वर्ष 2002 के एक मादक पदार्थ मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए दोषी महिला की जेल की सजा को घटाकर उसके द्वारा पहले ही काटी जा चुकी अवधि तक सीमित कर दिया है। अदालत ने पाया कि जब्ती स्थल रेलवे लाइन के पास होने के कारण गुजरती हुई ट्रेनों के कंपन से चरस के वजन में त्रुटि होने की पूरी संभावना थी। बरामद चरस की मात्रा 105 ग्राम दर्ज की गई थी, जो ‘छोटी मात्रा’ (स्मॉल क्वांटिटी) की कानूनी सीमा से केवल पांच ग्राम अधिक थी।
जस्टिस विमल कुमार यादव ने अपने आदेश में कहा कि महिला की उस समय की पारिवारिक व व्यक्तिगत परिस्थितियों को देखते हुए उसे कठोर कारावास में रखना सुधारात्मक और तर्कसंगत न्यायिक दृष्टिकोण के विपरीत होगा। हालांकि अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा में रियायत देते हुए निर्देश दिया कि वह ट्रायल कोर्ट में दो वर्ष की अवधि के लिए 20,000 रुपये का निजी मुचलका (पर्सनल बॉन्ड) जमा करे। यह राहत एनडीपीएस (दोषियों या नशेडियों द्वारा बॉन्ड निष्पादन) नियम, 1985 के तहत दी गई है।
रेलवे ट्रैक के कंपन और खुली जगह में तौल पर अदालत की टिप्पणी
अदालत ने 7 सितंबर को पारित अपने आदेश में कहा कि जब्ती के समय जब्ती और सैंपलिंग का काम रेलवे ट्रैक के नजदीक किया गया था। यह सामान्य सी बात है कि जब भी कोई ट्रेन वहां से गुजरती है, तो ट्रैक के आसपास की जमीन में कंपन पैदा होता है। भले ही इस्तेमाल में लाया गया मैनुअल वजन कांटा पूरी तरह चालू हालत में रहा हो, फिर भी इस तरह के झटकों से वजन में कुछ गलती होने की संभावना बनी रहती है।
अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि मामले में कानूनन तय ‘छोटी मात्रा’ से केवल पांच ग्राम वजन ही अधिक निकला था, जो कि अपने आप में बेहद मामूली अंतर है। इसके साथ ही बेंच ने यह अंतर स्पष्ट किया कि किसी वैज्ञानिक या फॉरेंसिक प्रयोगशाला के नियंत्रित वातावरण में किसी चीज का वजन या परीक्षण करने और खुले अथवा असुरक्षित माहौल में वही प्रक्रिया अपनाने से मिलने वाले नतीजों में फर्क आ सकता है।
बचाव पक्ष के तर्क और पांच ग्राम के अंतर का गणित
दोषी महिला सुनीता की ओर से पेश वकील दिनेश सिंह बचगोती, कमलेश कुमार वर्मा और दीपाली सिंह ने दोषसिद्धि को चुनौती नहीं दी, बल्कि सिर्फ सजा में नरमी बरतने की मांग की। वकीलों ने दलील दी कि मौके पर इस्तेमाल किया गया तराजू मैनुअल था और मानवीय व पर्यावरणीय कारणों से पांच ग्राम का अंतर आना स्वाभाविक है।
बचाव पक्ष ने अदालत के सामने रखा कि पुलिस ने जब्त माल में से 50 ग्राम चरस का अलग पैकेट बनाकर फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (एफएसएल) भेजा था। जब एफएसएल में उस पैकेट का वजन किया गया, तो वह 52.22 ग्राम निकला। इससे साफ हुआ कि चरस जिस पॉलीथिन या रैपर में लिपटी थी, उसका वजन ही 2.22 ग्राम था। ऐसे में खुली जगह पर पहली बार वजन करते वक्त पांच ग्राम का विचलन होना पूरी तरह मुमकिन है।
इसके अलावा वकीलों ने अदालत को बताया कि घटना के समय वर्ष 2002 में सुनीता 26 साल की गरीब और अनपढ़ महिला थी। उस पर चार छोटे बच्चों, एक दिव्यांग पति और नेत्रहीन बुजुर्ग सास-ससुर की पूरी जिम्मेदारी थी।
अभियोजन का विरोध और पुराना आपराधिक रिकॉर्ड
अपर लोक अभियोजक (एपीपी) मुकेश कुमार ने सजा घटाने का कड़ा विरोध किया। राज्य सरकार की ओर से दलील देते हुए उन्होंने कहा कि महिला की आपराधिक पृष्ठभूमि पर गौर किया जाना चाहिए। अभियोजन के अनुसार सुनीता के खिलाफ 16 अन्य आपराधिक मामले दर्ज थे, जिनमें से ज्यादातर अवैध शराब से संबंधित थे। हालांकि अदालत ने वजन में तकनीकी त्रुटि की गुंजाइश और महिला की पारिवारिक बदहाली को देखते हुए उसकी सजा को काटी गई अवधि तक सीमित करने का फैसला किया।
क्या है कानून और 2002 का यह पूरा मामला
स्वापक औषधि और मनःप्रभावी पदार्थ (एनडीपीएस) अधिनियम के तहत 100 ग्राम तक चरस को ‘छोटी मात्रा’ के दायरे में रखा गया है। इस श्रेणी में दोषी पाए जाने पर अधिकतम छह महीने से एक साल तक का कठोर कारावास, 10,000 रुपये तक का जुर्माना या दोनों का प्रावधान है।
मामले की शुरुआत 2 अक्टूबर 2002 को हुई थी, जब पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली कि एक महिला रेलवे लाइन फ्रेंड्स कॉलोनी के रास्ते खेड़ा गांव की तरफ चरस लेकर जाने वाली है। सूचना के आधार पर पुलिस की एक रेडिंग टीम ने जाल बिछाया और महिला को पकड़ लिया। एनडीपीएस कानून के तहत नोटिस तामील कराने के बाद जब उसकी तलाशी ली गई, तो उसके बैग में रखे एक पॉलीथिन पैकेट से 105 ग्राम चरस मिली। पुलिस ने इसमें से 50 ग्राम नमूना जांच के लिए अलग किया और बाकी सामान मालखाने में जमा कराकर एनडीपीएस कानून की धारा 20 के तहत मामला दर्ज किया था।

