दिल्ली हाईकोर्ट ने सॉफ्टवेयर कंपनी हाशिकॉर्प को मातृत्व अवकाश से लौटी अपनी एक वरिष्ठ महिला कर्मचारी का पद घटाने के मामले में 10 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है। 31 अगस्त को फैसला सुनाते हुए जस्टिस सचिन दत्ता ने कंपनी को दो महीने के भीतर पीड़िता को कानूनी खर्च के तौर पर 1.5 लाख रुपये का अलग से भुगतान करने का भी निर्देश दिया। अदालत ने कड़े शब्दों में कहा कि कार्यस्थल पर मातृत्व को किसी भी सूरत में अपमान या हीनता का कारण नहीं बनने दिया जा सकता।
मुआवजे और कानूनी खर्च का आदेश
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 21 और 42 का समग्र अध्ययन यह साफ कर देता है कि गर्भावस्था और मातृत्व को पेशेवर नुकसान, डिमोशन, पद घटाने या करियर की प्रगति रोकने का आधार नहीं बनाया जा सकता। जस्टिस दत्ता ने कहा कि इस तरह के कदम न केवल महिला कर्मचारियों को मिले कानूनी संरक्षण को कमजोर करते हैं, बल्कि समानता, मानवीय गरिमा, सामाजिक न्याय और कार्यस्थल पर सम्मानजनक परिस्थितियों के प्रति देश की संवैधानिक प्रतिबद्धता को भी गहरी चोट पहुंचाते हैं।
मातृत्व अवकाश से वापसी और पद घटाने का विवाद
यह पूरा मामला चार्टर्ड अकाउंटेंट राखी बिष्ट से जुड़ा है, जिन्होंने 14 वर्षों के लंबे पेशेवर अनुभव के बाद जून 2022 में हाशिकॉर्प कंपनी में बतौर अकाउंटिंग मैनेजर जॉइन किया था। उस समय उनका मासिक वेतन 2.6 लाख रुपये था। दिसंबर 2023 में वह मातृत्व अवकाश पर गईं। इसके बाद जब जुलाई 2024 में वह काम पर लौटीं, तो उन्हें उनके मूल पद से हटाकर ट्रेजरी विभाग में भेज दिया गया। वहां उन्हें जो काम सौंपा गया, वह पारंपरिक रूप से एक स्टाफ अकाउंटेंट करता था। यह जिम्मेदारी उनके पूर्व पद से लगभग तीन स्तर नीचे थी और पूरी तरह क्लेरिकल प्रकृति की थी।
प्रबंधन ने उन्हें बताया कि उनकी पुरानी टीम में अब कोई पद खाली नहीं बचा है। राखी बिष्ट ने अदालत को बताया कि नया काम उस मैनेजीरियल अकाउंटिंग भूमिका से बिल्कुल मेल नहीं खाता था, जिसके लिए उन्हें नियुक्त किया गया था। इस बदलाव ने उनकी योग्यता, अनुभव और पेशेवर साख को गंभीर ठेस पहुंचाई। इसके बाद उन्होंने अक्टूबर 2024 में अपने पद से इस्तीफा दे दिया और 50 लाख रुपये के मुआवजे तथा निजी कंपनियों के लिए भेदभाव-विरोधी सख्त दिशा-निर्देश तय करने की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
कानून में स्पष्ट नीति के अभाव पर चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रेखांकित किया कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 और सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में से किसी में भी मातृत्व अवकाश के बाद महिला कर्मियों की कार्यस्थल पर वापसी और उनके पुनर्स्थापन को लेकर कोई स्पष्ट और व्यापक कानूनी ढांचा मौजूद नहीं है। अदालत ने आगाह किया कि ऐसे स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव के कारण पहले से मौजूद संवैधानिक व वैधानिक सुरक्षा प्रावधान निष्प्रभावी हो सकते हैं। अदालत ने कहा कि कानून की ऐसी व्याख्या कभी स्वीकार नहीं की जा सकती, जो केवल कागजी या दिखावटी अनुपालन के जरिये महिलाओं के वास्तविक अधिकारों को दरकिनार करने की छूट देती हो।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि मातृत्व अवकाश से लौटने वाली महिला कर्मचारी सामान्यतः उसी पद पर बहाल होने की हकदार है, जिस पर वह अवकाश पर जाने से ठीक पहले कार्यरत थी। यदि वास्तविक और प्रमाणित संगठनात्मक कारणों से वह पद उपलब्ध नहीं है, तो नियोक्ता का यह दायित्व है कि वह उसे वेतन, ग्रेड, पद, जिम्मेदारी, प्रबंधकीय अधिकार और पदोन्नति के अवसरों के लिहाज से हर तरह से समान पद प्रदान करे। इसके साथ ही नियोक्ता को लिखित में यह स्पष्ट करना होगा कि पुराना पद क्यों उपलब्ध नहीं है और नए पद का ग्रेड, वेतन, रिपोर्टिंग और कार्यक्षेत्र क्या है। यदि महिला कर्मचारी इस पर आपत्ति जताती है, तो नियोक्ता को उसकी चिंताओं पर विचार कर कारणों सहित अपना अंतिम निर्णय बताना होगा।
छह महीने के भीतर नियम बनाने का निर्देश
हाईकोर्ट ने आईबीएम द्वारा अधिग्रहीत सॉफ्टवेयर कंपनी हाशिकॉर्प को छह महीने के भीतर व्यापक नियम और दिशा-निर्देश तैयार करने का निर्देश दिया है। इनमें गर्भावस्था के दौरान कार्यस्थल पर जरूरी सहूलियतें देने, मातृत्व अवकाश के बाद भूमिका और पद की सुरक्षा सुनिश्चित करने, स्तनपान सहायता, क्रेच की सुविधा, शिकायतों के निपटारे की समयसीमा और बदले की भावना से की जाने वाली कार्रवाई से संरक्षण जैसे विषय अनिवार्य रूप से शामिल होंगे।
इसके अलावा हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार के स्थायी वकील आशीष के. दीक्षित के उन सुझावों का भी संज्ञान लिया, जिनमें गर्भावस्था की पहली सूचना से लेकर काम पर वापसी के छह महीने बाद तक की अवधि को महिला कर्मचारियों के लिए संरक्षित अवधि घोषित करने की बात कही गई थी। इन सुझावों के तहत गर्भावस्था की जानकारी मिलने के सात दिनों के भीतर नियोक्ता द्वारा व्यक्तिगत मूल्यांकन किया जाना चाहिए, ताकि बिना जबरन छुट्टी पर भेजे या पद घटाए महिला कर्मी को कार्यस्थल पर उचित वातावरण उपलब्ध कराया जा सके।

