इच्छाधीन पार्टनरशिप के विघटन पर अलग होने वाला पार्टनर संपत्तियों के मौजूदा बाजार मूल्य में हिस्सेदारी का हकदार, विघटन की तारीख के मूल्य पर नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी इच्छाधीन पार्टनरशिप (पार्टनरशिप एट विल) के विघटन पर अलग होने वाला पार्टनर या उसका कानूनी वारिस फर्म की संपत्तियों के वास्तविक बाजार मूल्य अथवा सार्वजनिक नीलामी से प्राप्त राशि में से अपने आनुपातिक हिस्से का हकदार है। कोर्ट ने कहा कि पार्टनर का यह अधिकार विघटन की तारीख पर आंकी गई पुरानी कीमत तक सीमित नहीं किया जा सकता। जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 की धारा 46 और 48 (धारा 7 और 43 के संदर्भ में) के तहत दशकों पुराने विवाद का निपटारा करते हुए निरंतर भागीदार रहे पार्टनर्स की अपील खारिज कर दी। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने हैदराबाद के बेगमपेट स्थित प्राइम लैंड की सार्वजनिक नीलामी कर मृतक पार्टनर के कानूनी प्रतिनिधि को उसका 25 प्रतिशत हिस्सा वितरित करने के हाईकोर्ट के आदेश को पूरी तरह बरकरार रखा।

मामले की पृष्ठभूमि

वर्ष 1964 में रेलवे निर्माण कार्यों के ठेके लेने के उद्देश्य से ‘मेसर्स विराज कंस्ट्रक्शंस’ नाम से एक पार्टनरशिप फर्म का गठन किया गया था। 31 दिसंबर 1964 को निष्पादित पार्टनरशिप डीड के तहत यह स्पष्ट था कि यह एक इच्छाधीन भागीदारी (पार्टनरशिप एट विल) थी। 13 दिसंबर 1968 को सभी भागीदारों की सहमति से एक नए भागीदार को शामिल करते हुए नई डीड बनाई गई, जिसमें कासिरेड्डी लक्ष्मी नारायण रेड्डी (मूल वादी और वर्तमान प्रतिवादी संख्या 1 के पिता) का लाभ-हानि में 25 प्रतिशत हिस्सा तय किया गया, जबकि अपीलकर्ता संख्या 1 वल्लप्पारेड्डी सुमित्रा रेड्डी का हिस्सा 17 प्रतिशत था। इसी व्यापार के दौरान फर्म के नाम पर बेगमपेट, हैदराबाद में सर्वे नंबर 28/1, 28/2 और 28/3 के तहत 3.27 गुंटा जमीन खरीदी गई।

कुछ भागीदारों के प्रस्ताव पर लक्ष्मी नारायण रेड्डी ने 22,500 रुपये के प्रॉमिसरी नोट और खातों के निपटारे के आश्वासन पर 1 अप्रैल 1970 से रिटायर होने की सहमति दी। इसके लिए 17 जुलाई 1970 को एक प्रॉमिसरी नोट भी निष्पादित हुआ। जब रकम नहीं चुकाई गई, तो उन्होंने वर्ष 1975 में नेल्लोर की अदालत में वसूली का मुकदमा (ओ.एस. संख्या 128/1975) दायर किया। अन्य भागीदारों ने इसका विरोध करते हुए रुख अपनाया कि फर्म विघटित नहीं हुई है और लक्ष्मी नारायण रेड्डी ने कभी रिटायरमेंट नहीं लिया, बल्कि वे भागीदार बने हुए हैं। 4 मई 1979 को नेल्लोर अदालत ने इस आधार पर वाद खारिज कर दिया कि फर्म का अस्तित्व बना हुआ है और वे रिटायर नहीं हुए थे। हाईकोर्ट में दायर अपील 2 नवंबर 1983 को वापस ले ली गई, जिससे यह निष्कर्ष अंतिम हो गया कि वे फर्म के भागीदार बने रहे।

