पुलिस जांच के दौरान कराई गई पहचान कोई सारवान साक्ष्य नहीं है और यह अदालत में गवाह के कटघरे में की जाने वाली पहचान (डॉक आइडेंटिफिकेशन) का विकल्प नहीं बन सकती, यह स्पष्ट करते हुए सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की पीठ ने भारतीय दंड संहिता, 1860 (आईपीसी) और लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पोक्सो एक्ट) के तहत आजीवन कारावास की सजा काट रहे एक अभियुक्त को सभी आरोपों से बरी कर दिया। विशेष अदालत (पोक्सो), अजमेर द्वारा दी गई और राजस्थान हाईकोर्ट द्वारा बरकरार रखी गई दोषसिद्धि को खारिज करते हुए अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष हमलावर की पहचान साबित करने में पूरी तरह नाकाम रहा। इसके साथ ही मेडिकल साक्ष्य और घटना के कथित समय के बीच भी गहरा विरोधाभास पाया गया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 7 दिसंबर 2016 को अजमेर जिले के केकड़ी थाने में पांच वर्षीय बच्ची के पिता द्वारा दर्ज कराई गई रिपोर्ट से शुरू हुआ था। शिकायत के मुताबिक, 5 दिसंबर 2016 को शिकायतकर्ता की पत्नी और उनके दो बच्चे एक रिश्तेदार के घर कार्यक्रम में गए थे, जहां से बच्ची लापता हो गई। मस्जिद के लाउडस्पीकर से घोषणा कराने के बाद ग्रामीणों ने तलाश शुरू की। कुछ समय बाद दो ग्रामीण बच्ची को घर लेकर आए, जहां उसकी मां ने देखा कि उसके निजी अंगों से खून बह रहा था। बच्ची ने बताया कि एक अज्ञात लड़का उसे स्कूल के पास ले गया, झाड़ियों में धकेला, उसके साथ गलत काम किया और चिल्लाने पर मुंह दबाकर जान से मारने की धमकी देकर भाग गया।
परिवार बच्ची को पहले जूनिया के अस्पताल ले गया, लेकिन सामाजिक बदनामी के डर से तुरंत पुलिस में शिकायत नहीं की। इसके बाद 7 दिसंबर 2016 को अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ आईपीसी की धारा 376 और पोक्सो एक्ट की धारा 3/4 के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
घटना के करीब दो महीने बाद, 5 फरवरी 2017 को पुलिस ने मुखबिर की सूचना के आधार पर अपीलकर्ता को गिरफ्तार किया। जेल में आयोजित टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (टीआईपी) के दौरान पीड़िता ने उसकी शिनाख्त की। जांच पूरी होने पर विशेष अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया गया और विभिन्न धाराओं में आरोप तय किए गए। अभियुक्त ने आरोपों से इनकार करते हुए खुद को निर्दोष बताया। उसने घटना के दिन अपनी पत्नी के साथ गंगोज में होने का दावा करते हुए अलिबाई (अन्यत्र उपस्थिति) का बचाव लिया और स्थानीय विधायक से राजनीतिक रंजिश के चलते झूठा फंसाए जाने का आरोप लगाया।
विशेष अदालत ने 5 सितंबर 2019 को अपीलकर्ता को दोषी ठहराते हुए प्राकृतिक जीवन के अंत तक आजीवन कारावास की सजा सुनाई। राजस्थान हाईकोर्ट ने 20 अगस्त 2025 को उसकी अपील खारिज कर दी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील नामित सक्सेना ने दलील दी कि अभियोजन का पूरा मामला निराधार है। उन्होंने बताया कि एफआईआर में अभियुक्त का नाम नहीं था और न ही कोई हुलिया दर्ज था। हालांकि बच्ची ने सुनवाई के दौरान कहा कि वह सामने आने पर आरोपी को पहचान सकती है, लेकिन अदालत में उससे अभियुक्त की डॉक आइडेंटिफिकेशन (कटघरे में पहचान) नहीं कराई गई। जिरह के दौरान पीड़िता ने यह भी स्वीकार किया कि पुलिस ने उसे अभियुक्त का नाम पहले ही बता दिया था और टीआईपी से पहले थाने में कई लोगों के साथ अभियुक्त को भी उसके सामने लाया गया था।
बचाव पक्ष ने यह भी रेखांकित किया कि जयपुर में बच्ची की मदद से तैयार कराया गया स्केच अदालत में पेश नहीं किया गया। इसके अलावा, पीड़िता के नमूनों से मिले शुक्राणुओं का अभियुक्त के साथ कोई डीएनए या सीरोलॉजिकल मिलान नहीं कराया गया, और राजनीतिक रंजिश के संबंध में दी गई शिकायतों की पुलिस ने कोई जांच नहीं की।
इसके विपरीत, राजस्थान राज्य की ओर से पेश वकील कार्तिकेय अस्थाना ने दोषसिद्धि का समर्थन किया। उन्होंने दलील दी कि पांच साल की पीड़िता का आरोपी को झूठा फंसाने का कोई कारण नहीं था और उसने टीआईपी में उसकी सही पहचान की थी। उन्होंने कहा कि गवाह के कटघरे से अभियुक्त की ओर सीधे इशारा न कर पाना एक मामूली चूक है, जिससे पूरे मामले पर संदेह नहीं किया जा सकता। राज्य ने यह भी तर्क दिया कि पीड़िता की गवाही और मेडिकल साक्ष्य अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त हैं, इसलिए डीएनए रिपोर्ट न होना अभियोजन के लिए घातक नहीं है।
