बॉम्बे हाईकोर्ट ने 59 वर्षीय एक विचाराधीन कैदी को मेडिकल आधार पर जमानत दे दी है। अदालत ने पाया कि हिरासत में रहने के केवल 48 दिनों के भीतर आरोपी का वजन 21 किलोग्राम घट गया, जो सामान्य परिस्थितियों में भी बेहद चिंताजनक और खतरनाक है। पीठ ने स्पष्ट किया कि आरोपी को आगे जेल या जेल अस्पताल में रखना उसकी सेहत को ऐसे मुकाम पर धकेल सकता है, जहां से सुधार मुमकिन नहीं होगा।
जस्टिस मिलिंद एन जाधव की एकल पीठ ने 7 सितंबर को यह आदेश पारित किया। अदालत ने कहा कि मुकदमे का सामना करने के लिए आरोपी का जीवित और स्वस्थ रहना जरूरी है, जिसके लिए उसे जेल की चारदीवारी से बाहर अपनी पसंद के अस्पताल या घर पर उचित देखभाल और इलाज मिलना आवश्यक है।
गंभीर बीमारियों और सर्जरी का हवाला
मामले के विवरण के मुताबिक, आरोपी को जून में आपराधिक साजिश, यौन अपराधों और महाराष्ट्र के अंधश्रद्धा विरोधी कानून के तहत दर्ज मामलों में गिरफ्तार किया गया था। गिरफ्तारी से पहले नवंबर 2025 में उसकी एक बड़ी गैस्ट्रिक सर्जरी हुई थी, जिसमें उसके पेट का 80 प्रतिशत हिस्सा निकाल दिया गया था। डॉक्टरों ने उसे सख्त तौर पर केवल तरल या अर्ध-तरल आहार लेने की सलाह दी थी।
इसके अलावा मेडिकल रिकॉर्ड से सामने आया कि वह टाइप-1 ऑटोइम्यून पेनक्रियाटाइटिस, लिवर की बीमारी, टीबी और पिट्यूटरी ग्रंथि की समस्या से भी जूझ रहा है, जिसके लिए उसे नियमित स्टेरॉयड की जरूरत होती है। गिरफ्तारी के बाद उसकी हालत बिगड़ने पर उसे पांच अलग-अलग अस्पतालों में भर्ती कराया गया। जेल अस्पताल और पुणे के ससून जनरल अस्पताल में संबंधित विशेषज्ञ डॉक्टर उपलब्ध न होने के कारण उसे 31 जुलाई को मुंबई लाकर केईएम और जेजे अस्पताल में दिखाया गया था।
जेल की स्थिति और चिकित्सा सुविधाओं पर टिप्पणी
याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील सलमान के पठान ने दलील दी कि हिरासत में तेजी से घटे वजन, तय आहार न मिल पाने और जरूरी दवाओं के अभाव के चलते उनके मुवक्किल को जेल से बाहर इलाज की सख्त दरकार है। दूसरी ओर, सहायक लोक अभियोजक सुकांत करमाकर ने जमानत याचिका का विरोध करते हुए कहा कि आरोपी की हालत न तो गंभीर है और न ही जानलेवा, तथा उसका उपचार जेल अस्पताल में ही किया जा सकता है। अभियोजन ने गिरफ्तारी को अवैध बताए जाने के दावों को भी खारिज किया।
हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि हालांकि कई बार सभी कानूनी रास्ते बंद होने पर मेडिकल जमानत का दुरुपयोग किया जाता है, लेकिन इस मामले में आरोपी की बीमारियों की पुष्टि आधिकारिक मेडिकल दस्तावेजों से होती है और अदालत में उपस्थित डॉक्टरों ने भी इसका खंडन नहीं किया है।
जस्टिस जाधव ने जेलों की भीड़भाड़ और जमीनी हकीकत का जिक्र करते हुए कहा कि जेल बैरकों या जेल अस्पतालों में बंद कैदियों को मिलने वाले इलाज और एक सामान्य नागरिक को मिलने वाली चिकित्सा सुविधा में जमीन-आसमान का गुणात्मक अंतर होता है। अदालत ने माना कि मरीज को संक्रमण मुक्त माहौल, तय खानपान और विशेषज्ञों की सतत निगरानी की जरूरत है, जो जेल में संभव नहीं है।
जांच में सहयोग की शर्तों पर रिहाई
बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपी को मेडिकल आधार पर राहत देते हुए जांच में पूरा सहयोग करने का निर्देश दिया है। शर्तों के अनुसार, आरोपी को जांच अधिकारी द्वारा मांगी गई सभी जानकारियां उपलब्ध करानी होंगी। वहीं जांच अधिकारी को भी यह छूट दी गई है कि वह पूर्व सूचना देकर आरोपी के घर या अस्पताल जाकर पूछताछ कर सकते हैं।

