2028 और 2033 तक वैध है। ऐसे में उन्हें केवल वर्तमान में कार्यरत न होने के कारण बाहर करना मनमाना कदम है। इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं की ओर से दया और मानवीय आधार पर भी राहत देने की गुहार लगाई गई।

दूसरी ओर, राज्य सरकार और बेसिक शिक्षा विभाग के वकीलों ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि विज्ञापन पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट के 7 मार्च 2025 और 5 मई 2026 के आदेशों तथा संबंधित शासनादेशों के अनुरूप जारी किया गया है। उनका कहना था कि चयन प्रक्रिया का मुख्य जोर उन शिक्षकों की स्क्रीनिंग पर था जो वर्तमान में वास्तव में कार्यरत हैं और बच्चों को पढ़ा रहे हैं। चूंकि याचिकाकर्ता 2019 से सेवा में नहीं हैं और उनके नवीनीकरण की चुनौती पहले ही खारिज हो चुकी है, इसलिए वे इस विशेष चयन प्रक्रिया में शामिल होने का दावा नहीं कर सकते।

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अदालत का कानूनी विश्लेषण

हाईकोर्ट ने विशेष शिक्षा और बच्चों के अधिकारों के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा:

“विशेष शिक्षकों की नियुक्ति का उद्देश्य विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए शिक्षा में सार्थक और वास्तविक समानता सुनिश्चित करना है। उनकी विशिष्ट विशेषज्ञता उन्हें व्यक्तिगत सीखने की आवश्यकताओं को पूरा करने, उपयुक्त शिक्षण रणनीतियों को अपनाने और बच्चे की प्रभावी भागीदारी व समग्र विकास को सुविधाजनक बनाने में सक्षम बनाती है।”

अनुच्छेद 226 के तहत न्यायिक समीक्षा के दायरे पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत तय की गई भर्ती शर्तों को संशोधित नहीं कर सकता:

“यह अदालत, न्यायिक समीक्षा की अपनी शक्ति का प्रयोग करते हुए, विवादित विज्ञापन में प्रयुक्त ‘वर्तमान में कार्यरत’ शब्द की जगह ‘अतीत में कार्य कर चुके’ शब्द को प्रतिस्थापित नहीं कर सकती। ऐसा कदम सक्षम प्राधिकारी द्वारा निर्धारित पात्रता मानदंडों को दोबारा लिखने के समान होगा और यह न्यायिक समीक्षा की अनुमेय सीमाओं का उल्लंघन करेगा।”

संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के तहत उठाए गए तर्कों का परीक्षण करते हुए अदालत ने स्टेट ऑफ वेस्ट बंगाल बनाम अनवर अली सरकार और रामकृष्ण डालमिया बनाम जस्टिस एस.आर. तेंदुलकर में प्रतिपादित उचित वर्गीकरण के सिद्धांतों का उल्लेख किया। अदालत ने टिप्पणी की:

“सार्वजनिक रोजगार में समान अवसर की संवैधानिक गारंटी प्रत्येक व्यक्ति को, भले ही वह अन्यथा योग्य हो, प्रत्येक भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने का बिना शर्त अधिकार प्रदान नहीं करती। समानता का सिद्धांत केवल उन्हीं व्यक्तियों के बीच लागू होता है जो विचार किए जाने वाले वैध रूप से पहचाने गए वर्ग के भीतर आते हैं।”

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह वर्गीकरण केवल कार्यरत और बेरोजगार के बीच का सामान्य विभाजन नहीं है, बल्कि यह सुप्रीम कोर्ट के उस निर्देश से उपजा है जिसका उद्देश्य वर्तमान में कार्यरत संविदा शिक्षकों के समूह की स्क्रीनिंग कर उन्हें समायोजित करना था। अदालत ने कहा:

“इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत पूरी वैधानिक और प्रशासनिक व्यवस्था के मूल लाभार्थी—विशेष आवश्यकता वाले बच्चे—को नजरअंदाज नहीं कर सकती। विवादित शर्त की वैधता को केवल इस दृष्टिकोण से नहीं परखा जा सकता कि क्या यह याचिकाकर्ताओं को रोजगार का अवसर प्रदान करती है। इसकी वास्तविक कसौटी यह है कि क्या यह उस उद्देश्य को आगे बढ़ाती है जिसके लिए पद स्वीकृत किए गए हैं और चयन प्रक्रिया शुरू की गई है।”

तेज प्रकाश पाठक बनाम राजस्थान हाईकोर्ट और सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम उमा देवी (3) में संविधान पीठ के निर्णयों के साथ-साथ स्टेट ऑफ एमपी बनाम रघुवीर सिंह यादव और स्टेट ऑफ कर्नाटक बनाम एम.एल. केसरी का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि अस्थायी या संविदा कार्य से नियमित नियुक्ति का कोई कानूनी अधिकार नहीं मिलता और भर्ती प्रक्रिया शुरू होने के बाद नियमों को बदला नहीं जा सकता। डॉ. एम.वी. नायर बनाम भारत संघ और महाराष्ट्र पब्लिक सर्विस कमीशन बनाम संदीप श्रीराम वराडे का उल्लेख करते हुए अदालत ने माना कि पात्रता तय करना नियोक्ता का अधिकार क्षेत्र है और दया या पूर्व अनुभव के आधार पर अनिवार्य शर्तों को नहीं हटाया जा सकता:

“एक न्यायसंगत रियायत के दावे को एक लागू करने योग्य कानूनी अधिकार में बदलने के लिए रिट क्षेत्राधिकार का सहारा नहीं लिया जा सकता, और न ही पूर्व में किए गए कार्य को उस पात्रता शर्त का स्थान लेने दिया जा सकता है जो चयन को नियंत्रित करती है।”

अदालत ने 24 जून 2026 के अंतरिम आदेश के तहत याचिकाकर्ताओं द्वारा चयन प्रक्रिया में भाग लेने के पहलू पर भी विचार किया। सेक्रेटरी, यूपीएससी बनाम एस. कृष्ण चैतन्य और अभिमन्यु राम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य का हवाला देते हुए अदालत ने कहा:

“एक अंतरिम आदेश अनिवार्य रूप से प्रकृति में अंतरिम ही होता है और वह किसी लाभार्थी को ऐसा अधिकार प्रदान नहीं कर सकता जो कार्यवाही के अंतिम निर्णय पर निर्भर करता हो।”

अदालत का निर्णय

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रिट याचिका को खारिज करते हुए निर्णय दिया कि विज्ञापन के सामान्य निर्देश संख्या 2 में कोई संवैधानिक या कानूनी खामी नहीं है। अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि याचिकाकर्ता प्रासंगिक समय पर सेवा में नहीं थे, इसलिए वे सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत पहचाने गए पात्र वर्ग से बाहर हैं। अदालत ने यह भी कहा कि अंतरिम आदेश के तहत परीक्षा या स्क्रीनिंग में शामिल होने मात्र से याचिकाकर्ताओं को चयन या नियुक्ति का कोई विधिक अधिकार प्राप्त नहीं होता।

मामले का विवरण

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मामले का शीर्षक: राकेश कुमार और 12 अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
वाद संख्या: रिट – ए संख्या 9303/2026
पीठ: जस्टिस मंजू रानी चौहान
निर्णय की तिथि: 11 सितंबर 2026

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