इसके बाद, 15 अक्टूबर 1983 को लक्ष्मी नारायण रेड्डी ने सभी भागीदारों को कानूनी नोटिस भेजकर इच्छाधीन पार्टनरशिप को भंग करने, खातों का विवरण (रेंडिशन ऑफ अकाउंट्स) देने और फर्म की संपत्तियों व मुनाफे में अपना हिस्सा देने की मांग की। कोई जवाब न मिलने पर उन्होंने सिटी सिविल कोर्ट, हैदराबाद में ओ.एस. संख्या 1601/1983 दायर किया। 6 नवंबर 1995 को ट्रायल कोर्ट ने एक प्रारंभिक डिक्री (प्रारंभिक फैसला) पारित कर उनका 25 प्रतिशत हिस्सा घोषित किया। अपील में हाईकोर्ट ने 28 मार्च 2001 को इस डिक्री में संशोधन करते हुए माना कि पार्टनरशिप अधिनियम की धारा 43 के तहत फर्म नोटिस प्राप्ति के बाद 18 अक्टूबर 1983 को विघटित हो गई थी, और प्रतिवादी 18 अक्टूबर 1983 तक के खातों का विवरण 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ देने के लिए उत्तरदायी हैं।

अंतिम डिक्री की कार्यवाही के दौरान अदालत ने एक एडवोकेट कमिश्नर को बेगमपेट स्थित जमीन का कब्जा लेने का निर्देश दिया। अपीलकर्ताओं ने लगातार यह तर्क दिया कि वादी का हिस्सा 18 अक्टूबर 1983 की पुरानी कीमत तक ही सीमित है और जमीन की बिक्री का विरोध किया। हालांकि, मुकदमेबाजी के एक दौर में हाईकोर्ट ने 30 जनवरी 2009 को स्पष्ट किया था:

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“उपरोक्त धारा की भाषा बिल्कुल स्पष्ट है कि अलग होने वाला पार्टनर तीसरे पक्षों की देनदारियों को चुकाने के बाद वितरण के लिए उपलब्ध अन्य स्रोतों के अलावा संपत्तियों में से भी अपने लाभ का हिस्सा पाने का हकदार है। जब अन्य भागीदारों द्वारा प्रस्तुत खातों के सत्यापन पर लाभ निर्धारित करने के लिए वादी के पक्ष में एक प्रारंभिक डिक्री हो जाती है, तो फर्म की चल और अचल संपत्तियों का मूल्य निर्धारित किया जाना चाहिए और यदि बाद का पार्टनरशिप व्यवसाय चलाने वाले अन्य पार्टनर वादी के हिस्से का भुगतान करने के लिए तैयार हैं, तो कोई समस्या नहीं होगी। अन्यथा, संपत्तियों को बिक्री के लिए लाया जाना चाहिए और बिक्री से प्राप्त राशि को पार्टनरशिप फर्म में उनके हिस्से के अनुसार आनुपातिक रूप से वितरित किया जाना चाहिए।”

