बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक पति को अपनी पूर्व पत्नी को 10 लाख रुपये स्थायी गुजारा भत्ता (एलिमनी) देने के पुणे फैमिली कोर्ट के आदेश को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि ठोस दस्तावेजी साक्ष्यों के बिना केवल अनुमान के आधार पर गुजारा भत्ता तय करना उचित नहीं है। हाईकोर्ट ने मामले को नए सिरे से मूल्यांकन के लिए फैमिली कोर्ट को वापस भेज दिया है, ताकि दोनों पक्षों की वास्तविक आय, खर्च, संपत्ति और देनदारियों की विधिवत जांच हो सके। हालांकि, अदालत ने पति को अपनी नाबालिग बेटी के लिए हर महीने 10,000 रुपये का भरण-पोषण भत्ता जारी रखने का निर्देश दिया है।
कमाई के वास्तविक साक्ष्य के बिना तय हुआ था गुजारा भत्ता
न्यायमूर्ति भारती डांगरे और न्यायमूर्ति आशीष चव्हाण की पीठ ने 28 अगस्त को पति की याचिका पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय सुनाया। पीठ ने पाया कि पुणे फैमिली कोर्ट ने बिना किसी पुख्ता रिकॉर्ड के केवल इस आधार पर पति की मासिक आमदनी 1 लाख रुपये मान ली थी कि वह उच्च शिक्षित एवं कुशल पेशेवर है और पूर्व में जर्मनी में काम कर चुका है।
पीठ ने टिप्पणी की कि फैमिली कोर्ट के न्यायाधीश से यह अपेक्षा की जाती है कि वे पति की वास्तविक कमाई और पत्नी की वित्तीय जरूरतों का सही आकलन करें। अदालत ने जोर देकर कहा कि स्थायी गुजारा भत्ता पति की वास्तविक क्षमता के अनुरूप होना चाहिए, न कि किसी निराधार अनुमान या कयास पर आधारित।
संपत्ति और देनदारियों के नए सिरे से आकलन का निर्देश
हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट को निर्देश दिया कि वह दोनों पक्षों की संपत्ति और देनदारियों का आधिकारिक विवरण रिकॉर्ड पर दर्ज करे। इसके साथ ही दोनों पक्षों को अपनी वित्तीय स्थिति साबित करने के लिए जरूरी साक्ष्य पेश करने की पूरी अनुमति दी जाए। इन साक्ष्यों और विवरणों के आधार पर ही पति की वास्तविक आमदनी और पत्नी की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए स्थायी गुजारे भत्ते व बच्ची के भरण-पोषण की अंतिम राशि तय की जाए।
क्रूरता के आधार पर मंजूर हुआ था विवाह विच्छेद
यह विवाद हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के तहत पति द्वारा क्रूरता के आधार पर दायर तलाक की अर्जी से जुड़ा है। अक्टूबर 2025 में फैमिली कोर्ट ने पति के आरोपों को सही पाते हुए तलाक की डिक्री मंजूर कर दी थी। पत्नी ने इस अदालती प्रक्रिया का विरोध नहीं किया था और न ही बाद में तलाक के आदेश को कोई चुनौती दी थी।
तलाक का फैसला सुनाते समय फैमिली कोर्ट ने पति को पत्नी के लिए 10 लाख रुपये एकमुश्त स्थायी गुजारा भत्ता और नाबालिग बेटी के लिए 10,000 रुपये प्रति माह देने का आदेश दिया था। पति ने इन वित्तीय निर्देशों को अनुचित बताते हुए हाईकोर्ट में अपील की थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि बेटी के लिए दिया जा रहा 10,000 रुपये का मासिक भुगतान अंतरिम रहेगा और यह फैमिली कोर्ट के अंतिम फैसले के आधार पर समायोजित किया जाएगा।

