सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी डेवलपर को ‘जीरो पीरियड पॉलिसी’ का लाभ सिर्फ इस आधार पर नहीं नकारा जा सकता कि आवंटित भूखंड तक उसकी किसी तरह की थोड़ी-बहुत पहुंच मौजूद थी, खासकर तब जब संबंधित विकास प्राधिकरण स्वीकृत योजना के अनुसार निर्धारित और पर्याप्त संपर्क मार्ग उपलब्ध कराने में विफल रहा हो। जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी (नोएडा) द्वारा दायर सिविल अपीलों को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने नोएडा प्राधिकरण को डेवलपर को जीरो पीरियड का लाभ देने, दंडात्मक ब्याज हटाकर बकाये की नए सिरे से गणना करने और संशोधित बिल्डिंग प्लान को मंजूरी देने का निर्देश दिया था।
मामले की पृष्ठभूमि
नोएडा प्राधिकरण ने 22 सितंबर 2011 को बुनियादी ढांचे के विकास के तहत वाणिज्यिक भूखंडों के आवंटन की योजना निकाली थी। इस प्रक्रिया में मेसर्स सनशाइन ट्रेड टॉवर प्राइवेट लिमिटेड को सफल बोलीदाता चुना गया और 11 जनवरी 2012 को सेक्टर 94, नोएडा स्थित प्लॉट संख्या 5-ए के लिए 1,33,86,63,730 रुपये के कुल प्रतिफल पर लीज डीड निष्पादित की गई। उसी दिन कब्जा भी सौंप दिया गया। 6 मार्च 2012 को नोएडा द्वारा स्वीकृत साइट प्लान के अनुसार, इस भूखंड के पूर्व दिशा में 45 मीटर चौड़ी फ्रंट रोड और उत्तर दिशा में 24 मीटर चौड़ी साइड रोड प्रस्तावित थी। लीज डीड की शर्तों के तहत डेवलपर को इस भूखंड पर शॉपिंग मॉल, शोरूम, रिटेल आउटलेट, होटल, रेस्तरां और कार्यालयों जैसे उपयोगों के लिए एक बड़ा वाणिज्यिक परिसर विकसित करना था।
हालांकि, 17 सितंबर 2013 को राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने ओखला पक्षी अभयारण्य के 10 किलोमीटर के दायरे में सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगाने का अंतरिम आदेश पारित कर दिया (अमित कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य), जिसके चलते निर्माण कार्य अचानक ठप हो गया। केंद्र सरकार द्वारा 19 अगस्त 2015 को पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र से संबंधित अधिसूचना जारी किए जाने के बाद ही यह कानूनी पाबंदी हटी।
परियोजनाओं में आ रही अड़चनों और निर्माण कार्य रुकने की समस्याओं को देखते हुए नोएडा प्राधिकरण ने 28 मार्च 2016 को ‘जीरो पीरियड पॉलिसी’ लागू की। इस नीति के क्लॉज 5 में प्रावधान किया गया:
“यदि किसी भूमि का कब्जा दे दिया गया है और लीज डीड का निष्पादन भी हो चुका है, लेकिन आवंटित भूमि तक कोई पहुंच मार्ग नहीं है जिसके कारण आवंटित भूमि पर निर्माण/विकास संभव नहीं है।”
डेवलपर ने एनजीटी की रोक और मुख्य पहुंच मार्ग उपलब्ध न होने के आधार पर जीरो पीरियड लाभ के लिए आवेदन किया। नोएडा ने एनजीटी की रोक की अवधि के लिए आंशिक राहत तो दे दी, लेकिन सड़क न होने के आधार पर लाभ देने से इनकार कर दिया।
इसके बाद तैयार की गई कई आधिकारिक रिपोर्टों—जिनमें 14 फरवरी 2019 की तहसीलदार रिपोर्ट, 22 अक्टूबर 2020 का उत्तर प्रदेश भू-संपदा विनियामक प्राधिकरण (यूपीरेरा) का आदेश और 20 फरवरी 2023 की डिप्टी कलेक्टर की रिपोर्ट शामिल हैं—ने साफ किया कि 45 मीटर चौड़ी सड़क की जमीन ग्राम छलेरा बांगर के खसरा नंबर 684 में आती है। यह राजस्व रिकॉर्ड में ‘आबादी’ दर्ज है, ग्रामीणों द्वारा पूरी तरह घिरी हुई है, नोएडा प्राधिकरण द्वारा कभी अधिग्रहित नहीं की गई और किसानों की आपसी सहमति के बिना इसका अधिग्रहण संभव नहीं है। इसके अतिरिक्त, दूसरी 24 मीटर चौड़ी सड़क का निर्माण कार्य भी नोएडा द्वारा 18 फरवरी 2020 को ही पूरा किया जा सका।
