सड़क दुर्घटना में मुआवजे और कार्यात्मक विकलांगता (फंक्शनल डिसेबिलिटी) के निर्धारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी घायल व्यक्ति की कार्यात्मक विकलांगता का आकलन खुले और प्रतिस्पर्धी बाजार में उसकी कमाई क्षमता के आधार पर किया जाना चाहिए, न कि इस बात पर कि वह नियोक्ता की कॉरपोरेट दया या विशेष सुविधाओं के सहारे नौकरी में बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया शामिल थे, ने 100 प्रतिशत स्थायी शारीरिक अक्षमता से जूझ रही एक निजी कंपनी की वरिष्ठ महिला अधिकारी का मुआवजा बढ़ाकर 3,77,84,297 रुपये कर दिया और बीमा कंपनी की आपत्तियों को खारिज कर दिया। वहीं, इसी हादसे में जान गंवाने वाले मोटरसाइकिल चालक से जुड़े एक अन्य मामले में कोर्ट ने उसके माता-पिता को मिले 82,56,152 रुपये के मुआवजे को बरकरार रखा। पीठ ने यह भी तय किया कि अविवाहित मृतक के मामले में मल्टीप्लायर माता-पिता की उम्र से नहीं बल्कि मृतक की आयु के आधार पर तय होगा, और ठोस दस्तावेजी प्रमाण के अभाव में पीछे बैठी महिला सह-सवार को उसकी कानूनी रूप से विवाहित पत्नी नहीं माना जा सकता।
मामले की पृष्ठभूमि
यह पूरा मामला 10 अप्रैल 2011 की शाम करीब 5:30 बजे बृजघाट पुल के पास हुए एक भीषण सड़क हादसे से जुड़ा है। 33 वर्षीय सुशांत प्रभाकरन मोटरसाइकिल चला रहे थे और उनके पीछे 35 वर्षीय प्रियंका दास बैठी थीं। इसी दौरान पंजीकरण संख्या एचआर-55-2812 वाले एक भारी मालवाहक ट्रक ने उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी। ट्रक सुशांत प्रभाकरन को कुचलता हुआ निकल गया, जिससे मौके पर ही उनकी मौत हो गई। वहीं, पीछे बैठीं प्रियंका दास के शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों में गंभीर और जानलेवा चोटें आईं। इस घटना के संबंध में प्रत्यक्षदर्शी राधे श्याम कौशिक की शिकायत पर गढ़मुक्तेश्वर थाने में प्राथमिकी संख्या 198 दर्ज की गई थी।
हादसे के बाद प्रियंका दास ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (एमएसीटी), गुरुग्राम के समक्ष दो अलग-अलग याचिकाएं दायर की थीं। पहली याचिका (एमएसीटी याचिका संख्या 9/2014) सुशांत प्रभाकरन की मौत के लिए 5 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग को लेकर थी, जिसमें उन्होंने खुद को मृतक की विधवा बताया था। दूसरी याचिका (एमएसीटी याचिका संख्या 94/2014) उन्होंने खुद को आई गंभीर शारीरिक चोटों के लिए 12 करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग करते हुए दायर की थी।
हादसे के समय सुशांत प्रभाकरन एरिक्सन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड (डीएलएफ साइबर सिटी, गुरुग्राम) में कॉन्टैक्ट सेंटर मैनेजर के पद पर कार्यरत थे और उनका वार्षिक सकल वेतन 10,65,600 रुपये था। वहीं, प्रियंका दास आईबीएम दक्ष (कॉन्सेंट्रिक्स दक्ष सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, साइबर सिटी, गुरुग्राम) में डिप्टी ग्रुप मैनेजर के पद पर कार्यरत थीं।
अधिकरण और हाईकोर्ट की कार्यवाही
