विधानसभा सत्र में शामिल होने के लिए आप विधायक चैतर वसावा को सात दिन की अंतरिम राहत, गुजरात हाईकोर्ट ने दी सशर्त अंतरिम जमानत

गुजरात हाईकोर्ट ने सोमवार को आम आदमी पार्टी (आप) के विधायक चैतर वसावा को सात दिनों की अस्थायी जमानत दे दी है। अदालत के इस फैसले से डेडियापाड़ा के विधायक 9 से 11 सितंबर तक चलने वाले राज्य विधानसभा के मानसून सत्र में शामिल हो सकेंगे।

फिलहाल वडोदरा सेंट्रल जेल में बंद वसावा की सात दिन की यह रिहाई जेल से बाहर आने के समय से गिनी जाएगी। अदालत ने इस राहत के साथ कुछ कड़े प्रतिबंध भी लगाए हैं। अंतरिम जमानत की अवधि के दौरान वसावा को गांधीनगर की सीमा में ही रहना होगा। इसके साथ ही अदालत ने उनके किसी भी सार्वजनिक सभा को संबोधित करने और मीडिया से बातचीत करने पर पूरी तरह रोक लगा दी है।

सत्र में भाग लेने के नियम और जमानत की शर्तें

सरकार की ओर से स्पष्ट किया गया है कि विधानसभा के तय नियमों के तहत ही विधायक को सत्र में शामिल होने का निमंत्रण भेजा गया था। सजा सुनाए जाने के बावजूद वसावा को अब तक औपचारिक रूप से विधानसभा की सदस्यता से अयोग्य घोषित नहीं किया गया है। सात दिनों की अस्थायी रिहाई पूरी होने के बाद उन्हें वापस जेल में आत्मसमर्पण करना होगा।

सजा और वन विभाग से जुड़ा विवाद

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यह पूरा मामला 30 अक्टूबर 2023 का है, जब डेडियापाड़ा के बोगाज गांव के पास सरकारी जमीन पर उगाई गई फसलों को वन विभाग की टीम ने हटा दिया था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इसके बाद वनकर्मियों को वसावा के आवास पर बुलाया गया। आरोप है कि वहां विधायक ने अधिकारियों को धमकाया, एक कर्मी को थप्पड़ मारा और हवा में पिस्तौल से गोली चलाई। वहीं, उनकी पत्नी पर ₹60,000 की जबरन वसूली का आरोप लगा। इस मामले में दंगा भड़काने, सरकारी कर्मचारी पर हमला करने, वसूली और आर्म्स एक्ट के तहत मुकदमे दर्ज किए गए थे।

इसी मामले की सुनवाई करते हुए राजपीपला की सत्र अदालत ने इसी साल जून में चैतर वसावा, उनकी पत्नी शकुंतला और सात अन्य लोगों को सात साल के कठोर कारावास और ₹25,000-₹25,000 के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

बचाव पक्ष के तर्क और पूर्व के न्यायिक आदेश

विधायक की ओर से पैरवी कर रहे वकीलों ने हथियार से जुड़े आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि जांच के दौरान न तो कोई पिस्तौल बरामद की गई और न ही कोई बैलिस्टिक रिपोर्ट पेश की गई है। अपनी सजा के खिलाफ वसावा की अपील अभी अदालत में लंबित है।

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इस मामले में सह-आरोपी रहीं उनकी पत्नी शकुंतला और चार अन्य दोषियों को अदालत ने मुख्य भूमिका न होने के आधार पर जुलाई में ही जमानत दे दी थी।

इससे पहले, 24 अगस्त को गुजरात हाईकोर्ट ने वसावा की नियमित जमानत और सजा पर रोक लगाने की याचिका खारिज कर दी थी। उस समय अदालत ने टिप्पणी की थी कि एक विधायक का यह दायित्व है कि वह जनता को कानूनी रास्तों पर चलने के लिए प्रेरित करे। अदालत ने यह भी कहा था कि एक सजायाफ्ता जनप्रतिनिधि को रिहा करने से समाज में यह संदेश जा सकता है कि सत्ता में बैठे लोग कानून से ऊपर हैं। उस दौरान पीठ ने उनके पुराने आपराधिक रिकॉर्ड और पहले मिली छूट के कथित दुरुपयोग का हवाला देते हुए नियमित राहत देने से इनकार कर दिया था।

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