उत्तर प्रदेश नगर योजना और विकास अधिनियम, 1973 की धारा 41(3) के तहत राज्य सरकार ने निगरानी प्रक्रिया में लीज निरस्तीकरण आदेश रद्द करते हुए आंशिक राहत दी। इसके बावजूद नोएडा ने डेवलपर पर 100.39 करोड़ रुपये का डिमांड नोटिस जारी कर दिया और 24 मीटर रोड की तरफ मुख्य रुख (फ्रंटेज) बदलकर प्रस्तुत किए गए संशोधित बिल्डिंग प्लान को स्वीकृत करने से इनकार कर दिया। इसके खिलाफ डेवलपर ने इलाहाबाद हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, जिसने डेवलपर की रिट याचिकाएं स्वीकार कर लीं। इसके बाद नोएडा प्राधिकरण ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।
पक्षों की दलीलें
नोएडा प्राधिकरण की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आत्माराम एन.एस. नाडकर्णी ने दलील दी कि जीरो पीरियड पॉलिसी के क्लॉज 5 की व्याख्या बेहद सख्त और शाब्दिक रूप से की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह राहत केवल उसी स्थिति में मिल सकती है जब भूखंड तक पहुंच बिल्कुल असंभव हो, न कि केवल पसंदीदा या वैकल्पिक सड़क न होने पर। प्राधिकरण का कहना था कि डेवलपर के पास जमीन तक लगातार पहुंच थी, उसने बेसमेंट की खुदाई भी की थी और सड़क न होने की दलील केवल वित्तीय तंगी व लीज की किस्तों में चूक को छिपाने के लिए बाद में सोची गई युक्ति है।
दूसरी तरफ डेवलपर की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और मनिंदर सिंह ने दलील दी कि पूरी परियोजना का लेआउट, विपणन और स्वीकृति 45 मीटर फ्रंट रोड को ही मुख्य व्यावसायिक मुखौटा मानकर तैयार की गई थी। उन्होंने कहा कि 45 मीटर सड़क का अधिग्रहण न होने और उस पर आबादी होने से परियोजना की व्यावसायिक उपयोगिता, सेटबैक, दिशा और पूरे लेआउट पर सीधा असर पड़ा, जिससे स्वीकृत नक्शे के अनुसार निर्माण कार्य जारी रखना कानूनी और व्यावहारिक रूप से असंभव हो गया। उन्होंने स्पष्ट किया कि बेसमेंट की शुरुआती खुदाई का यह मतलब कतई नहीं है कि परियोजना को पूरा किया जा सकता था।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 के उद्देश्यों और विकास योजनाओं की मूल भावना पर विचार किया। पीठ ने टिप्पणी की कि बुनियादी ढांचे के विकास में निजी क्षेत्र की भागीदारी के लिए विनियामक निश्चितता और एक सुरक्षित व अनुकूल माहौल होना अनिवार्य है।
जीरो पीरियड पॉलिसी के क्लॉज 5 की व्याख्या पर विचार करते हुए अदालत ने नोएडा के अत्यधिक संकीर्ण और शाब्दिक रुख को खारिज कर दिया:
“विस्तृत विचार के बाद, हमारी राय है कि जीरो पीरियड पॉलिसी जैसी नीति के प्रावधानों की व्याख्या किसी कानून (स्टैच्यू) की धाराओं की तरह नहीं की जानी चाहिए। किसी नीति के प्रावधानों की व्याख्या करते समय अदालतों को सूक्ष्म (माइक्रो) और व्यापक (मैक्रो) दोनों दृष्टिकोणों पर विचार करना जरूरी है। अदालत को संबंधित क्लॉज के उद्देश्य पर विचार करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि व्याख्या से नीति के व्यापक लक्ष्यों की पूर्ति हो सके। इस परिप्रेक्ष्य में, हमारी राय है कि जीरो पीरियड पॉलिसी के क्लॉज 5 का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि डेवलपर को आवंटित भूखंड तक सुगम, प्रभावी और वैध पहुंच मिले ताकि वह निर्माण कार्य आगे बढ़ा सके। इस क्लॉज की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती कि जीरो पीरियड पॉलिसी का लाभ उस स्थिति में छीन लिया जाए जहां डेवलपर को भूखंड तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा हो और वह किसी तरह निर्माण कार्य जारी रखने की जद्दोजहद में हो।”
