सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण मामले में निर्णय दिया कि दो अलग-अलग अनुबंधों से उपजे ऐसे विवादों की सुनवाई एक ही मध्यस्थ (आर्बिट्रेटर) द्वारा की जानी चाहिए, जिनमें परस्पर दावों के समायोजन (क्रॉस-प्रोजेक्ट सेट-ऑफ) का प्रश्न शामिल हो। जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश में संशोधन किया, जो मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत पारित किया गया था। शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि पहले समझौते के विवाद के लिए नियुक्त एकमात्र मध्यस्थ ही दूसरे अनुबंध से जुड़े विवाद की भी सुनवाई करेंगी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद दो अलग-अलग परियोजनाओं के लिए ऑप्टिकल फाइबर केबल सेवाओं के संबंध में हुए दो समझौतों से जुड़ा है, जिन्हें क्रमशः “महानेट समझौता” और “टी-फाइबर समझौता” कहा गया।
प्रतिवादी, कैस्पियन इंडिया इंजीकॉन प्राइवेट लिमिटेड ने सबसे पहले महानेट समझौते के तहत दिल्ली हाईकोर्ट का रुख कर मध्यस्थता की मांग की थी। हाईकोर्ट ने 16 सितंबर 2025 को सुश्री सौम्या टंडन को एकमात्र मध्यस्थ नियुक्त किया था।
इसके बाद दोनों पक्षों के बीच टी-फाइबर समझौते को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया। इस पर मध्यस्थता एवं सुलह अधिनियम, 1996 की धारा 11 के तहत दिल्ली हाईकोर्ट में एक और आवेदन दायर किया गया। दिल्ली हाईकोर्ट ने इस दूसरे अनुबंध के विवाद के निपटारे के लिए एक अलग मध्यस्थ की नियुक्ति कर दी। हाईकोर्ट के इस आदेश को अपीलकर्ता, मैसर्स एसटीएल नेटवर्क्स लिमिटेड ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से चुनौती दी।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि टी-फाइबर समझौते के तहत उसकी एक बड़ी रिकवरी की देनदारी निकलती है। अपीलकर्ता का कहना था कि वह इस राशि को महानेट समझौते के तहत देय राशि के मुकाबले ‘क्रॉस-प्रोजेक्ट सेट-ऑफ’ (परस्पर समायोजन) के रूप में समायोजित करने का हकदार है।
अपीलकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि टी-फाइबर समझौते के तहत उसका दावा, महानेट समझौते के तहत किए गए दावे से दोगुने से भी अधिक है। इसलिए दोनों मामलों में विधिक एकरूपता बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि विवादों की सुनवाई एक ही मध्यस्थ के समक्ष हो।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वह दावों के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं कर रहा है, लेकिन प्रक्रियागत दृष्टि से यह उचित होगा कि दोनों कार्यवाहियां पहले से नियुक्त मध्यस्थ द्वारा ही संचालित की जाएं। पीठ ने टिप्पणी की:
“हम मामले के गुण-दोष में नहीं जाएंगे, लेकिन परिस्थितियों की उपयुक्तता को देखते हुए हमारा यह मानना है कि मध्यस्थता की कार्यवाही उसी मध्यस्थ द्वारा आगे बढ़ाई जानी चाहिए; हमारे अनुसार, जो मध्यस्थ पहले नियुक्त की गई थीं। अतः, 16.09.2025 को एकमात्र मध्यस्थ के रूप में नियुक्त सुश्री सौम्या टंडन ही वर्तमान विवाद में भी मध्यस्थ होंगी।”
अदालत ने यह भी साफ कर दिया कि उसने समायोजन के दावे के संबंध में कोई अंतिम निष्कर्ष नहीं निकाला है। पीठ ने कहा:
“पक्षकार मध्यस्थ के समक्ष अपनी सभी दलीलें रखने के हकदार होंगे, और हमारे इस रुख को दो अलग-अलग समझौतों के तहत किए गए दावों की मात्रा या क्रॉस-प्रोजेक्ट सेट-ऑफ के गुण-दोष पर दिया गया निर्णय न माना जाए। हमने केवल अपील में अपीलकर्ता द्वारा उठाए गए तर्कों को दर्ज किया है।”
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के विवादित आदेश में इस हद तक संशोधन किया कि दूसरे मध्यस्थ के स्थान पर सुश्री सौम्या टंडन को नियुक्त कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि दोनों पक्ष मध्यस्थ के समक्ष अपने सभी पक्ष रखने के लिए स्वतंत्र हैं। इसके साथ ही, शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि यदि कोई लंबित आवेदन हो, तो उसे खारिज माना जाए।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: मैसर्स एसटीएल नेटवर्क्स लिमिटेड बनाम कैस्पियन इंडिया इंजीकॉन प्राइवेट लिमिटेड
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 12517/2026 (उत्पन्न विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 28903/2026)
पीठ: जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन
निर्णय की तिथि: 07 सितंबर 2026