3 अप्रैल 2017 को एमएसीटी गुरुग्राम ने ट्रक चालक, मालिक और बीमा कंपनी रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को संयुक्त और अलग-अलग रूप से जिम्मेदार ठहराया। अधिकरण ने वाहन के पंजीकरण प्रमाणपत्र की जांच के बाद बीमा कंपनी की इस दलील को खारिज कर दिया कि ट्रक के पास वैध फिटनेस प्रमाणपत्र नहीं था।
मृत्यु से जुड़े दावे में अधिकरण ने पाया कि प्रियंका दास के पास यह साबित करने के लिए कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था कि वह मृतक की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी थीं। अधिकरण ने पाया कि रोजगार से जुड़े रिकॉर्ड में उन्होंने सुशांत प्रभाकरन को अपना मंगेतर (फियान्से) दर्ज किया हुआ था। अधिकरण ने मृतक के वेतन में 50 प्रतिशत भविष्य की संभावनाएं जोड़ते हुए, व्यक्तिगत खर्च के लिए 50 प्रतिशत कटौती की और मृतक की आयु (33 वर्ष) के अनुसार 16 का मल्टीप्लायर लागू कर कुल निर्भरता का नुकसान तय किया। व्यक्तिगत दुर्घटना पॉलिसी की राशि घटाने के बाद 82,56,152 रुपये का शुद्ध मुआवजा तय किया गया। इसमें से मृतक की मां संध्या प्रसाद को 77,06,152 रुपये, पिता सहदेव प्रसाद को 50,000 रुपये और प्रियंका दास को 5,00,000 रुपये दिए गए। पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने इस फैसले को बरकरार रखते हुए केवल प्रियंका दास के हिस्से को बढ़ाकर 7,50,000 रुपये किया था।
वहीं चोटों से जुड़े दावे में मेडिकल रिकॉर्ड से साबित हुआ कि प्रियंका दास को पेल्विक फ्रैक्चर, पेरिनील हिस्से में गंभीर डिग्लोविंग इंजरी, नितंबों पर थर्ड-डिग्री फ्रिक्शन बर्न, चोट के कारण दोनों आंखों की रोशनी पूरी तरह चले जाना (ट्राउमैटिक बाईलैटरल ओसीसीपिटल ग्लिओसिस) और एम्स में आंत जोड़ने का ऑपरेशन विफल होने के कारण जीवन भर के लिए परमानेंट कोलोस्टॉमी स्टोमा की समस्या हुई। इसके बावजूद, चूंकि वह विशेष सहायक सॉफ्टवेयर की मदद से काम करती रहीं और उनका पैकेज (सीटीसी) 16 लाख से बढ़कर 19 लाख रुपये हो गया था, अधिकरण ने उनकी कार्यात्मक विकलांगता केवल 60 प्रतिशत मानते हुए 1,35,53,298 रुपये का मुआवजा तय किया। बाद में हाईकोर्ट ने इसे बढ़ाकर 80 प्रतिशत कार्यात्मक विकलांगता माना और सुप्रीम कोर्ट के पप्पू देव यादव बनाम नरेश कुमार व अन्य फैसले के आधार पर 50 प्रतिशत भविष्य की संभावनाएं जोड़ते हुए कुल 2,94,82,617 रुपये का मुआवजा निर्धारित किया।
इसके बाद रिलायंस जनरल इंश्योरेंस और प्रियंका दास दोनों ने हाईकोर्ट के फैसलों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अलग-अलग अपीलें दायर कीं।
सुप्रीम कोर्ट में दोनों पक्षों के तर्क
मृत्यु से जुड़ी अपीलों में बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि मृतक अविवाहित था, इसलिए मुआवजे की गणना के लिए मल्टीप्लायर मृतक की उम्र के बजाय उसके आश्रित माता-पिता की उम्र के आधार पर लगाया जाना चाहिए था। इसके जवाब में प्रतिवादियों के वकील ने कहा कि यह कानूनी बिंदु पूरी तरह तय हो चुका है और पूर्व के फैसलों के तहत मृतक की आयु ही मान्य है। वहीं, प्रियंका दास की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांतो चंद्र सेन ने तर्क दिया कि मंजूरी बेरा मामले के सिद्धांतों के आधार पर उनका हिस्सा और अधिक बढ़ाया जाना चाहिए था।
