आंध्र प्रदेश के एक उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बस का रास्ता बदलने और छह घंटे की भारी देरी के कारण छात्र की फ्लाइट छूटने के मामले में निजी बस ऑपरेटर पर 73,000 रुपये का जुर्माना लगाया है। आयोग ने कहा कि बिना किसी पूर्व सूचना के रूट बदलना और निर्धारित समय सारिणी का पालन न करना सेवा में स्पष्ट कमी है। ट्रांसपोर्ट कंपनियां सामान्य नियमों और शर्तों की आड़ लेकर यात्रियों को अधर में नहीं छोड़ सकतीं।
मुआवजा और कानूनी खर्च का ब्योरा
आयोग के अध्यक्ष करणम किशोर कुमार तथा सदस्य एन. नारायण रेड्डी और एस. नज़ीमा कौसर की पीठ ने इस मामले में छात्र की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए फैसला सुनाया। आयोग ने बस ऑपरेटर को आदेश दिया कि वह मानसिक प्रताड़ना और असुविधा के बदले छात्र को 50,000 रुपये का हर्जाना दे। इसके अलावा छात्र द्वारा दूसरी फ्लाइट टिकट खरीदने और होटल में ठहरने के एवज में 13,000 रुपये और कानूनी लड़ाई के खर्च के रूप में 10,000 रुपये चुकाने के निर्देश दिए गए हैं।
पीठ ने स्पष्ट किया कि एक सेवा प्रदाता होने के नाते ऑपरेटर का यह दायित्व है कि वह यात्रियों को बताए गए समय के अनुसार पूरी सावधानी और जिम्मेदारी से सेवा दे। सड़क यातायात में मामूली और अपरिहार्य देरी समझी जा सकती है, लेकिन बिना किसी ठोस कारण के कई घंटों का विलंब होना और उसके चलते किसी यात्री की पहले से बुक की गई फ्लाइट छूट जाना सेवा में गंभीर लापरवाही को दर्शाता है।
अघोषित रूट डायवर्जन से हुई छह घंटे की देरी
पीड़ित छात्र का चयन नई दिल्ली के एक शैक्षणिक संस्थान में हुआ था। दिल्ली पहुंचने के लिए उसने बेंगलुरु एयरपोर्ट से सुबह 10:50 बजे की फ्लाइट बुक की थी। समय पर हवाई अड्डे पहुंचने के लिए उसने संबंधित ट्रेवल्स कंपनी की आदोनी से बेंगलुरु जाने वाली रात की बस में टिकट लिया। समय सारिणी के मुताबिक बस को रात 11:15 बजे आदोनी से रवाना होकर सुबह 5:00 बजे बेंगलुरु पहुंचना था। बस में सवार होते समय स्टाफ ने छात्र को यह भरोसा भी दिलाया था कि गाड़ी सुबह लगभग 5:30 बजे तक एयरपोर्ट के पास उतार देगी।
सफर के दौरान बस चालक ने यात्रियों को बताए बिना अचानक रास्ता बदल दिया। सुबह 5:30 बजे पहुंचने के बजाय बस पूर्वाह्न 11:30 बजे एयरपोर्ट के पास पहुंची। तब तक छात्र की दिल्ली की फ्लाइट छूट चुकी थी। इस वजह से छात्र को एयरपोर्ट के पास होटल का कमरा लेकर शाम तक इंतजार करना पड़ा। उसे उसी दिन शाम की दूसरी फ्लाइट के लिए 8,000 रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़े और वह अगली सुबह जाकर दिल्ली पहुंच सका।
नियम और शर्तों की आड़ नहीं ले सकते ऑपरेटर
अपनी सफाई में बस ऑपरेटर ने दलील दी कि टिकट के सामान्य नियमों और शर्तों के अनुसार उसे परिचालन कारणों, यातायात या सुरक्षा की दृष्टि से रूट और समय में बदलाव करने का पूरा अधिकार है। कंपनी का यह भी कहना था कि बस चालक या कंडक्टर द्वारा मौखिक रूप से दिया गया आश्वासन कोई कानूनी गारंटी नहीं होता और उनका संचालन मोटर वाहन अधिनियम के प्रावधानों से बंधा है।
उपभोक्ता आयोग ने इन दलीलों को खारिज करते हुए टिप्पणी की कि टिकट के सामान्य नियम और शर्तें किसी भी निजी बस संचालक को बिना किसी उचित कारण या यात्री को सूचना दिए रूट बदलने की खुली छूट नहीं देतीं। पीठ ने रेखांकित किया कि ऑपरेटर ऐसा कोई भी साक्ष्य या दस्तावेज पेश नहीं कर सका, जिससे साबित हो सके कि सड़क बंद होने, पुलिस डायवर्जन, गाड़ी खराब होने या किसी सुरक्षा आपातकाल की वजह से रूट बदलना मजबूरी था।
आयोग ने कहा कि छात्र ने बस के पहुंचने के समय और फ्लाइट के प्रस्थान समय के बीच करीब छह घंटे का पर्याप्त अंतर रखा था, लिहाजा छात्र की ओर से कोई लापरवाही नहीं थी। जब तक कोई अपरिहार्य और प्रमाणित आपात स्थिति न हो, तब तक ट्रांसपोर्ट कंपनियां सामान्य शर्तों की आड़ लेकर अपनी जवाबदेही से नहीं बच सकतीं।
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