राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर पीठ ने फर्जी वकील बनकर अदालती कार्यवाही में पेश होने के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया है। जस्टिस रवि चिराानिया की एकलपीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत राज्य बार काउंसिल में औपचारिक पंजीकरण कराए बिना किसी भी व्यक्ति को अदालतों में वकालत करने या खुद को वकील के तौर पर पेश करने की अनुमति नहीं दी जा सकती। कोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका खारिज करते हुए उस पर 50,000 रुपये का जुर्माना (कॉस्ट) भी लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता सुरेंद्र सिंह (उम्र 40 वर्ष), निवासी डीडवाना-कुचामन, ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 528 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। इस याचिका में मकराना थाने में बीएनएसएस, 2023 की धारा 319(2) के तहत 31 मई 2025 को दर्ज एफआईआर संख्या 180/2025 को रद्द करने की मांग की गई थी।
एफआईआर के अनुसार, सुरेंद्र सिंह अधिवक्ता न होने के बावजूद निचली अदालत के समक्ष कुछ मामलों में वकील के तौर पर पेश हुआ और विभिन्न मुकदमों में दस्तावेज भी दाखिल किए। जब यह मामला संबंधित अदालतों के संज्ञान में आया, तब एक अवसर पर निचली अदालत में पेशी के दौरान साथी अधिवक्ताओं ने उसे पकड़ने की कोशिश की। हालांकि, वह कोर्ट परिसर की चारदीवारी फांदकर मौके से भागने में सफल रहा। इसके बाद अमरा राम की शिकायत पर उसके खिलाफ यह आपराधिक मामला दर्ज किया गया।
पक्षकारों की दलीलें
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत के समक्ष दलील दी कि उसने एफआईआर में लगाए गए आरोपों जैसा कोई अपराध नहीं किया है। वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता ने कभी भी खुद को अधिवक्ता के रूप में पेश नहीं किया और न ही अदालत में ऐसा कोई कार्य किया जो केवल एक अधिवक्ता ही कर सकता है। उन्होंने याचिकाकर्ता के कृत्यों को उचित ठहराते हुए काफी देर तक बहस की। हालांकि, जब कोर्ट का रुख सख्त नजर आया, तो याचिकाकर्ता के वकील ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पुरोहित से दोनों पक्षों के वकीलों का पक्ष सुनकर सही तथ्यों से अदालत को अवगत कराने का अनुरोध किया। दोपहर के भोजन अवकाश के बाद जब मामले की सुनवाई दोबारा शुरू हुई, तो वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पुरोहित ने अदालत को बताया कि दोनों पक्षों को सुनने के बाद उनका भी यही मानना है कि यह याचिका जुर्माने के साथ खारिज किए जाने योग्य है।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
मामले के तथ्यों, वकीलों की दलीलों और एफआईआर में दर्ज विवरणों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने वास्तव में वकील न होते हुए भी न्यायिक कार्यवाही में खुद को अधिवक्ता के रूप में पेश किया और दस्तावेज दाखिल किए। पीठ ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा:
“जब तक कोई व्यक्ति एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के प्रावधानों के अनुसार संबंधित राज्य बार काउंसिल में विधिवत नामांकित नहीं हो जाता, तब तक किसी भी व्यक्ति को अधिवक्ता के रूप में वकालत करने या खुद को अधिवक्ता के रूप में प्रस्तुत करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
इसके अलावा, सुनवाई के दौरान याचिका वापस लेने के प्रयास पर अदालत ने टिप्पणी की:
“जहां तक वर्तमान मामले का संबंध है, इस अदालत द्वारा की गई टिप्पणियों को देखते हुए याचिकाकर्ता के विद्वान वकील ने वर्तमान याचिका को वापस लेने की प्रार्थना की। यह आचरण आक्षेपित एफआईआर में लगाए गए आरोपों की और अधिक पुष्टि करता है।”
अदालत का निर्णय
अदालत ने कहा कि इन तथ्यों के मद्देनजर वह बीएनएसएस की धारा 528 के तहत अपनी अंतर्निहित शक्तियों का प्रयोग करने के पक्ष में नहीं है। नतीजतन, हाईकोर्ट ने याचिका को 50,000 रुपये के जुर्माने के साथ खारिज कर दिया।
अदालत ने याचिकाकर्ता को एक महीने के भीतर जुर्माने की राशि ‘राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट क्लर्क्स एसोसिएशन’ के बैंक खाते में जमा कराने का निर्देश दिया है। मामले को अनुपालन रिपोर्ट के लिए 6 अक्टूबर 2026 को सूचीबद्ध किया गया है।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: सुरेंद्र सिंह बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य
वाद संख्या: एस.बी. क्रिमिनल मिसलेनियस (पिटीशन) संख्या 4744/2025
पीठ: जस्टिस रवि चिराानिया
निर्णय की तिथि: 25/08/2026

