दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 2011 में राजौरी गार्डन स्थित एक रेस्टोरेंट में लगी भीषण आग के बीमा क्लेम मामले में सार्वजनिक क्षेत्र की साधारण बीमा कंपनी न्यू इंडिया एश्योरेंस को 51.12 लाख रुपये और ब्याज चुकाने का आदेश दिया है। आयोग ने पाया कि बीमा कंपनी नुकसान के आकलन के दौरान की गई भारी कटौतियों का कोई संतोषजनक आधार या हिसाब पेश करने में पूरी तरह असमर्थ रही।
आयोग की अध्यक्ष न्यायमूर्ति संगीता ढींगरा सहगल और सदस्य बिमला कुमारी की पीठ ने ‘मैसर्स तांबा इंडियन कुजीन’ के प्रोप्राइटर वरुण अग्रवाल की शिकायत पर 25 अगस्त को यह फैसला सुनाया। पीठ ने बीमा कंपनी के आकलन और अग्रवाल को पहले किए गए आंशिक भुगतानों की पड़ताल करते हुए कहा कि सर्वे रिपोर्ट पर निर्भर रहने के अलावा विपक्षी पक्ष ने ऐसा कोई संतोषजनक स्पष्टीकरण या गणना प्रस्तुत नहीं की, जिससे यह साबित हो सके कि उसके द्वारा आंकी गई राशि पॉलिसी के तहत कंपनी की अंतिम देनदारी थी।
मुआवजे और ब्याज का निर्धारण
आयोग ने 68.80 लाख रुपये के कुल देय नुकसान में से पूर्व में जारी अंतरिम राशि को समायोजित करते हुए 51.12 लाख रुपये की अंतिम देनदारी तय की। पीठ ने निर्देश दिया कि न्यू इंडिया एश्योरेंस को इस शेष राशि पर आग लगने की तारीख 4 मई 2011 से लेकर इस वर्ष 25 अगस्त तक 6 फीसदी प्रति वर्ष की दर से साधारण ब्याज देना होगा। इसके अलावा रेस्टोरेंट मालिक को मानसिक प्रताड़ना और उत्पीड़न के एवज में 1 लाख रुपये तथा अदालती खर्च के रूप में 50,000 रुपये का भुगतान करने का भी आदेश दिया गया है।
75 फीसदी मूल्यह्रास लगाने पर आयोग की कड़ी टिप्पणी
यह मामला 4 मई 2011 को राजौरी गार्डन स्थित रेस्टोरेंट में लगी भीषण आग से जुड़ा है, जिसमें फर्नीचर, फिक्स्चर, फिटिंग, बिजली के उपकरण और व्यापारिक स्टॉक समेत सारा सामान जलकर नष्ट हो गया था। यह प्रतिष्ठान न्यू इंडिया एश्योरेंस से ‘स्टैंडर्ड फायर एंड स्पेशल पेरिल्स पॉलिसी’ के तहत 1 करोड़ रुपये की बीमित राशि से सुरक्षित था। घटना के संबंध में पुलिस और अग्निशमन विभाग ने 17 मई 2011 को अपनी रिपोर्ट जारी की थी। उसी दिन बीमा कंपनी को भी सूचना दी गई, जिसने निरीक्षण के लिए सर्वेक्षक नियुक्त किया।
अग्रवाल ने आयोग के समक्ष स्पष्ट किया कि आग में उनके मूल खरीद बिल जल गए थे, जिसके बाद उन्होंने आपूर्तिकर्ताओं से प्रमाणित बिल (सर्टिफाइड इनवॉइस) प्राप्त कर सर्वेक्षक को उपलब्ध कराए थे। इसके बावजूद लाइसेंस प्राप्त सर्वेक्षक अदिति कंसल्टेंट्स प्राइवेट लिमिटेड ने संपत्ति के पुनरुद्धार (रिइंस्टेटमेंट बेसिस) के बजाय बाजार मूल्य (मार्केट वैल्यू बेसिस) के आधार पर नुकसान आंका। साथ ही, मूल बिलों से मिलान न होने की दलील देकर नष्ट हुई सामग्री पर 75 फीसदी तक की भारी कटौती (मूल्यह्रास) लागू कर दी।
बीमा कंपनी ने 30 मार्च 2012 को 16,88,995 रुपये और 27 जुलाई 2012 को 78,895 रुपये का भुगतान किया। कंपनी का दावा था कि सर्वेक्षक ने अंतिम देय नुकसान 7,16,707 रुपये तय किया था और यह रकम पूर्ण एवं अंतिम निपटारे के तौर पर दी जा चुकी थी, इसलिए सेवा में कोई कमी नहीं रही। इसके विपरीत, अग्रवाल का आरोप था कि बीमा कंपनी ने कोई भी राशि जारी करने से पहले उनसे खाली डिस्चार्ज वाउचर और अन्य कागजातों पर हस्ताक्षर करवाए तथा पॉलिसी की धारा 9 की अनदेखी की, जो क्षतिग्रस्त संपत्ति के प्रतिस्थापन या पुनर्निर्माण से संबंधित है।
बीमा कंपनी की सभी आपत्तियां खारिज
आयोग ने बीमा कंपनी की इस प्राथमिक आपत्ति को खारिज कर दिया कि प्रतिष्ठान के व्यावसायिक होने के कारण अग्रवाल उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत ‘उपभोक्ता’ नहीं हैं। पीठ ने स्पष्ट किया कि भले ही यह पॉलिसी होटल, बार और रेस्टोरेंट से संबंधित थी, लेकिन शिकायतकर्ता इसी व्यवसाय से अपनी आजीविका कमा रहे थे, इसलिए उनका दावा पूरी तरह विचारणीय है।
सेवा में कमी के बिंदु की समीक्षा करते हुए आयोग ने पाया कि सर्वे रिपोर्ट में आग को ही नुकसान का प्रत्यक्ष कारण माना गया था और अग्रवाल द्वारा पॉलिसी के किसी नियम, शर्त या वारंटी के उल्लंघन का कोई साक्ष्य नहीं मिला। पीठ ने जोर देकर कहा कि पॉलिसी में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो मूल बिल उपलब्ध न होने और आपूर्तिकर्ताओं के प्रमाणित बिल दिए जाने पर 75 फीसदी कटौती करने की अनुमति देता हो। इसके आधार पर आयोग ने कटौती को अनुचित ठहराते हुए रेस्टोरेंट संचालक के पक्ष में आदेश पारित किया।