पीठ ने कड़े शब्दों में कहा कि नोएडा प्राधिकरण कामचलाऊ या अधूरी पहुंच की आड़ लेकर अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता:
“इसलिए, यह तर्क कि डेवलपर के पास कुछ पहुंच उपलब्ध थी, संबंधित भूखंड तक सुगम, कुशल और वैध पहुंच प्रदान करने के अपने दायित्व से नोएडा प्राधिकरण को छूट देने का आधार नहीं बन सकता। यदि नोएडा प्राधिकरण के कारणों से पर्याप्त पहुंच उपलब्ध नहीं कराई गई, तो जीरो पीरियड पॉलिसी का लाभ इस आधार पर कतई नकारा नहीं जा सकता कि कुछ पहुंच उपलब्ध थी।”
व्यावसायिक परियोजनाओं में एलिवेशन और फ्रंट रोड के महत्व को रेखांकित करते हुए अदालत ने कहा:
“रियल एस्टेट में ऊंचाई (एलिवेशन) और मुखौटा (फ्रंटेज) सिर्फ स्थापत्य सौंदर्य का विषय नहीं हैं; वे व्यावसायिक मूल्य और विपणन क्षमता के महत्वपूर्ण निर्धारक हैं। किसी इमारत की ऊंचाई उसका पहला प्रभाव बनाती है, जबकि उसका फ्रंटेज यह तय करता है कि वह सड़क, ग्राहकों और आसपास के शहरी परिवेश के सामने कितनी प्रमुखता से प्रस्तुत होती है… स्पष्ट, पूर्वानुमेय और व्यावसायिक रूप से व्यावहारिक मानक ही ठोस निवेश, प्रभावी विकास और टिकाऊ रियल एस्टेट मूल्य सृजन की नींव तैयार करते हैं।”
अदालत ने पाया कि पांच स्वतंत्र आधिकारिक रिपोर्टों से यह पूरी तरह साबित हो चुका है कि 45 मीटर चौड़ी सड़क गैर-अधिग्रहित, आबादी से युक्त और अनुपलब्ध थी। जब मुख्य सड़क उपलब्ध नहीं थी, तो डेवलपर को 24 मीटर सड़क की तरफ अपनी मुख्य एंट्री और फ्रंटेज को मोड़ना पड़ा, जिससे सेटबैक और योजना के मानकों में बदलाव अनिवार्य हो गया। इन परिस्थितियों में, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि संशोधित नक्शे को पास न करने का नोएडा का अड़ियल रुख पूरी तरह अनुचित और कानूनन टिकने योग्य नहीं है।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा प्राधिकरण की सभी सिविल अपीलों को खारिज करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस निर्देश को सही ठहराया, जिसमें नोएडा को जीरो पीरियड लाभ देते हुए बकाये की नई गणना करने, दंडात्मक ब्याज से छूट देने और संशोधित बिल्डिंग प्लान को मंजूरी देने का आदेश दिया गया था।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने डेवलपर की ओर से दिए गए उस वचन (अंडरटेकिंग) को भी रिकॉर्ड पर लिया कि संशोधित साइट प्लान स्वीकृत होने की तारीख से चार साल के भीतर परियोजना का निर्माण कार्य पूरा कर लिया जाएगा और शेष बकाया राशि का भुगतान आठ किस्तों में किया जाएगा।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: न्यू ओखला इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट अथॉरिटी एवं अन्य बनाम मेसर्स सनशाइन ट्रेड टॉवर प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 10900-10902/2025
पीठ: जस्टिस पामिदिघंटम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
निर्णय की तिथि: 8 सितंबर 2026

