“कर्मचारी कोई गुलाम नहीं होता”— यह अहम टिप्पणी करते हुए पटना हाईकोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) के उस फैसले को निरस्त कर दिया है, जिसके तहत बीमारी के चलते कार्यालय न आ सके एक अधिकारी को स्वतः सेवामुक्त (स्वेच्छा से इस्तीफा दिया हुआ) मान लिया गया था। अदालत ने बैंक को निर्देश दिया है कि 30 साल से अधिक समय तक संस्थान में कार्यरत रहे इस डिप्टी मैनेजर को सेवा की निरंतरता और सभी संबद्ध लाभों के साथ पद पर बहाल किया जाए।
जस्टिस हरीश कुमार ने 3 सितंबर को यह फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि हालांकि सेवा नियमावली के तहत बिना किसी वैध कारण के लंबे समय तक अनुपस्थित रहना नौकरी छोड़ने के समान माना जा सकता है, लेकिन किसी कर्मचारी को गुलाम की तरह नहीं देखा जा सकता। अदालत ने कहा कि नियोक्ता का यह दायित्व है कि वह गंभीर चिकित्सीय आधारों की निष्पक्ष जांच करे और संबंधित कर्मचारी को अपनी बात रखने का समुचित अवसर प्रदान करे।
हाईकोर्ट ने एसबीआई के दिसंबर 2019 के उस पत्र और जून 2020 के अपीलीय आदेश को रद्द कर दिया, जिसके जरिए अधिकारी को पद छोड़ने का दोषी करार दिया गया था। अदालत ने आदेश दिया कि अधिकारी की वरिष्ठता और सेवा निरंतरता बरकरार रहेगी, हालांकि जिस अवधि में उन्होंने काम नहीं किया, उस दौरान का वेतन या भत्ता देय नहीं होगा।
बीमारी और सेवामुक्ति का पूरा घटनाक्रम
मामला एसबीआई के डिप्टी मैनेजर पंकज कुमार सिंह से जुड़ा है। उन्होंने नवंबर 1989 में पटना के गांधी मैदान शाखा में क्लर्क-सह-कैशियर के पद से बैंक में अपनी सेवा शुरू की थी। इसके बाद वर्ष 2006 में सहायक प्रबंधक और 2011 में उप प्रबंधक (डिप्टी मैनेजर) के पद पर उनकी पदोन्नति हुई। जून 2019 में उनका स्थानांतरण मुजफ्फरपुर जोन में हुआ था।
स्थानांतरण के तुरंत बाद उन्हें गंभीर पीलिया (एक्यूट जॉन्डिस) हो गया, जिसके बाद चिकित्सकों ने उन्हें कम से कम 45 दिनों के पूर्ण विश्राम की सलाह दी। उन्होंने बैंक के एचआरएमएस (HRMS) पोर्टल पर 1 जुलाई से 31 जुलाई 2019 तक की छुट्टी का आवेदन दिया, जिसे उनके अनुसार पोर्टल पर स्वीकृत भी कर लिया गया था।
स्वास्थ्य लाभ के दौरान ही उनके पैरों में तेज दर्द की गंभीर समस्या उत्पन्न हो गई, जिसके चलते 17 अक्टूबर 2019 को उन्हें एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। डॉक्टरों ने उन्हें मध्य दिसंबर तक बेड रेस्ट पर रहने का परामर्श दिया। स्वास्थ्य में सुधार होने और 13 दिसंबर को मेडिकल फिटनेस मिलने के बाद वे 16 दिसंबर 2019 को अपने कार्यालय में ड्यूटी जॉइन करने पहुंचे।
कार्यालय पहुंचने पर उन्हें बताया गया कि पहले स्वीकृत की गई छुट्टी रद्द कर दी गई है और 29 जून 2019 से उनकी अनुपस्थिति को अनधिकृत माना गया है। इसके बाद 13 दिसंबर 2019 को बैंक ने पत्र जारी कर सूचित किया कि उन्होंने स्वतः सेवा छोड़ दी है और इसे 7 दिसंबर से प्रभावी इस्तीफा मान लिया गया। बैंक के विभागीय स्तर पर जून 2020 में अपनी अपील खारिज होने के बाद अधिकारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
हाईकोर्ट में दोनों पक्षों की दलीलें
अधिकारी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता पीके शाही ने दलील दी कि उनके मुवक्किल ने 30 वर्षों से अधिक समय तक बैंक को पूरी निष्ठा के साथ बेदाग सेवा दी है। इस लंबी अवधि में उन्होंने विभिन्न पदों और शाखाओं में जिम्मेदारी निभाई और उनके आचरण या कार्यशैली पर कभी कोई शिकायत या अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में बीमारी की स्थिति को सेवा छोड़ना मान लेना पूरी तरह अनुचित है।
दूसरी तरफ, एसबीआई की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजेंद्र नारायण ने बैंक की कार्रवाई को सही ठहराते हुए कहा कि छुट्टी का आवेदन खारिज होने के बाद भी अधिकारी लगातार 90 दिनों से अधिक समय तक काम से अनुपस्थित रहे। बैंक का तर्क था कि नोटिस दिए जाने के बावजूद काम पर न लौटना अनुशासनहीनता और कर्तव्य में लापरवाही का स्पष्ट मामला है, जिसके चलते सेवा नियमों के तहत कार्रवाई करना आवश्यक हो गया था।
अदालत का निष्कर्ष: प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन
हाईकोर्ट ने बैंक के रुख को खारिज करते हुए कहा कि अधिकारी द्वारा प्रस्तुत किए गए मेडिकल दस्तावेज पूरी तरह वैध हैं और बैंक उन पर फर्जी या संदिग्ध होने का कोई प्रमाण नहीं दे सका। अदालत ने कहा कि जब बीमारी का आधार वास्तविक था, तो अनुपस्थिति को अनधिकृत ठहराने का बैंक का आधार स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि अधिकारी के खाते में 270 दिनों से अधिक का अर्जित अवकाश (ईएल) और पर्याप्त संख्या में चिकित्सीय अवकाश शेष थे। ऐसे में सेवामुक्ति जैसा कठोर कदम उठाने से पहले प्रबंधन को इन उपलब्ध छुट्टियों पर विचार करना चाहिए था।
जस्टिस कुमार ने कहा कि बैंक ने न तो कभी यह स्पष्ट किया कि पहले स्वीकृत छुट्टी किस आधार पर रद्द की गई और न ही सेवा समाप्त करने जैसा बड़ा निर्णय लेने से पहले कर्मचारी को अपना पक्ष रखने का कोई निष्पक्ष मौका दिया गया। इस आधार पर अदालत ने बैंक के सभी आदेशों को निरस्त करते हुए अधिकारी को बहाल करने का फैसला दिया।