जब अपीलकर्ताओं ने निर्धारित मूल्य का भुगतान नहीं किया, तो वादी ने जमीन की नीलामी के लिए आवेदन किया। ट्रायल कोर्ट ने 28 अप्रैल 2010 को यह अर्जी खारिज कर दी, लेकिन मूल वादी के निधन के बाद उनके कानूनी प्रतिनिधि के. रंगनाध रेड्डी द्वारा दायर रिवीजन याचिका (सीआरपी संख्या 1554/2011) में हाईकोर्ट ने 9 अप्रैल 2012 को इस आदेश को पलट दिया। हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि पक्षकार दो महीने में आपसी समझौते पर नहीं पहुंचते हैं, तो एडवोकेट कमिश्नर सार्वजनिक नीलामी के जरिए जमीन बेचकर प्राप्त राशि का 25 प्रतिशत हिस्सा वादी के वारिस को सौंपे। अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट के इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वकील अनंग भट्टाचार्य ने दलील दी कि किसी भागीदार की पहल पर विघटित हुई इच्छाधीन पार्टनरशिप में अलग होने वाला पार्टनर केवल विघटन की तारीख (18 अक्टूबर 1983) पर आंके गए संपत्ति मूल्य का ही हकदार होता है, न कि बाद के किसी मूल्यांकन या नीलामी का। उन्होंने तर्क दिया कि प्रारंभिक डिक्री में निर्धारित कट-ऑफ तारीख खातों के अंतिम निपटारे के लिए थी और देरी की भरपाई के लिए ब्याज का प्रावधान किया गया था। उनका कहना था कि 1983 में फर्म को भंग करने वाला और उसके बाद व्यवसाय से पूरी तरह अलग रहने वाला कोई भी पार्टनर बाद में संपत्ति के मूल्यों में हुई भारी वृद्धि का अनुचित लाभ नहीं उठा सकता। उन्होंने अपने पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के अद्दंकी नारायणप्पा बनाम भास्कर क्रिष्टप्पा, पामूरू विष्णु विनोद रेड्डी बनाम चिल्लाकुरु चंद्रशेखर रेड्डी और मद्रास हाईकोर्ट के एन. मुहम्मद हुसैन साहिब बनाम एस.एन. अब्दुल गफूर साहिब फैसलों पर भरोसा जताया।

दूसरी ओर, प्रतिवादी (मूल वादी के कानूनी प्रतिनिधि) के वकील ने कहा कि अपीलकर्ताओं की आपत्तियों का पहले ही न्यायिक निपटारा हो चुका है और वह आदेश अंतिम रूप ले चुका है। पूर्ववर्ती कार्यवाही में सिटी सिविल कोर्ट ने 25 जुलाई 2006 को स्पष्ट कर दिया था कि वादी के अधिकार अंतिम डिक्री पारित होने तक बने रहते हैं और वे 18 अक्टूबर 1983 की तिथि पर बंधे नहीं हैं। इस निष्कर्ष के खिलाफ अपीलकर्ताओं की रिवीजन और स्पेशल लीव पिटीशन (एसएलपी) सुप्रीम कोर्ट द्वारा 5 जनवरी 2007 को खारिज की जा चुकी थी। प्रतिवादी ने तर्क दिया कि 1983 की कट-ऑफ तारीख केवल परिचालन लाभ-हानि के लिए थी, जबकि धारा 46 और 48 के तहत संपत्ति की वसूली और वितरण का अधिकार अंतिम डिक्री तक जारी रहता है।

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सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय भागीदारी अधिनियम के अध्याय 6 के प्रावधानों, विशेष रूप से धारा 39, 40, 43, 44, 46, 47 और 48 का धारा 7 के साथ गहन विश्लेषण किया। कोर्ट ने करुमुथु त्यागराजन चेट्टियार बनाम ई.एम. मुथप्पा चेट्टियार और एम.ओ.एच. उदुमान बनाम एम.ओ.एच. असलम मामलों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि इच्छाधीन पार्टनरशिप का अस्तित्व पूरी तरह से भागीदारों की इच्छा पर निर्भर करता है और कोई भी भागीदार लिखित नोटिस देकर इसे समाप्त कर सकता है।

पीठ ने अपीलकर्ताओं द्वारा उद्धृत न्यायिक दृष्टांतों पर विचार करते हुए कहा:

  • एन. मुहम्मद हुसैन साहिब मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने तय किया था कि विघटन पर खातों का निपटारा काल्पनिक न होकर वास्तविक होना चाहिए, यानी संपत्तियों को नकदी में बदला जाना चाहिए। वहां विघटन की तिथि का बाजार मूल्य इसलिए लागू हुआ था क्योंकि वह निश्चित अवधि की पार्टनरशिप थी।
  • अद्दंकी नारायणप्पा में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने माना था कि पार्टनरशिप की संपत्ति में भागीदार का हिस्सा नकदी के रूप में देखा जाना चाहिए, जो सभी देनदारियों के निपटारे और संपत्तियों की वसूली के बाद प्राप्त अनुपात को दर्शाता है।
  • पामूरू विष्णु विनोद रेड्डी में सेवानिवृत्ति (रिटायरमेंट) की तारीख को मूल्यांकन का आधार इसलिए माना गया था क्योंकि भागीदार अपना हिस्सा बेचकर अलग हो चुका था और नई फर्म उसके बिना चल रही थी।
  • गुरु नानक इंडस्ट्रीज बनाम अमर सिंह में शीर्ष अदालत की तीन जजों की पीठ ने पार्टनर की सेवानिवृत्ति (धारा 37) और फर्म के विघटन (धारा 48) के बीच का अंतर स्पष्ट किया था, जिसमें कहा गया कि विघटन की स्थिति में खातों का निपटारा धारा 48 के तहत अनिवार्य है।
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जस्टिस भुइयां ने रेखांकित किया कि अपीलकर्ताओं द्वारा पेश किया गया कोई भी फैसला वर्तमान मामले जैसी विशिष्ट परिस्थितियों से संबंधित नहीं है, जहां फर्म के विघटन के बावजूद शेष भागीदारों ने पूर्ववर्ती फर्म की जमीन को कानूनी रूप से खरीदे बिना अपने कब्जे में बनाए रखा। कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष को सही ठहराया कि विघटन पर पार्टनर का अधिकार दोहरा होता है: पहला, विघटन की तारीख (18 अक्टूबर 1983) तक के व्यावसायिक लाभ-हानि का हिसाब पाने का अधिकार, और दूसरा, धारा 48 के तहत संपत्तियों के लिक्विडेशन से बची संपत्ति में अपना आनुपातिक हिस्सा पाने का अधिकार।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा:

“संपत्ति, यानी विचाराधीन भूमि, पूर्ववर्ती पार्टनरशिप मेसर्स विराज कंस्ट्रक्शंस की है। नई पार्टनरशिप उक्त विचाराधीन भूमि को केवल पूर्ववर्ती पार्टनरशिप से खरीदकर ही अपने पास रख सकती थी, जो कि नहीं किया गया। इसलिए, नई पार्टनरशिप द्वारा विचाराधीन भूमि को अपने पास रखना अवैध है। इसके अलावा, यदि इसे आज उस मूल्य पर बेचा जाना है जो 18.10.1983 को प्रचलित था, तो इससे वादी को गंभीर नुकसान होगा और यह उसके साथ घोर अन्याय होगा, साथ ही यह पूरी तरह से अव्यावहारिक प्रस्ताव भी होगा।”

पीठ ने आगे जोड़ा कि सभी भागीदार आनुपातिक रूप से लाभ और अवशेष के हकदार हैं। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि अपीलकर्ताओं के पास नीलामी प्रक्रिया में भाग लेकर खुद उस जमीन को खरीदने का विकल्प हमेशा खुला था, जिसके बाद प्राप्त धनराशि को सभी पूर्व साझेदारों में उनके हिस्से के अनुपात में बांटा जा सकता था।

अदालत का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के 9 अप्रैल 2012 के आदेश में कोई त्रुटि या अनियमितता न पाते हुए अपीलकर्ताओं की सिविल अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने पूर्ववर्ती सभी अंतरिम स्थगन आदेशों को समाप्त कर दिया और सभी पक्षों तथा एडवोकेट कमिश्नर को हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया। मामले में किसी भी पक्ष पर कोई हर्जाना (कॉस्ट) नहीं लगाया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: वी. सुमित्रा रेड्डी एवं अन्य बनाम के. रंगनाध रेड्डी एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 8167/2017
पीठ: जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
निर्णय की तिथि: 09 सितंबर, 2026

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