महिला के नाम पर खरीदी गई संपत्ति हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के तहत उसका पूर्ण स्वामित्व, संयुक्त परिवार की कोई पूर्वधारणा नहीं: कर्नाटक हाईकोर्ट

ट्रायल कोर्ट द्वारा दिए गए बंटवारे के आदेश को रद्द करते हुए कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पंजीकृत विक्रय विलेख (रजिस्टर्ड सेल डीड) के माध्यम से किसी हिंदू महिला के नाम पर खरीदी गई अचल संपत्ति, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14(1) के तहत उसका पूर्ण स्वामित्व (एब्सोल्यूट प्रॉपर्टी) होती है। केवल इसलिए कि वह एक गृहिणी या बेरोजगार थी, यह पूर्वधारणा (प्रिजम्पशन) नहीं बनाई जा सकती कि संपत्ति संयुक्त परिवार की है। जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस तारा वितास्ता गांजू की खंडपीठ ने व्यावसायिक खरीदार मेसर्स राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड की ओर से दायर अपील को स्वीकार करते हुए यह निर्णय दिया। पीठ ने कहा कि यह साबित करने का कानूनी भार उन वादियों पर था जिन्होंने संयुक्त परिवार की संपत्ति होने का दावा किया था कि इसके लिए प्रतिफल (कंसीडरेशन) पति द्वारा संयुक्त परिवार के फंड से दिया गया था, जिसे साबित करने में वे पूरी तरह विफल रहे।

विवाद की पृष्ठभूमि

यह विवाद बेंगलुरु के गांधीनगर स्थित सूबेदार छत्रम रोड (वर्तमान में नटारत्न गुब्बी वीरन्ना रोड) पर स्थित म्युनिसिपल संख्या 43, 44 और 45 की व्यावसायिक संपत्ति से संबंधित है। यह संपत्ति एक बड़े भूखंड का हिस्सा थी, जिसे स्वर्गीय श्रीमती ललिताम्मा (स्वर्गीय श्री डी.एम. सुब्बैया की दूसरी पत्नी) ने 14 मार्च 1963 को श्री जी.एम. चिन्नप्पा से 17,000 रुपये के प्रतिफल पर पंजीकृत विक्रय विलेख के जरिए खरीदा था।

श्री डी.एम. सुब्बैया का निधन 1 फरवरी 1986 को हुआ था, जबकि श्रीमती ललिताम्मा का निधन 12 अक्टूबर 1987 को बिना कोई वसीयत किए (इंटेस्टेट) हो गया। उनकी मृत्यु के बाद संपत्ति का म्युनिसिपल और राजस्व खाता उनके इकलौते जीवित बेटे श्री एस. बालसुब्रमण्य के नाम स्थानांतरित हो गया। 22 दिसंबर 2004 को बालसुब्रमण्य ने एक पंजीकृत विक्रय विलेख के जरिए यह विवादित संपत्ति 20,00,000 रुपये में अपीलकर्ता मेसर्स राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड को बेच दी।

वर्ष 2005 में, बालसुब्रमण्य की पत्नी श्रीमती बी. सरोजम्मा और उनके दो बेटों श्री बी. देवराज और श्री बी. योगेश ने मूल वाद (ओ.एस. संख्या 914/2005) दायर कर प्रत्येक के लिए 1/4 हिस्से (कुल 3/4 हिस्से) के विभाजन और अलग कब्जे की मांग की। बाद में उन्होंने अपने वादपत्र में संशोधन कर यह घोषणा भी चाही कि बालसुब्रमण्य द्वारा राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के पक्ष में निष्पादित विक्रय विलेख उनके हिस्सों पर बाध्यकारी नहीं है। वादियों का तर्क था कि हालांकि 1963 का सेल डीड ललिताम्मा के नाम पर था, लेकिन यह संपत्ति डी.एम. सुब्बैया द्वारा संयुक्त परिवार के फंड से खरीदी गई थी और सुविधा के लिए बेनामी के रूप में उनके नाम पर रखी गई थी, इसलिए यह पैतृक संयुक्त परिवार की संपत्ति है।