शारीरिक चोटों से जुड़ी अपीलों में बीमा कंपनी ने मुख्य रूप से यह दलील दी कि पीड़िता की कमाई क्षमता या कार्यात्मक क्षमता का कोई नुकसान नहीं हुआ है, क्योंकि वह लगातार डिप्टी ग्रुप मैनेजर के पद पर काम कर रही हैं और उनका वेतन भी बढ़ा है। कंपनी ने भविष्य की संभावनाओं के 50 प्रतिशत मद, अटेंडेंट खर्च और भविष्य के मेडिकल खर्चों पर भी सवाल उठाए।
इसके विपरीत, पीड़िता के वकील ने तर्क दिया कि खुले और प्रतिस्पर्धी बाजार में काम करने की उनकी क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। सुप्रीम कोर्ट के 17 अक्टूबर 2025 के निर्देश पर वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली में गठित विशेष मेडिकल बोर्ड की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए वकील ने कहा कि डॉक्टरों के बोर्ड ने उनके पूरे शरीर में 100 प्रतिशत स्थायी शारीरिक अक्षमता की पुष्टि की है।
सुप्रीम कोर्ट का कानूनी विश्लेषण
लापरवाही और सबूत के मानक पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि एमएसीटी की कार्यवाही संक्षिप्त प्रकृति की होती है, जहां लापरवाही का आकलन आपराधिक मामलों की तरह ‘संदेह से परे’ नहीं, बल्कि ‘संभावनाओं की प्रबलता’ (प्रीपॉन्डरेंस ऑफ प्रोबेबिलिटीज) के आधार पर किया जाता है। ट्रक चालक के खिलाफ प्राथमिकी और चार्जशीट दर्ज होने से शुरुआती जिम्मेदारी तय हो गई थी।
मृतक के मामले में मल्टीप्लायर के विवाद पर पीठ ने अधिकरण और हाईकोर्ट के निर्णय को सही ठहराया। कोर्ट ने सरला वर्मा बनाम दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन, मुन्ना लाल जैन बनाम विपिन कुमार शर्मा, नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रणय सेठी और सूबे सिंह बनाम श्याम सिंह के फैसलों का हवाला दिया। पीठ ने कहा:
“अविवाहित मृतकों के मामलों में कौन सी मल्टीप्लायर पद्धति लागू होगी, इस विशिष्ट कानूनी प्रश्न पर इस न्यायालय की तीन न्यायाधीशों की पीठ ने मुन्ना लाल जैन मामले में स्पष्ट किया था कि मल्टीप्लायर का निर्धारण मृतक की आयु से होना चाहिए, न कि आश्रितों की आयु से। बाद में सूबे सिंह मामले में इस न्यायालय के निर्णय ने भी इसकी पुष्टि की, जिसमें माना गया कि यह नियम अब कोई अनसुलझा मुद्दा नहीं रह गया है।”
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सरला वर्मा और प्रणय सेठी मामलों में तय मानक मैट्रिक्स के अनुसार 31 से 35 वर्ष के आयु वर्ग के लिए 16 का मल्टीप्लायर बिल्कुल सही था। वहीं प्रियंका दास के पत्नी होने के दावे पर पीठ ने कहा:
“अधिकरण और हाईकोर्ट ने प्रियंका दास के कानूनी रूप से विवाहित पत्नी न होने के तथ्यात्मक निष्कर्ष की पुष्टि के लिए पेश किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण किया है। हम किसी भिन्न निष्कर्ष को दर्ज करने के लिए साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन नहीं कर रहे हैं, और न ही अधिकरण व हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण पर अपनी असहमति व्यक्त कर रहे हैं।”
इसके बाद पीठ ने चोटों के मामले में बीमा कंपनी की इस दलील पर विचार किया कि पीड़िता की कमाई क्षमता में कोई वास्तविक गिरावट नहीं आई है। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि जब नियोक्ता दया दिखाते हुए नौकरी जारी रखता है, तो उसे वास्तविक क्षमता नहीं माना जा सकता। पीठ ने टिप्पणी की:
