उड़ीसा हाईकोर्ट ने कटक स्थित शैलाबाला महिला स्वायत्त कॉलेज के एक संविदा प्रयोगशाला अटेंडेंट को नियमित करने से इनकार करने वाले आदेश को खारिज कर दिया है। अदालत ने ओडिशा के उच्च शिक्षा विभाग को निर्देश दिया है कि वह कर्मचारी के नियमितीकरण के दावे पर तीन महीने के भीतर नए सिरे से फैसला करे।
7 सितंबर को इस मामले पर सुनवाई करते हुए जस्टिस मुराहरी श्री रमन ने लंबे समय से चली आ रही सेवा अनिश्चितता पर कड़ी टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि किसी कर्मचारी की उम्मीदों को दरकिनार कर और उदासीन रवैया अपनाते हुए उसे सालों तक रोजगार की अनिश्चितता में लटकाए रखना सरासर शोषण है। अदालत ने इसे कर्मचारी के सिर पर लटकी ‘डेमोकल्स की तलवार’ (खतरे की तलवार) जैसा करार दिया।
यह फैसला संतोष कुमार पात्रा की ओर से दायर याचिका पर आया है, जिसमें उन्होंने राज्य सरकार द्वारा 9 अगस्त 2019 को अपने नियमितीकरण के आवेदन को खारिज किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी।
दो दशक से अधिक की बेदाग सेवा
याचिकाकर्ता संतोष कुमार पात्रा के अनुसार वह 1 दिसंबर 2000 से कॉलेज में काम कर रहे थे, हालांकि आधिकारिक रिकॉर्ड में उनकी सेवा की शुरुआत 1 सितंबर 2005 दर्ज है। उस समय उन्हें 70 रुपये दैनिक वेतन पर चपरासी के पद पर रखा गया था। इसके बाद वह 2007 में अटेंडेंट बने और 2010 में उन्हें संविदा प्रयोगशाला अटेंडेंट बनाया गया। प्रयोगशाला के काम के अलावा उन्होंने दाखिला और परीक्षा से जुड़े प्रशासनिक कार्य भी संभाले। कॉलेज प्रशासन बिना किसी आपत्ति के लगातार उनके अनुबंध को आगे बढ़ाता रहा। आधिकारिक सेवा रिकॉर्ड को आधार मानकर हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि पात्रा 21 वर्षों से अधिक समय से बेदाग रिकॉर्ड के साथ लगातार सेवाएं दे रहे हैं।
पात्रा ने सबसे पहले अप्रैल 2017 में अपनी सेवाएं नियमित करने की मांग की थी। इसके बाद ओडिशा प्रशासनिक अधिकरण (ओएटी) ने जनवरी 2018 में अधिकारियों को उनके मामले पर विचार करने का निर्देश दिया था। हालांकि, उच्च शिक्षा विभाग ने 9 अगस्त 2019 को उनके दावे को खारिज कर दिया था।
राज्य सरकार की आपत्तियां खारिज
सरकार ने दलील दी थी कि पात्रा एक अस्थाई कर्मचारी थे और उन्हें स्व-वित्तपोषित पाठ्यक्रम से मानदेय दिया जाता था। सरकार का यह भी कहना था कि उनकी तुलना 1988 में संविदा पर नियुक्त और बाद में नियमित किए गए कर्मचारी अनम चरण नायक से नहीं की जा सकती। इसके साथ ही अधिकारियों ने 2013 और 2014 के सरकारी संकल्पों के तहत लागू आरक्षण नियमों का हवाला भी दिया था।
हाईकोर्ट ने सरकार के इन तर्कों को पूरी तरह आधारहीन बताते हुए खारिज कर दिया। जस्टिस रमन ने स्पष्ट किया कि 2013 और 2014 के आरक्षण नियम पात्रा की नियुक्ति के समय प्रभावी नहीं थे। कॉलेज ही नियुक्ति प्राधिकारी था, इसलिए नियुक्ति के समय तत्कालीन नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी भी उसी की थी।
अदालत ने जोर देकर कहा कि दो दशकों से अधिक समय तक लगातार सेवा विस्तार देने के बाद अधिकारी बाद में बने नियमों का सहारा लेकर नियमितीकरण से इनकार नहीं कर सकते। अदालत ने पाया कि पात्रा पद के लिए पूरी योग्यता रखते हैं और उन्हें मामूली तकनीकी आधार पर अनम चरण नायक से अलग नहीं माना जा सकता। हाईकोर्ट ने 2019 के आदेश को निरस्त करते हुए तीन महीने के भीतर सकारात्मक निर्णय लेने का आदेश सुनाया।

