मां के पुनर्विवाह से पैतृक संपत्ति पर बेटी का अधिकार खत्म नहीं होता: मद्रास हाईकोर्ट

चेन्नई मद्रास हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि हिंदू अविभाजित परिवार (एचयूएफ) में किसी व्यक्ति के निधन के बाद यदि उसकी पत्नी दूसरा विवाह कर लेती है, तब भी उस व्यक्ति की बेटी का अपने पिता के हिस्से की संयुक्त पारिवारिक संपत्ति पर कानूनी अधिकार समाप्त नहीं होता। अदालत ने साफ किया कि हिंदू उत्तराधिकार कानून, 1956 के तहत पुनर्विवाह करने वाली विधवा पर लागू होने वाली अयोग्यता का असर प्रथम श्रेणी के अन्य कानूनी वारिसों पर नहीं पड़ता।

न्यायमूर्ति पी बी बालाजी ने 25 अगस्त को दिए अपने आदेश में रेखांकित किया कि पूर्व-मृत पुत्र का सह-दायिकी (कॉपार्सनरी) हित समाप्त नहीं होता और वह उसकी मां या संतानों जैसे अन्य प्रथम श्रेणी के कानूनी उत्तराधिकारियों को प्राप्त होने के लिए उपलब्ध रहता है। अदालत ने कहा कि कानून के तहत रोक केवल पुनर्विवाह करने वाली विधवा पर लागू होती है, अन्य कानूनी वारिसों के संपत्ति हासिल करने के अधिकार पर नहीं।

कानूनी विवाद की पृष्ठभूमि

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यह मामला एक ऐसे व्यक्ति की संपत्ति के हिस्से से जुड़ा था, जिसके निधन के समय परिवार में उसकी पत्नी और एक बेटी थीं। व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसकी पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया और उसने अपने दिवंगत पति की संपत्ति पर किसी हिस्से का दावा नहीं किया। ऐसे में मृतक की एकमात्र प्रथम श्रेणी कानूनी वारिस होने के नाते बेटी को पिता का पूरा हिस्सा प्राप्त हुआ और उसने उस संपत्ति का प्रबंधन व उपयोग किया।

हालांकि, परिवार के एक अन्य सह-काश्तकार (कॉपार्सनर) ने इस पर आपत्ति जताते हुए अदालत का रुख किया। याचिकाकर्ता की दलील थी कि विधवा के पुनर्विवाह के कारण मृतक का हिस्सा परिवार के अन्य जीवित सह-काश्तकारों के पास लौट जाना चाहिए, जिससे उनका हिस्सा बढ़ जाता। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क रखा कि बेटी के मौजूद होने के बावजूद, मां के दूसरे विवाह के चलते उसे पिता की संपत्ति में से कोई हिस्सा पाने का हक नहीं है।

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इसके विपरीत, दिवंगत व्यक्ति की बेटी के वकील ने अदालत के सामने दलील दी कि पुनर्विवाह के कारण विधवा भले ही अपना दावा खो दे, लेकिन उसके इस कदम से अन्य कानूनी उत्तराधिकारियों, विशेषकर बेटी को पिता के हिस्से से वंचित नहीं किया जा सकता।

अयोग्यता के कानूनी दायरे पर अदालत का रुख

मामले के कानूनी पहलुओं का विश्लेषण करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि हिंदू उत्तराधिकार कानून के तहत यदि किसी पूर्व-मृत पुत्र या भाई की विधवा ने संपत्ति का उत्तराधिकार तय होने के समय पुनर्विवाह कर लिया हो, तो वह बिना वसीयत छोड़े गए व्यक्ति की संपत्ति की हकदार नहीं रह जाती। लेकिन यह पाबंदी केवल संबंधित विधवा तक ही सीमित है।

अदालत ने याचिकाकर्ता द्वारा दिए गए सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले के संदर्भ को भी खारिज कर दिया। न्यायमूर्ति बालाजी ने कहा कि शीर्ष अदालत का वह फैसला पूरी तरह से अलग तथ्यों पर आधारित था। वह मामला हिंदू उत्तराधिकार कानून की धारा 25 से संबंधित था, जो संपत्ति के मूल स्वामी की हत्या करने वाले व्यक्ति को उत्तराधिकार से अयोग्य ठहराती है। इसके उलट, मौजूदा मामला धारा 24 और विधवा के पुनर्विवाह से जुड़ा है। न्यायाधीश ने कहा कि उस संदर्भ के फैसले को इस मामले के तथ्यों पर लागू नहीं किया जा सकता।

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हाईकोर्ट ने इस तथ्य को दर्ज किया कि वर्तमान मामले में विधवा ने संपत्ति पर कोई दावा नहीं किया था और कानून के तहत अयोग्यता केवल उसी पर लागू होती थी, उसकी संतान पर नहीं। अदालत ने याचिकाकर्ता की इस दलील को पूरी तरह खारिज कर दिया कि विधवा के पुनर्विवाह के आधार पर संपत्ति अन्य सह-काश्तकारों के पास लौट जाएगी और बेटी को उसके कानूनी अधिकार से बेदखल कर दिया जाएगा।

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