“कार्यात्मक विकलांगता का आकलन किसी विशेष, अत्यधिक अनुकूलित पद पर बने रहने के बजाय खुले, प्रतिस्पर्धी बाजार में पीड़ित की कमाई क्षमता के आधार पर किया जाता है।”
अदालत ने पाया कि नियोक्ता के पत्र से यह सिद्ध है कि पीड़िता दुर्घटना के कारण भविष्य की सामान्य पदोन्नतियों (जैसे जनरल मैनेजर, डायरेक्टर या वाइस प्रेसिडेंट) से वंचित रह गईं। कोर्ट ने रिकॉर्ड का हवाला देते हुए कहा:
“रिकॉर्ड से यह भी संकेत मिलता है कि वह अपने मौजूदा दायित्वों का निर्वहन केवल विशेष रूप से तैयार किए गए सॉफ्टवेयर, लचीले कामकाजी घंटों और अपने नियोक्ता द्वारा कॉरपोरेट दया के रूप में प्रदान की गई अत्यधिक सुविधाओं के कारण ही कर पा रही हैं।”
अदालत ने आगे निर्देश दिया:
“वर्धमान महावीर मेडिकल कॉलेज एवं सफदरजंग अस्पताल द्वारा जारी आधिकारिक मेडिकल बोर्ड रिपोर्ट के आधार पर, जिसने दावेदार का मूल्यांकन किया और अभिघातज सिर की चोट के साथ कॉर्टिकल ब्लाइंडनेस, पेल्विक फ्रैक्चर और स्थायी कोलोस्टॉमी के कारण पूरे शरीर के 100 प्रतिशत स्थायी शारीरिक नुकसान को प्रमाणित किया, मुआवजे की गणना हाईकोर्ट के 80 प्रतिशत के आकलन से बदलकर 100 प्रतिशत कार्यात्मक विकलांगता में तब्दील हो जाती है, क्योंकि खुले श्रम बाजार में स्वतंत्र रूप से रोजगार हासिल करने, उसे बनाए रखने या उसमें आगे बढ़ने की दावेदार की क्षमता पूरी तरह समाप्त हो चुकी है।”
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय
सुशांत प्रभाकरन की मृत्यु से जुड़ी दोनों अपीलों (सिविल अपील संख्या 12085/2026 और 12086/2026) को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दिया और हाईकोर्ट द्वारा तय 82,56,152 रुपये के मुआवजे तथा उसके बंटवारे को यथावत बनाए रखा।
वहीं प्रियंका दास की शारीरिक चोटों से जुड़े मामले (सिविल अपील संख्या 12087-12088/2026 और 12089/2026) में सुप्रीम कोर्ट ने बीमा कंपनी की अपीलों को खारिज करते हुए पीड़िता की अपील को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। कोर्ट ने 100 प्रतिशत कार्यात्मक विकलांगता और 50 प्रतिशत भविष्य की संभावनाओं के आधार पर भविष्य की आय का नुकसान 2,42,08,416 रुपये तय किया। इसके अलावा 24 घंटे की देखभाल के लिए तीन सहायकों का खर्च 28,80,000 रुपये, विवाह की संभावनाओं के नुकसान के लिए 20,00,000 रुपये, दर्द और मानसिक पीड़ा के लिए 15,00,000 रुपये, भविष्य के इलाज के लिए 15,00,000 रुपये और मेडिकल बिलों की प्रतिपूर्ति सहित कुल मुआवजा बढ़ाकर 3,77,84,297 रुपये कर दिया। अदालत ने इस पूरी राशि पर दावा याचिका दायर करने की तिथि से वास्तविक भुगतान तक 7.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का आदेश दिया।
मामले का विवरण
मामले का शीर्षक: रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम प्रियंका दास और अन्य
वाद संख्या: सिविल अपील संख्या 12085/2026 साथ में सिविल अपील संख्या 12086/2026; सिविल अपील संख्या 12087-12088/2026 साथ में सिविल अपील संख्या 12089/2026
पीठ: जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस एन.वी. अंजारिया
निर्णय की तिथि: 3 सितंबर 2026