15 सितंबर 2009 को बेंगलुरु के 38वें अतिरिक्त नगर दीवानी न्यायाधीश (ट्रायल कोर्ट) ने वादियों के पक्ष में फैसला सुनाया। ट्रायल कोर्ट ने माना कि ललिताम्मा की आय का कोई स्वतंत्र स्रोत नहीं था, संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति माना और राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के पक्ष में किए गए हस्तांतरण को वादियों के 3/4 हिस्से के विरुद्ध शून्य घोषित कर दिया। राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की। हाईकोर्ट द्वारा पहले दिए गए रिमांड आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने सिविल अपील संख्या 5430/2025 में रद्द कर दिया था और हाईकोर्ट को निर्देश दिया था कि वह मौजूदा रिकॉर्ड के आधार पर मेरिट पर प्रथम अपील का निपटारा करे, जिसके बाद मामले की अंतिम सुनवाई की गई।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि ट्रायल कोर्ट ने संयुक्त परिवार के फंड के स्वतंत्र प्रमाण के बिना केवल 1963 के विक्रय विलेख के कथनों (रेसाइटल्स) के आधार पर संपत्ति को संयुक्त परिवार की संपत्ति मानकर गंभीर त्रुटि की है। यह कहा गया कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14(1) के तहत एक हिंदू महिला द्वारा हासिल की गई कोई भी संपत्ति—जिसमें खरीद भी शामिल है—उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली संपत्ति होती है। अपीलकर्ता ने इस बात पर जोर दिया कि ललिताम्मा ने अपने जीवनकाल में संपत्ति पर पूर्ण अधिकार का प्रयोग किया था; उन्होंने अगस्त 1963 में इसके एक हिस्से को बेचा और जनवरी 1979 में 33 वर्षों के लिए दूसरे हिस्से को पट्टे (लीज) पर दिया। उनकी मृत्यु के बाद, यह संपत्ति धारा 15(1)(a) और धारा 16 के तहत विशेष रूप से उनके बेटे बालसुब्रमण्य को मिली, जिससे वह इसका पूर्ण स्वामित्व हस्तांतरित करने के लिए पूरी तरह सक्षम थे।

दूसरी ओर, वादियों (प्रतिवादी संख्या 1 से 3) के वकील ने दलील दी कि खरीद की पूरी रकम डी.एम. सुब्बैया ने अपनी कमाई और संयुक्त परिवार के संसाधनों से दी थी। वर्ष 1936 और 1960 के बीच के पूर्व बंधक और विक्रय विलेखों का हवाला देते हुए उन्होंने तर्क दिया कि सुब्बैया कर्ज लेते थे, दस्तावेज निष्पादित करते थे और फिर पंचायत के माध्यम से संपत्ति को अपनी पत्नी के नाम पर वापस खरीदते थे, क्योंकि वह दुनियादार थीं और पारिवारिक मामलों को संभालती थीं। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राजेश एक्सपोर्ट्स के पक्ष में हुआ सेल डीड कम मूल्य पर दिखाया गया था, स्टाम्प शुल्क की कमी के कारण लंबित रहा, और वाद लंबित रहने के दौरान पंजीकृत हुआ, जिससे इस लेन-देन की सत्यनिष्ठा पर संदेह उत्पन्न होता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण

हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14(1) के कानूनी ढांचे की पड़ताल करते हुए हाईकोर्ट ने दोहराया कि यह कानून हिंदू महिलाओं के लिए पूर्ण स्वामित्व का सृजन करता है। सुप्रीम कोर्ट के गंगम्मा बनाम जी. नागराथ्नम्मा मामले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

“चूंकि मद 1 और 2 की संपत्तियां अपीलकर्ता के नाम पर दर्ज हैं, इसलिए इस मामले में इसके विपरीत किसी भी सबूत के अभाव में, उक्त अधिनियम की धारा 14(1) के प्रभाव से अपीलकर्ता उन संपत्तियों की पूर्ण स्वामी है।”

अदालत ने मरबसप्पा बनाम निंगप्पा मामले में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का भी उल्लेख किया जिसमें कहा गया था:

“हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 14 स्पष्ट रूप से यह अधिदेश देती है कि किसी हिंदू महिला की कोई भी संपत्ति उसकी पूर्ण संपत्ति है और इसलिए उस पर उसका पूर्ण स्वामित्व होता है।”

संयुक्त परिवार के दावों से जुड़े कानूनी सिद्धांतों पर पीठ ने डी.एस. लक्ष्मैया बनाम एल. बालसुब्रमण्यम मामले के फैसले को लागू किया और इस बात पर बल दिया कि केवल संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व से यह पूर्वधारणा नहीं बन जाती कि कोई संपत्ति संयुक्त परिवार की है:

“इसलिए कानूनी सिद्धांत यह है कि केवल एक संयुक्त हिंदू परिवार के अस्तित्व के आधार पर किसी संपत्ति के संयुक्त परिवार की संपत्ति होने की कोई पूर्वधारणा नहीं होती है। जो व्यक्ति दावा करता है, उसे यह साबित करना होगा कि संपत्ति संयुक्त परिवार की संपत्ति है।”

