विदेश में जारी घरेलू ड्राइविंग लाइसेंस के आधार पर भारत की सड़कों पर वाहन चलाने की कानूनी अनुमति नहीं मिलती। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने एक सड़क हादसे में नौ महीने की बच्ची की मौत से जुड़े मामले में यह फैसला सुनाया है। इसके साथ ही अदालत ने बीमा कंपनी के उस अधिकार को सही ठहराया, जिसके तहत वह पीड़ित परिवार को मुआवजे का भुगतान करने के बाद यह रकम वाहन चालक और कार मालिक से वसूल सकती है।
जस्टिस दीपक गुप्ता की एकल पीठ ने सात सितंबर को कार चालक की अपील खारिज करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बीमा कंपनी पहले मृत बच्ची के परिजनों को 2.49 लाख रुपये का मुआवजा अदा करेगी और बाद में पूरी राशि चालक तथा वाहन मालिक से वसूल करेगी।
अंतरराष्ट्रीय परमिट और भारतीय अनुमति का अभाव
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में रेखांकित किया कि कोई ड्राइविंग लाइसेंस अपने जारी होने वाले देश में वैध होने मात्र से किसी व्यक्ति को भारत में वाहन चलाने का अधिकार नहीं दे देता। अपीलकर्ता चालक के पास ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया स्थित प्राधिकारी द्वारा जारी लाइसेंस था, जो 11 अप्रैल 2017 तक वैध था। हालांकि, अदालत ने पाया कि जिरह के दौरान चालक ने खुद स्वीकार किया था कि उसके पास किसी भी भारतीय लाइसेंसिंग अथॉरिटी का लाइसेंस मौजूद नहीं था।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि चालक यह साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा कि उसका ऑस्ट्रेलियाई लाइसेंस भारत में विदेशी नागरिकों या अस्थायी आगंतुकों के वाहन चलाने संबंधी कानूनी प्रावधानों को पूरा करता है। कोर्ट ने दर्ज किया कि चालक न तो कोई अंतरराष्ट्रीय ड्राइविंग परमिट (आईडीपी) दिखा सका और न ही उसके पास किसी सक्षम भारतीय प्राधिकारी का सत्यापन अथवा अनुमति पत्र था। अदालत ने दो टूक कहा कि विदेश में उसी श्रेणी का वाहन चलाने की अनुमति होने के आधार पर उस लाइसेंस को भारतीय कानून के तहत वैध नहीं माना जा सकता।
हादसे की पृष्ठभूमि और ट्रिब्यूनल का फैसला
यह मामला 31 अगस्त 2015 को हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है। दुर्घटना में शामिल मोटरसाइकिल पर सवार बच्ची के पिता और एक अन्य सह-यात्री के अनुसार, पीछे से आ रही एक तेज रफ्तार कार ने ओवरटेक करने के प्रयास में उनकी मोटरसाइकिल को जोरदार टक्कर मार दी थी। इस दुर्घटना में नौ महीने की बच्ची की जान चली गई थी।
मई 2016 में मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) ने पीड़ित परिवार के पक्ष में 2.49 लाख रुपये का मुआवजा तय किया था। ट्रिब्यूनल ने कार चालक और वाहन मालिक को इसके लिए संयुक्त और अलग-अलग तौर पर जिम्मेदार ठहराया था। चालक के पास भारत में वैध ड्राइविंग लाइसेंस न होने के कारण ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी को पहले भुगतान करने और फिर चालक व मालिक से वसूली करने का निर्देश दिया था। चालक ने इसी आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी। उल्लेखनीय है कि हादसे से संबंधित आपराधिक मुकदमे में चालक पहले ही बरी हो चुका था।
अदालत के समक्ष दोनों पक्षों के तर्क
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान चालक के वकील प्रतीक महाजन ने दलील दी कि ट्रिब्यूनल ने केवल इस आधार पर ऑस्ट्रेलियाई लाइसेंस को नजरअंदाज कर भूल की कि वह भारत में जारी या सत्यापित नहीं था। बचाव पक्ष ने यह दावा भी किया कि दुर्घटना के समय उक्त व्यक्ति कार चला ही नहीं रहा था।
इसके विपरीत, बीमा कंपनी के अधिवक्ता विनोद चौधरी ने पक्ष रखा कि बिना अंतरराष्ट्रीय ड्राइविंग परमिट या भारत में मान्य आधिकारिक अनुमति के, ऑस्ट्रेलियाई घरेलू लाइसेंस किसी को भी भारत के सार्वजनिक स्थानों पर वाहन चलाने का अधिकार नहीं देता। उन्होंने अदालत का ध्यान चालक द्वारा जिरह में दी गई उस स्वीकारोक्ति की ओर भी दिलाया, जिसमें उसने भारतीय लाइसेंस न होने की बात मानी थी।
हाईकोर्ट ने चालक के इस दावे को खारिज कर दिया कि वह गाड़ी नहीं चला रहा था। अदालत ने पीड़ित बच्ची के पिता और मोटरसाइकिल सवार गवाह के बयानों पर भरोसा जताया, जिन्होंने दुर्घटनास्थल पर कार चालक की स्पष्ट पहचान की थी। अदालत ने निष्कर्ष दिया कि न तो विदेशी घरेलू लाइसेंस और न ही आपराधिक मुकदमे में बरी होना, बीमा कंपनी के वसूली अधिकार में हस्तक्षेप करने का कोई आधार बनता है।