अदालत का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड की पड़ताल करने के बाद जांच और अदालती कार्यवाही में कई गंभीर खामियां पाईं:
1. मेडिकल साक्ष्य और घटना के समय में बड़ा अंतर
7 दिसंबर 2016 को बच्ची की जांच करने वाली महिला चिकित्सक ने पाया कि पेरिअनल क्षेत्र से योनि तक एक इंच का घाव था, जिससे दुर्गंधयुक्त मवाद बह रहा था और कीड़े (मैगेट्स) पड़े हुए थे। चिकित्सक ने स्पष्ट राय दी कि चोटें 5 से 7 दिन पुरानी थीं। पीठ ने रेखांकित किया कि यदि चिकित्सीय परीक्षण 7 दिसंबर को हुआ था, तो यह घटना 5 दिसंबर की नहीं हो सकती, बल्कि कम से कम 2 से 3 दिन पहले की रही होगी। यह भारी विसंगति अभियोजन की कहानी की विश्वसनीयता पर गंभीर चोट करती है।
2. जांच में गंभीर खामियां और प्राथमिक साक्ष्य छिपाना
अदालत ने पाया कि बच्ची को घर पहुंचाने वाले दोनों ग्रामीण गवाह पक्षद्रोही (होस्टाइल) हो गए। इसके अलावा, जांच अधिकारी ने स्वीकार किया कि राजनीतिक रंजिश के तहत झूठा फंसाए जाने संबंधी शपथपत्र युक्त शिकायतें मिलने के बावजूद उसने उनकी कोई जांच नहीं की। अधिकारी ने यह भी माना कि जयपुर में बच्ची की मदद से संदिग्ध का एक रेखाचित्र (स्केच) तैयार कराया गया था, लेकिन उसे कभी अदालत में पेश नहीं किया गया। इससे अदालत इस बात की पुष्टि करने से वंचित रह गई कि क्या शुरुआती हुलिया अभियुक्त के शारीरिक लक्षणों से मेल खाता था। साथ ही, जब्त जैविक नमूनों का डीएनए मिलान भी नहीं कराया गया।
3. अदालत में पहचान (डॉक आइडेंटिफिकेशन) न कराया जाना घातक
पीठ ने माना कि दोषसिद्धि का सबसे बड़ा और घातक आधार मुकदमे के दौरान अदालत में पहचान का न कराया जाना था। पीड़िता ने जिरह में स्वीकार किया था: “यह सही है कि पुलिस ने मुझे आरोपी का नाम बताया था।” रिकॉर्ड के अनुसार 2 नवंबर 2018 को जब बच्ची की गवाही दर्ज की जा रही थी, तब अभियुक्त न्यायिक हिरासत से अदालत में पेश किया गया था और वहां उपस्थित था। इसके बावजूद न तो लोक अभियोजक ने और न ही पीठासीन अधिकारी ने बच्ची से अभियुक्त की पहचान कराने का प्रयास किया।
पहचान की कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए पीठ ने रामेश्वर सिंह बनाम जम्मू-कश्मीर राज्य के फैसले का हवाला देते हुए कहा:
“पुलिस जांच के दौरान की गई पहचान कानून में सारवान साक्ष्य नहीं है और इसका उपयोग केवल अदालत में संबंधित गवाह द्वारा दिए गए साक्ष्य की पुष्टि करने या उसका खंडन करने के लिए ही किया जा सकता है। इसलिए पहचान की कार्यवाही इस तरह संचालित की जानी चाहिए कि मुकदमे के दौरान उसके संबंध में दिए गए साक्ष्य अदालत को यह सुरक्षित न्यायिक राय बनाने में सक्षम करें कि अदालत में गवाह के बयान की पुष्टि या खंडन के लिए इसका क्या साक्ष्य मूल्य है।”
पीठ ने स्पष्ट किया कि टीआईपी केवल एक संपोषक (कोरोबोरेटिव) साक्ष्य है, जबकि सारवान साक्ष्य गवाह द्वारा शपथ पर अदालत के कटघरे में की जाने वाली पहचान है। जहीरा हबीबुल्ला एच. शेख बनाम गुजरात राज्य मामले का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 165 (अब भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 168) और दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 311 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 348) के तहत अदालतों को मूकदर्शक या केवल रिकॉर्डिंग मशीन नहीं बने रहना चाहिए, बल्कि सच्चाई सामने लाने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। पीठ ने कटघरे में पहचान न कराए जाने को “संबंधित लोक अभियोजक की घोर लापरवाही और विद्वान पीठासीन अधिकारी द्वारा दर्शाया गया घोर अज्ञान” करार दिया।
अदालत का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मेडिकल साक्ष्य में गंभीर अंतर, पुलिस द्वारा अभियुक्त का नाम पहले ही बता दिया जाना, स्केच का गायब होना और अदालत में पहचान कराने में विफलता जैसे कारणों ने अभियोजन के मामले को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
अदालत ने यह भी ध्यान में रखा कि अपीलकर्ता 5 फरवरी 2017 से यानी नौ साल से अधिक समय से जेल में बंद है। ऐसे में इस मामले को नए सिरे से गवाही के लिए वापस ट्रायल कोर्ट भेजना न्यायसंगत नहीं होगा। अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फैसलों को खारिज कर दिया तथा अपीलकर्ता को सभी आरोपों से बरी करते हुए तुरंत रिहा करने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: धनराज बनाम राजस्थान राज्य
वाद संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 135/2026
पीठ: जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन
निर्णय की तिथि: 7 सितंबर, 2026