हाईकोर्ट ने पाया कि वादी 1963 में खरीद के समय ऐसे किसी पर्याप्त संयुक्त परिवार के फंड (न्यूक्लियस) के अस्तित्व को साबित करने में विफल रहे जिससे संपत्ति खरीदी जा सकती थी। वादी गवाह (पीडब्ल्यू-1) का विवाह 1979 में यानी इस सौदे के 16 साल बाद परिवार में हुआ था, और उन्होंने जिरह में स्वीकार किया कि उन्हें अपने ससुर के वेतन या खरीद के लिए दिए गए धन के स्रोत की कोई व्यक्तिगत जानकारी नहीं थी। अन्य गवाहों को भी 1963 के लेन-देन की सीधी जानकारी नहीं थी।

इसके अतिरिक्त, अदालत ने वादियों के बेनामी के दावे को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट के मंगाथाई अम्मल बनाम वी. राजेश्वरी मामले का हवाला देते हुए पीठ ने रेखांकित किया:

“विलेख में जिस व्यक्ति को स्पष्ट रूप से क्रेता या अंतरिती के रूप में दर्शाया गया है, उसके पक्ष में इस प्रारंभिक पूर्वधारणा के साथ शुरुआत होती है कि जो स्थिति प्रत्यक्ष दिखाई दे रही है वही वास्तविक स्थिति है।”

गृहिणी होने के आधार पर ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को खारिज करते हुए खंडपीठ ने टिप्पणी की:

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“केवल यह मान लेना कि श्रीमती ललिताम्मा एक महिला थीं और बेरोजगार थीं, इसलिए उनके पास कोई धन नहीं रहा होगा, जैसा कि विद्वान ट्रायल कोर्ट द्वारा माना गया है, उचित नहीं होगा।”

अदालत ने दर्ज किया कि 1963 के विक्रय विलेख में स्पष्ट रूप से ललिताम्मा से पूरी प्रतिफल राशि प्राप्त होने की पुष्टि की गई थी, उन्हें कब्जा सौंपा गया था और उन्हें किरायेदारों से किराया वसूलने का अधिकार दिया गया था। इसके बाद के वर्षों में उनके आचरण, विशेष रूप से 1979 में अपने बेटे को शामिल किए बिना स्वयं पूर्ण स्वामी के रूप में 33 साल का रजिस्टर्ड लीज डीड निष्पादित करना, उनके स्वतंत्र स्वामित्व की पुष्टि करता है।

परिणामस्वरूप, हाईकोर्ट ने निष्कर्ष दिया:

“तदनुसार, हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14(1) के आधार पर, स्वर्गीय श्रीमती ललिताम्मा वादग्रस्त संपत्ति को उसकी पूर्ण स्वामी के रूप में रखती थीं, न कि एक सीमित स्वामी के रूप में।”

अधिनियम की धारा 15(1)(a) और 16 के तहत संपत्ति के उत्तराधिकार का विश्लेषण करते हुए, और सुप्रीम कोर्ट के सच्चिदानंदम बनाम ई. वनजा फैसले के आलोक में अदालत ने पाया कि चूंकि उनके पति की मृत्यु उनसे पहले हो चुकी थी और उनकी बेटी की मृत्यु 1999 में हो चुकी थी (जिसका कोई अन्य वारिस रिकॉर्ड पर साबित नहीं हुआ), इसलिए यह संपत्ति उनके एकमात्र जीवित बेटे बालसुब्रमण्य को मिली। अतः पूर्ण स्वामी के रूप में बालसुब्रमण्य 22 दिसंबर 2004 को अपीलकर्ता मेसर्स राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड के पक्ष में विक्रय विलेख निष्पादित करने के पूर्ण हकदार थे।

निर्णय

ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को कानून और तथ्यों के विपरीत पाते हुए हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और 15 सितंबर 2009 के फैसले और डिक्री को रद्द कर दिया। वादियों द्वारा दायर बंटवारे के वाद को खारिज कर दिया गया। सभी लंबित अंतरिम आवेदनों को समाप्त कर दिया गया और पक्षों के लिए किसी भी प्रकार के अदालती खर्च (कॉस्ट) का आदेश नहीं दिया गया।

मामले का विवरण

मामले का शीर्षक: मेसर्स राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड बनाम श्री बी. देवराज और अन्य
वाद संख्या: रेगुलर फर्स्ट अपील संख्या 1165 / 2009 (पीएआर)
पीठ: जस्टिस जयंत बनर्जी और जस्टिस तारा वितास्ता गांजू
निर्णय की तिथि: 29 अगस्त 2026

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